राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ११६
यदि रामदेव इतना प्रतापी राजा होता तो कश्मीर के इतिहास तथा तत्कालीन कश्मीर साहित्य में उसके सम्बन्ध में कुछ न कुछ कहानी तथा कोई न कोई घटना अवश्य लिखी मिलती । उसका कोई न कोई स्मारक, मन्दिर अथवा भवन के रूप में अवश्य होता । उसका किसी न किसी काश्मीरी साहित्य में उल्लेख मिलता । कल्हण के समय तक कुछ बात उसके सम्बन्ध में अवश्य प्रचलित रहती । हसन के अनुसार पाण्डव वंश का वाईसवाँ राजा सुन्दरसेन था । उसके समय में भयंकर भूकम्प आया । भूकम्प राजधानी के सन्धिमत नगर के मध्य में हुआ । समस्त नगर, राजा, नागरिक, जीव- जन्तु इसके शिकार हो गये । नगर जिस स्थान पर था वहाँ उलर झील हो गयी । हसन ने बाइबिल तथा कुरान शरीफ वर्णित जल प्लावन के आधार पर इस कथा का वर्णन किया है । राजवंश के निर्मूल होने पर, कश्मीर के उत्तर-पूर्व स्थित अत्यन्त रमणीय, उर्वरा लोलह किंवा लोलाव अथवा आधुनिक लोव उपत्यका के सामन्त लव को कश्मीर के लोगो ने राजा निर्वाचित किया । उसे कश्मीर के सिंहासन पर बैठाया । सम्भव है कि भूचाल तथा जलप्लावन के कारण जो कश्मीर में प्रायः हुआ करते हैं, लुप्त राजाओ से संबंधित पुस्तिकाएं तथा सामग्रियां नष्ट हो गयी हों । जिस रत्नाकर पुराण के आधार पर हसन ने इतिहास लिखा है, उसके विषय मे कहता है कि वह पुस्तक के साथ वितस्ता नदी में नाव पर जा रहा था । तूफान आया । पुस्तक नदी में डूब गयी । नीलमत पुराण तुल्य रत्नाकर पुराण का होना सम्भव हो सकता है । नीलमत के समान उसमें भी ऐतिहासिक वर्णन रहा होगा । किन्तु अभी तक रत्नाकर पुराण तथा उसका अनुवाद नहीं मिल सका है । मैने हसन द्वारा वर्णित राजाओ का वर्णन परिशिष्ट ३ में दे दिया है। इसका ऐतिहासिक महत्त्व भविष्य के गर्भ में है । वस्तुस्थिति तथा घटना क्रम जो प्रकाश में आये हैं, उनके आधार पर उसका ऐतिहा- सिक महत्त्व नगण्य है । मैं यहाँ मुल्ला अहमद के 'वाक्ये कश्मीर' का 'दीवाचा' दे देना उचित समझता हूँ जिससे बहुत बातें साफ हो जायेंगी । पता चलेगा कि रत्नाकर पुराण की कहानी सर्व प्रथम कैसे आरम्भ हुई या गढ़ी गयी । लुप्त राजाओं को किस प्रकार एक दूसरे से जोड़ने का प्रयास किया गया है । हसन ने दीवाचा अपनी पुस्तक में उद्धृत की है । उसे अविकल रूप में यहाँ देना अच्छा होगा । मुल्ला अहमद 'वाक्ये कश्मीर' के दीवाचा में रकम तराज है—'यह हकीर पुर तकसीर जब आला हजरत शहन्शाह मुअज्जम यानी जैनुल आबदीन के 'वाजिबुल अर्ज' के मुताबिक किताब महाभारत के फ़ारसी तरजुमे से फारिग हुआ तो इसके फौरन बाद ही कश्मीर के राजे-महाराजो की तारीख नवीसी पर मुकर्रर हुआ । चुनांच: इस इरशाद के मिलते ही मैने संस्कृत जबान के उन 'पुरानो' और 'तरंगिनियो' की तलाश शुरू की जो तुरकी लुटेरे कश्मीर पर हमलावर होने और वाज सुलतान सिकन्दर बुतशिकन की मजहबी ना सादारी के वापस जाया हो चुकी थी । और जो बाक़ी थी वह बहुत थोड़ी और नायाब थी । वकौल शस्ते जो- इब्दा या बिन्दा बडी मशक्कत और मिहनत के बाद मैं उनके पाने में कामयाब हो गया । इनमें से क़ाबिले जिक्र किताबें कल्हण पण्डित, क्षेमेन्द्र, छबिल्लकार और पद्ममिहिर की राजतरंगिनियां हैं । लेकिन उसे छोड़कर कल्हण पण्डित की राजतरंगिनी के तरजुमा की तरफ मुतवज्जह हुआ जो बहम्दुल्लाह बहुत जल्द इख्तिनाम पजीर हो गया । 'इसके थोड़े अरसा बाद ही पण्डित रत्नाकर की पुरानी तारीख के कुछ अजजा पण्डित प्रजा की