भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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११८ राजतरंगिणी

हसन का यह कयास है कि द्वितीय गोनन्द मारा गया। इसका कोई प्रमाण नहीं है। कोई कारण नहीं देता कि गोनन्द की हत्या क्यों की गयी। हत्याकारी हरणदेव का गोनन्द से क्या सम्बन्ध था। ८३ (१) लुप्त राजा : कल्हण ने ३५ राजाओ का नाम तथा समय नहीं दिया है। इस प्रसंग में एक रोचक बात रत्नाकर पुराण की है उसका उल्लेख यहाँ कर देना आवश्यक है । कश्मीर का बड़शाह अर्थात् बादशाह जैनुल आबदीन (सन् १४२०-७० ई०) ने प्राचीन पुस्तकों का अन्वेषण कराया था। उसने १५ राज- तरंगिणियों का पता लगवाया था। सिकन्दर बुत शिकन (१३६३-१४१६ ई०) के समय केवल ११ ब्राह्मणों के कुटुम्ब कश्मीर में रह गये थे। उनके अतिरिक्त हिन्दू या तो मुसलमान हो गये या विनष्ट कर दिये गये या कश्मीर त्याग कर भाग गये। देवस्थान तथा मन्दिर नष्ट कर दिये गये। पुस्तकें आदि भस्म कर दी गयीं। उनका या तो नदियों में प्रवाह कर दिया गया अथवा भस्म कर दी गयी। बहुतो ने राज्य भय से स्वयं वितस्ता में उनका जल प्रवाह कर दिया। बड़शाह के समय कल्हण की राजतरंगिणी जो प्रायः एक सौ वर्ष तक लुप्त थी प्राप्त हुई। उसमे ३५ विस्मृत राजाओ का उल्लेख नही था। कुछ समय पश्चात् भोजपत्र पर लिखी एक पुस्तक और मिली। उसका नाम 'रत्नाकर पुराण' था। रत्नाकर पुराण में ३५ लुप्त राजाओ का वर्णन था। बादशाह जैनुल आबदीन ने रत्नाकर पुराण तथा राजतरंगिणी का अनुवाद फारसी में कराया। पुराण में कलियुग के प्रारम्भ से होने वाले राजाओ का वर्णन था। दोनो ही मूल ग्रन्थ अर्थात् रत्नाकर पुराण तथा उसका अनुवाद इस समय अप्राप्य हैं। कश्मीर के इतिहासकार पीर हसन शाह का कहना है कि उन्हें रत्नाकर पुराण के अनुवाद की एक प्रति रावलपिण्डी में किसी काश्मीरी सज्जन से प्राप्त हुई थी। उसमें जिन ३५ राजाओं का वर्णन कल्हण ने नही किया है, उनका उल्लेख था। हसन वितस्ता में एक दिन रत्नाकर पुराण के अनुवाद वाली पुस्तक के साथ नाव पर जा रहे थे। नाव डूब गयी। वे स्वयं बच गये पुस्तक डूब गयी। हसन ने नहीं लिखा है कि यह पुस्तक रावलपिण्डी में किससे मिली थी। हसन के अनुसार २२ राजाओं का शासन काश्मीर में एक हजार वर्ष तक था। उन्हें वह पाण्डववंशीय कहता है। कश्मीर की परम्परा बलो धाती है कि प्रत्येक स्मारक तथा गाथा को पाण्डव से जोड़ते हैं। उन्हें पाण्डव लारेह किंवा पाण्डव स्मारक कहते है। हिमाल तथा लोलार की प्रेमगाथाएं इसी काल की कही जाती हैं। हिमाल का प्रेमी नागराय तथा लोलार का प्रेमी बोम्बरे था। कश्मीर के ग्राम्य गीतों में उनका नाम अभी तक प्रचलित है। बोम्बरे उन विस्मृत राजाओ मे से एक था। बोम्बरे लोलार पर इतना आसक्त था कि उसने राज्य त्याग दिया। हिमाल-नागराय की एक प्रचलित कहानी है। नागराय को भी उक्त ३५ लुप्त राजाओ में रखा गया। हसन के अनुसार हरणदेव पाण्डव वंशज था। यह गोनन्द द्वितीय के यहाँ सेवावृत्ति करता था। कालान्तर मे वह राजमन्त्री हो गया। गोनन्द की हत्या कर स्वयं राजा बन गया। रामदेव हरणदेव के पश्चात् राजा हुआ। उस प्रतापी राजा ने भारतवर्ष के ५०० राजाओं को परास्त कर अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक राज्य कायम किया। उसने उपज का १० प्रतिशत राजकर निश्चित किया। किन्तु उसके उत्तराधिकारियों ने उसे बढ़ाकर २० प्रतिशत कर दिया था।