राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ११३ अथ वैजनने मासि सा देवी दिव्यलक्षणम् । निर्दग्धस्यान्यतरोरङ्कुरं सुषुवे सुतम् ॥ ७४ ॥ गोनन्द ७४. दग्ध वंश वृक्ष में अंकुर तुल्य उस देवी ने समय पर दिव्य लक्षणों १ में युक्त पुत्र प्रसव किया। तस्य राज्याभिषेकादिविधिभिः सह संभृता । द्विजेन्द्रैर्निर्वर्त्यन्त जातकर्मादिकाः क्रियाः ॥ ७५ ॥ ७५. द्विजेन्द्रों ने राज्याभिषेक १ के साथ जातकर्म तथा अन्य सम्बन्धित संस्कार विधिवत् कराया। पृथ्वी माता, भूमि माता आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है। मालूम होता है। भगवान् देवी यशोवती से प्रभावित थे। गर्भवती होने पर भी रानी अपने पति कश्मीरराज के साथ वृष्णियों के विरुद्ध गान्धार युद्ध में गयी थी। भगवान् ने उसका अभिषेक वहीं किया था। कोई प्रमाण नहीं मिलता। श्री कृष्ण कश्मीर में आये थे। कश्मीर भूमि पर यशोवती का अभिषेक किया था। गीता जैसे उदात्त दार्शनिक सिद्धान्तों के रचनाकार श्री कृष्ण से राजनीतिक सिद्धान्तों पर भी इसी प्रकार के विचारों को प्रकट करने की अपेक्षा की जा सकती है। कश्मीरराज को पराजित करने पर भी श्री- कृष्ण ने कश्मीर पर शासन नहीं किया। उसे लेने तक की कल्पना नहीं की। राज्य जिसका था, उसे लौटा दिया। दामोदर के पिता गोनन्द ने मथुरा में उनसे युद्ध किया था। वे वैर भाव भी भूल गये। उन्होंने उपनिवेश बनाने, साम्राज्य बनाने की कल्पना नहीं की। इस प्रकार के राजनीतिक उदात्त उदाहरण भारतवर्ष जैसे देश में ही सम्भव हो सकते हैं। ७४ (१) लक्षण : महापुरुषों तथा राजाओं में भारतीय ज्योतिष के अनुसार शरीर पर कुछ स्पष्ट चिह्न होते हैं। उनकी महत्ता, विशेषता के कारण उन लक्षणों में कमी किंवा अधिकता होती है। भगवान् रामचन्द्र में, कृष्ण में इस प्रकार के लक्षण थे। भगवान् बुद्ध में महापुरुषों के ३२ लक्षण थे। उनके अनुयायकों में कुछ लक्षणों के होने का उल्लेख मिलता है। ज्योतिष के अनुसार प्रत्येक लक्षण का प्रभाव भिन्न-भिन्न होता है। ७५ (१) राज्याभिषेक : शिशु गर्भ से निकलते ही पूर्ण सत्ता सम्पन्न राजा हो गया। इस सिद्धान्त की ओर कल्हण संकेत करता है। भगवान् ने दिव्य दृष्टि द्वारा गर्भ का रहस्य जान लिया था। गर्भ में पुत्ररत्न स्थित है। अतएव यशोवती का अभिषेक गान्धार में किया था। पुत्र का जन्म होते ही यशोवती की सत्ता समाप्त हो गयी। पुत्र पूर्ण राजा हो गया। उसका अभि- षेक भगवान् ने गर्भ में ही कर दिया था। उत्तरा- धिकार के विवाद का प्रश्न नहीं उठता था। भगवान् ने एक विषम समस्या का अत्यन्त चतुराई के साथ समाधान किया था। किसी भी सम्बन्धी तथा गोत्री को किसी प्रकार के विवाद करने का अधिकार नहीं था। विजेता ने राज्य पुनः गर्भ स्थित उत्तराधिकारी को लौटा दिया था। यदि पुत्र न होता तो कम से कम कुछ मासों का समय यशोवती को इसलिये दिया कि देश में १५