भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग १९५ तस्यावन्ध्यप्रसादत्वं रक्षन्तः पितृमन्त्रिणः । पार्श्वगेभ्यो ददुर्वित्तमनिमित्तस्मितेष्वपि ॥ ७८ ॥ ७८. उस बालक के अधरों पर अकारण स्मित रेखा देखकर उसके पिता के मन्त्रिगण उसकी प्रसन्नता¹ को सफल देखने की अभिलाषा से पार्षदों को पुरस्कार दिया करते थे । अबुद्ध्वाऽननुतिष्ठन्तस्तस्याव्यक्तं शिशोर्वचः । कृतागसमिवात्मानममन्यन्ताधिकारिणः ॥ ७९ ॥ ७९. अबोध शिशु की वाणी का आशय एवं आदेश समझने एवं पालन करने में असमर्थता का अनुभव कर वे मन्त्रीगण अपने को स्वयं अपराधी मानते थे । पितुः सिंहासनं तेन क्रामता बालभूभुजा । नोत्कण्ठा पादपीठस्य लम्बमानाङ्घ्रिणा हृता ॥ ८० ॥ ८०. पिता के सिंहासन¹ पर स्थित बालक नरेश का पद पादपीठ पर छोटा होने के कारण नहीं पहुँच पाता था अतएव स्पर्श सुख का उत्कण्ठी पादपीठ निराश हो जाता था । वर्ष की रही होगी । अर्थात् गान्धार युद्ध के ५ से १२ वर्ष पश्चात् ही महाभारत आरम्भ हो गया था । बाल्यकाल से मैं समझता हूँ ५ से १२ वर्ष की अवस्था का बोध होना चाहिए । पाठभेद : श्लोक संख्या ७७ में 'प्रस्रविणी' का पाठभेद 'प्रसविनी' मिलता है । श्लोक संख्या ७८ में 'ददु' का पाठभेद 'दधु' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ७८ (१) प्रसन्नता : राजा प्रसन्नता का प्रदर्शन कुछ देकर करता है । सेवक इसलिए उसे प्रसन्न रखने का सर्वदा प्रयास करते हैं । अप्रसन्न होने पर राजा का दण्ड स्वरूप उपरूप प्रकट होता है । जिसका अन्त किसी के दुःख किंवा दण्ड में होता है । किसी के कार्य से प्रसन्न होने पर राजा उसे पदवी, जागीर किंवा पुरस्कार देते हैं । शिशु अबोध था । वह किसी कार्य से प्रसन्न होता था । मुस्कुराता था । उसकी प्रसन्नता राजकीय परम्परानुसार व्यर्थ न हो, एतदर्थ मन्त्रिगण उस परम्परा को कायम रखने के लिये पुरस्कार देते थे । पाठभेद : श्लोक संख्या ७९ में 'अबुद्ध्वाऽननुतिष्ठन्तः' का पाठभेद 'अबुद्धमनुतिष्ठन्तः' मिलता है । श्लोक संख्या ८० में 'हृता' का पाठभेद 'कृता' तथा 'हता' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ८० (१) सिंहासन : इस श्लोक से कल्हण का मन्तव्य यह मालूम होता है कि शिशु राजा सिंहासन पर आसीन होता था । उसका पैर इतना छोटा था कि पादपीठ तक नहीं पहुँच सकता था । मन्त्रीगण शिशु के अबोध होने पर भी प्रतीक स्वरूप उसे सिंहासन पर बैठाते थे । ताकि सिंहासन सूना न रहे । वे राजा की ओर से राजकार्य करते थे । उसी प्रकार जैसे देवता के नाम से धर्मदाय भूमि सम्पत्ति तथा अन्य कार्यों का शासन तथा संचालन किया जाता है । मिलता है कि माधव अर्थात् श्री कृष्ण से युद्ध निमित्त दामोदर चतुरंगिणी सेना लेकर गया था । जिस समय यादव सेना स्वयंवर निमित्त गान्धार जा रही थी ।