भारतकोश
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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

[Page Header] प्रथम तरंग ८५

[Left Column] विशोका विजयेशं च वितस्तासिन्धुसंगमम् । एतान् सर्वानतिक्रम्य प्रययौ भरतं गिरिम् ॥ 1056 : १२४० विजयां मात्रतः स्नात्वा वितस्तायां महीपते । रुद्रलोकमवाप्नोति कुलमुद्धरते स्वकम् ॥ 9303 : १५१६ विजयेश्वर होकर मैं दो-तीन बार गया हूँ। परन्तु कभी नगर के अन्दर नहीं गया था। उस समय मुझे इस पवित्र स्थान का महत्त्व मालूम नहीं था। यह बनिहाल श्रीनगर की सड़क पर श्रीनगर से २९ मील पर स्थित है। नगर वितस्ता के वाम तट पर है। नगर में बिजली तथा पाइप द्वारा पानी दिया जाता है। इस समय यहाँ पर एक नवीन पुल का और निर्माण हो गया है। पुराना डोगराकालीन पुल भी कायम है। पुराने पुल से गाड़ियाँ नहीं जा सकतीं। नवीन पुल द्वारा गाड़ी बड़ी ट्रक, बस तथा सभी कुछ का परिवहन हो सकता है। इस समय यहाँ ग्रामीण औद्योगिक स्टेट राजकीय विभाग द्वारा बनाया गया है। नगर बड़ा है। पुरानी शैली का है। गलियों में पत्थर के फर्श लगे हैं। पक्की सड़कें हैं। शहर की जमीन बहुत ऊँची-नीची है। समभूमि पर नगर नहीं आबाद है। पुराने पुल द्वारा नगर का अभूत- पूर्व दृश्य मिलता है। शहर वितस्ता तट पर ऊँचे कगार किंवा करार पर बसा है। यहाँ अत्यन्त प्राचीन काल से पुरानी शैली का संस्कृत विश्वविद्यालय था। संस्कृत का अध्ययन- अध्यापन होता था। शारदा पीठ के पश्चात् संस्कृत शिक्षा का काश्मीर में यह दूसरा केन्द्र था। इस समय कुछ घर ब्राह्मणों के बचे खुचे रह गये हैं। काश्मीर के इतिहास में विजयेश स्थान का अपेक्षा- कृत अधिक वर्णन मिलता है। यथास्थान उसका उल्लेख किया गया है। विजबैहरा या बिजत्रोर में अशोक ने दो मन्दिर निर्माण कराये थे। इनका उल्लेख राजतरङ्गिणी में

[Right Column] मिलता है। मन्दिर का नाम अशोकेश्वर राजा अशोक के नाम पर रखा गया है। यहाँ के खनन द्वारा प्राप्त मूर्तियाँ खंडित कर इतनी विरूप कर दी गयी हैं कि उनके विषय में साधिकार कुछ कहना कठिन है। अशोकेश्वर संज्ञा से प्रकट होता है कि अशोक द्वारा शिव मन्दिर की स्थापना की गयी थी। यहाँ से प्राप्त खण्डित मूर्तियाँ अशोक काल की हैं या नहीं कहना कठिन है। सम्भव है कि यदि कुछ और खनन कार्य किया जाय तो तत्कालीन स्थिति तथा इतिहास पर अधिक प्रकाश पड़ेगा। श्रीनगर संग्रहालय की मूर्ति ए जी १ गुप्त- कालीन मूर्तिकला मालूम पड़ती है। सम्भवतः देवी की मूर्ति है। केश विन्यास सुन्दर है। मूर्ति अलंकृत है। कानों के वृत्ताकार कुण्डल कपोल के नीचे तक झूलते हैं। मूर्ति खण्डित कुरूप है। पादविहीन है। विष्णु मूर्ति ए जी ४ भी खण्डित है। ललाट पर मुकुट है। मूर्ति ए जी १० विष्णु की है। वह विरूप कर दी गयी है। उसे बुरी तरह से नष्ट किया गया है। तोड़ने वाले ने अपने पूरे क्रोध का प्रदर्शन किया है। मूर्ति वक्षस्थल तक प्राप्त है। उसके सम्बन्ध में कोई मत निर्धारित करना कठिन है। विजयेश्वर से महाराज अशोक से सम्बन्धित तत्कालीन बौद्ध कला-कृतियाँ तथा मूर्तियाँ मिलनी चाहिए थी परन्तु वे अब तक नहीं प्राप्त हो सकी है। सम्भव है किसी मसजिद, जियारत अथवा कब्र के अन्दर पटी होगी। खनन कार्य इसलिए कठिन मालूम होता है कि जहाँ मन्दिर किंवा देवस्थान नष्ट किए गए थे। उन स्थानों पर जियारतें, मस्जिदें तथा कब्रिस्तानो का निर्माण कर दिया गया है। मूर्तियाँ खण्डित कर गाड़ दी गयीं या उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर फेंक दिया गया। इस समय उन्हें ढूंढ निकालना कठिन प्रतीत होता है। 'विजयेश माहात्म्य' में अनेक तीर्थस्थानो का वर्णन मिलता है। उनकी यात्रा विजयेश की यात्र

८६ राजतरंगिणी


के साथ करने की बात लिखी गयी है। इस समय चक्रधर तथा गम्भीर संगम के अतिरिक्त और किसी तीर्थ स्थान का पता नहीं लगता। नये पुल के समीप एक नवीन मन्दिर का निर्माण किया गया है। मैं जिस समय यहाँ आया था, पानी बरस रहा था। मैं कीचड़ों से गुजरता एक मन्दिर में पहुँचा। इस मन्दिर में एकादश लिंग एक ही अरघा में स्थापित किये गये हैं। प्रवेश द्वार के दोनों पाश्र्वों में किसी पुराने मन्दिर की खण्डित मूर्तियों के पत्थर लगे हैं। यहाँ के प्राचीन मन्दिर के कलश का आमलक मन्दिर के वाम पाश्र्व में भूमि पर पड़ा था। इस पत्थर को लड़के तथा लोग कौतूहल से देखते हैं। यदि ग्यारह व्यक्ति उँगली लगाकर उठायें तो वह उठ जाता है। एक आदमी यदि पूरा जोर लगाये तो भी।दोनो हाथो से नही उठता। मैंने वहाँ खड़े बालको को बुलाया। उन्हें मिलाकर ग्यारह की संख्या पूरी हो गयी तो उँगली लगाया। बच्चे क-क-क कहने लगे और पत्थर उठ गया। मन्दिर में ग्यारह शिवलिंग हैं। अतएव ग्यारह व्यक्ति के उँगली लगाने की बात शिवलिंग से सम्बन्धित कर दी गयी है। पुराने पुल के समीप एक दूसरा मन्दिर नगर में है। नवीन निर्माण है। इसके साथ एक धर्मशाला बनायी गयी है। 'विजयेश्वर सुधार कमेटी' विजयेश्वर तीर्थों के सुधार तथा उन्नति निमित्त गठित की गई है। इस कमेटी के कार्यकर्त्ताओं से बातचीत हुई थी। यहाँ के हिन्दू मुसलमान दोनों से बातें कीं। मालूम हुआ कि नगर पूर्वकाल में मन्दिरों से भरा था। किन्तु कालान्तर में वे नष्ट हो गये। नगर में ऊँचे नीचे बहुत स्थान मिलेंगे। इनके होने का एक यह भी कारण हो सकता है कि मन्दिरों के अधिष्ठान ऊँचे बनाये जाते थे। उनके आसपास की भूमि समतल कर दी जाती थी। मन्दिरों के नष्ट होने पर उनके स्थान पर दूसरी इमारतें बन गयीं अथवा मन्दिर के मलबों को पाटकर उन पर रहने आदि के स्थान बना लिये गये। अतएव मकान प्रायः ऊँची नीची भूमि पर बने मिलेंगे। समभूमि नगर में कठिनता से मिलेगी। नगर के बाहर चारों ओर समभूमि है। विजयेश्वर मन्दिर के ध्वंसावशेष की खोज में लग गया। नगर में घूमता हुआ बाबा साहब की जियारत में पहुँचा। यह बड़ा भारी घेरा है। कब्रि- स्तान घेरा के बाहर और भीतर दोनों जगहों पर है। जियारत के लगभग दो-तिहाई स्थान पर बड़ी-बड़ी कब्रें बनी हैं। शेष में छोटी छोटी कब्रें हैं। जियारत चौकोर है। इस जियारत में एक मसजिद है। जियारत तथा मसजिद के पत्थर मन्दिरों के ध्वंसा- वशेष हैं। जियारत की परिक्रमा करते चला जियारत के दाहिनी तरफ मुझे मन्दिर का विशाल आमलक तथा कलश एक ओर लुढ़का मिला। मन्दिरों के अलंकृत पत्थर बहुत दिखाई पड़े। मन्दिरों के शिखर पर कलश लगाने की प्रथा बौद्धों की अपेक्षा हिन्दू मन्दिरों में अधिक थी। यह विज- येश्वर किंवा अशोकेश्वर दो में से एक का मन्दिर होना चाहिए। किसका था कहना कठिन है। यहाँ पत्थर के सुन्दर खम्बे गोले चौपहले पड़े मिले। स्तम्भ का अधिष्ठान जियारत तथा बाहर दोनों जगहों पर लगा दिखाई पड़ेगा। कुछ कब्रों के पत्थर मन्दिर के अधिष्ठान के शिलाखण्ड के थे। अतएव यह निश्चय है कि वह स्थान प्राचीन मन्दिर था। रतन हाजी की मसजिद के बाहर भद्रपीठ का बड़ा शिला खण्ड पड़ा मिला। मसजिद के अन्दर स्तम्भ लगे हैं। मसजिद के आस-पास प्राचीन पत्थरों के टुकड़े बिखरे पड़े थे। विजयेश्वर की इस समय काफी उन्नति हो रही है। प्राचीन विजयेश्वर नगर से आबादी उठकर श्रीनगर-बनिहाल सड़क पर आकर आबाद हो रही है। मैं नगर में घूम रहा था। पानी बरस चुका था। कुछ झींसी पड़ रही थी। नव निर्मित मन्दिर का द्वार बन्द था। स्वयं सिकड़ी खोलकर अन्दर गया। यहाँ चारों ओर मुसलिम आबादी है। एक मुसलमान सज्जन ने यहाँ के पुजारी को बुला दिया।

प्रथम तरंग ८७ विजयेते पुण्यबलैर्बलैर्नैतु न शस्त्रिणाम्। परलोकात् ततो भीतिर्यस्मिन् निवसतं परम् ॥ ३९ ॥ ३९. उसपर पुण्य बल द्वारा ही विजय प्राप्त किया जा सकता है। अतएव वहां के निवासी केवल परलोक से भयभीत रहते हैं न कि शस्त्रधारियों से।

मन्दिर के आगन के एक तरफ गीता अध्ययन के लिए स्थान बना है। जिस समय मै गलियों में घूम रहा था तो खिड़कियों से औरतें तथा बच्चे कौतूहल पूर्वक झांक कर मुझे देखते थे। मै धोती, चट्टी, तथा कुरता पहने था। मै टोपी नहीं लगाता। कश्मीर के हिन्दू धोती नही पहनते ? धोती पहनना अपवाद माना जायेगा। सर पर टोपी अथवा पगड़ी अवश्य होगी । मैं एक कौतूहल की सामग्री था। मुझे स्मरण होकर रोमाच हो जाता था। यहाँ के लोग कभी हिन्दू थे। हमारे जैसे धोती पहनते थे। उनके लिए धोती आज कौतूहल की वस्तु बन गई है। भरद्ोम ग्राम प्राचीन मदयाधम के समीप विसाड तथा रामन्यार नदियों के संगम पर है। यह संगम वितस्ता संगम के कुछ ऊपर है। दोनो की मिली धारा को गम्भीर नदी कहते हैं। संगम स्थान को गम्भीर संगम कहा जाता है। गम्भीर नदी बहुत गहरी है। विजयेश्वर तथा श्रीनगर मार्ग पर होने के कारण इसका सैनिक महत्त्व है। एक गम्भीर नदी और है। वह राजस्थान में चित्तोर दुर्ग के समीप बहती है। उसे लौकिक भाषा मे गम्भीरा नदी कहते हैं। (३) आदि केशव : आदि केशव का स्थान कश्मीर में कहाँ था कहना कठिन है। मैंने पता लगाने का प्रयास किया। कुछ स्थान बताये गये परन्तु वे ऐतिहासिक तुला पर ठीक उतरे नहीं। विष्णु के रूप केशव हैं। केशव के अनेक नाम तथा रूप हैं। आदि शब्द प्रारम्भ मे जोडने से मूल केशव का अर्थ वराह मूल किंवा मूल वराह की तरह प्रकट होता है। केशव के और भी मन्दिर कश्मीर में थे। अतएव सबसे प्राचीन केशव के मन्दिर अथवा मूर्ति का नाम आदि केशव रख दिया गया होगा। आदिशब्द देवताओं तथा पुस्तको में लगा देने से उनके मौलिक रूप की ओर संकेत हो जाता है । काशी में आदि विश्वेश्वर तथा आदि केशव के मन्दिर हैं। आदि विश्वेश्वर उस स्थान को कहते हैं जहाँ प्रथम विश्वनाथ जी का मन्दिर अलप्तगीन के समय में तोड़ा गया था। काशी में मुस्लिम राज्य समाप्त होने पर पार्श्व में एक मन्दिर बना दिया गया। वाराणसी प्राचीन काल में वरुणा गंगा के संगम से प्रारम्भ होकर अस्सो गंगा के संगम पर समाप्त होती थी । वरुणा गंगा के संगम पर आदि केशव का मन्दिर है। यही वाराणसी का आदि किंवा प्रारम्भ है। काशी में केशव तथा विश्वेश्वर के अनेक मन्दिर हैं। परन्तु आदि शब्द से यही प्रतीत होता है कि सबसे प्राचीन मन्दिर को आदि का विशेषण दे दिया गया। यही बात काश्मीर मण्डल के साथ भी हुई होगी। (४) ईशान : यह शब्द रुद्र किंवा शिव के लिये आता है। पारस्करगृह्यसूत्र (३: १३: ४) में समिति के सभापति के लिये इस शब्द का व्यवहार किया गया है—'अस्या . पर्षदः ईशान :-। अमर कोष (१: १२-३६) कार ने शिव के अड़तालीस नामों में 'ईशान' भी एक नाम दिया है। ईशान सन्धि-मति के गुरु थे। उनकी स्मृति में ईशेश्वर नामक एक मन्दिर निर्मित किया गया था। ईशेश्वर तथा दशावर स्थान को ईशान स्थान से मिलाना गलत होगा। विशेष प्रकाश रा० २: १३४ श्लोक में डाला गया है। पाठभेद : श्लोक संख्या ३९ में 'पुण्य' का पाठभेद 'मूल्य' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : इस श्लोक द्वारा कल्हण कश्मीरियो की वीरता

८८ राजतरंगिणी सोष्मस्नानगृहाः शीते गुष्यत्तीरगङ्गाऽस्पदा गये। यादोविरहिता यत्र निम्नगा निरुपद्रवाः ॥ ४० ॥ ४०. यहाँ जल जन्तुओं से विहीन निरुपद्रव सरिताओं के रम्य१ तीर पर हैं और शीत ऋतु में स्नान निमित्त उष्ण२ स्नानगृह बने हैं।

तथा धर्मभीरुता दोनों आचरणों पर प्रकाश डालता है। वास्तव में काश्मीर इस दृष्टि में अपने गौरव का सानी नहीं रखता। भारत के पराधीन होने पर भी लगभग तीन शताब्दी तक हिन्दू राज्य कश्मीर में कायम रहा। कश्मीर को विदेशी अथवा विदेशी मुसलिम राजाओं ने नहीं जीता था। अन्तर्देशीय झगड़ों के कारण अपने ही लोगों के कारण हिन्दू राज्य हटाकर काश्मीरी मुसलिम राज्य कायम किया। सोलहवीं शताब्दी अर्थात् लगभग तीन शताब्दी तक यहाँ का शासन काश्मीरी मुसलिम बादशाहों के हाथों में रहा। ये बाह्य मुसलिम सेना का सर्वदा सामना करते रहे। अकबर के समय बाहरी मुसलिम शासन काश्मीर में स्थापित हुआ था। महमूद गजनो जैसे योद्धाओं को काश्मीरियों ने लोह कोट के पीछे हटाया था साथ ही वे बड़े धार्मिक भी थे। हिन्दू और मुसनमान काश्मीरी आज भी बहुत धर्म प्रिय हैं। पाठभेद : श्लोक संख्या ४० में 'गुष्यतीर' का पाठ भेद 'श्शुष्यत्तीरा' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ४०(१) सुस्थ तार पद : वितस्ता नदी तीर- स्थित तीर्थस्थानो, जलाशया पर स्नान, पूजन, मार्जन, अभिषेक निमित्त पत्थर के घाट प्राचीन काल से बनाये जाते रहे हैं। काशी, मथुरा, नासिक, हरद्वारके घाट प्रसिद्ध हैं। नगर के लोग स्नान निमित्त घाटो पर जाते हैं। काश्मीरी भाषा में घाट को यारवल कहते हैं। जहाँ यार अर्थात् मित्र मिलते हैं। घाट नगर के सार्वजनिक जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। घाटो पर कथा वार्ता, पूजा-पाठ, सन्ध्या वन्दन, श्राद्ध, तर्पणधर्म, स्नान, वस्त्र प्रक्षालन, दीप दान, पुण्यदान, धर्मदान, सभी कुछ दैनिक, दैहिक, भौतिक कर्म किये जाते हैं। ४० (२) स्नानगृह : कल्हण ने मन्दिरों के जुड़ी गुप्य रचना का भी उल्लेख (रा० त० ८।७०६) राजतरंगिणी में दिया है। उन्हें काष्ठ मण्डप कहा जा सकता है। ये नदी तट पर बने रहते थे। काशी में काष्ठ मण्डप के स्थान पर स्नान के पश्चात् स्त्रियों के वस्त्र बदलने के लिए घाटों पर पत्थरी मढ़िया के बनाने की प्रथा थी। और है। नवीन घाट निर्माण के समय उनके रचना पर विशेष ध्यान रखा जाता है। वहीं-वहीं पर स्त्रियों के वस्त्र बदलने तथा जल में स्नान के लिए लकड़ियों के मण्डप बनाये जाते हैं। काशी में आज कल टिन तथा लोहे के स्नानगृह पोता पर बनाये जाते हैं जो पानी पर तैरते रहते हैं। और नदी के उतार चढ़ाव के समय भी इसमें ऊपर नीचे उठते रहते हैं। कल्हण के समय स्नात निमित्त काष्ठ मण्डप बनाने का संकेत प्रमाणित करता है कि बन्द स्थान में लज्जा तथा शीत की रक्षा करते हुए, स्नान की व्यवस्था थी। काश्मीरियों के विकसित सांस्कृतिक जीवन का यह द्योतक है। तत्कालीन सामाजिक जीवन काफी विकसित हो चुका था। कल्हण स्नान गृह का पुनः उल्लेख तरंग आठवें में करता है। सरित्स्नानगृहे स्नान्तो वृद्धाः शौण्डनियोगिनः । राजवेश्मान्यगणिता नाम मात्र नृपात्मजाः ॥ —रा० : ८ : ७०६ गर्म स्नानगृह अथवा हमाम कश्मीर के शीतकालीन सामाजिक जीवन में विशेषस्थान रखता है। स्नान क्रिया मार्जन के लिए वैयल

प्रथम तरंग ८९ असंतापार्हतां जानन् यत्र पित्रा विनिर्मिते । गौरवादिव तिग्मांशुर्घत्ते ग्रीष्मेऽप्यतीव्रताम् ॥ ४१ ॥ ४१. भगवान् भुवन भास्कर अपने पिता काश्यप के प्रति आदर प्रकट करने के कारण उनके द्वारा निर्मित काश्मीर मण्डल को कष्ट न मिले, एतदर्थ ग्रीष्म¹ ऋतु की गरिमा काल में भी किरणों में तीव्रता नहीं लाते । विद्यावेश्मानि तुङ्गानि कुङ्कुमं सहिमं पयः । द्राक्षेति यत्र सामान्यमस्ति त्रिदिवदुर्लभम् ॥ ४२ ॥ ४२. उत्तुंग विद्या वेश्म,¹ कुंकुम², हिम जल, द्राक्षादि³ पदार्थ जो स्वर्ग में भी दुर्लभ हैं। यहाँ साधारण सुलभ हैं। उसका उपयोग नहीं किया जाता अपितु शीतकालीन निवास में परिणत कर काम में लाया जाता है। गरीब मुसलमान प्रायः मसजिदों के हमामो का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार के हमामों का निर्माण बड़ी मसजिदों में है। बहुत से हमाम घाटों के किनारो पर बने रहते हैं। वहाँ गरम पानी स्नान निमित्त पहुँचाया जाता है। मालूम होता है । आजकल जैसी प्रथा कल्हण के समय में प्रचलित रही होगी। यही कारण है कि नदियों के वर्णन के साथ कल्हण ने इनका वर्णन दैनिक जीवन से सम्बन्धित होने के कारण किया है। मैंने कश्मीर के ग्रामों में बहुत भ्रमण किया है। सभी सरोवरों, तड़ागों, पुष्करिणियों, मागों अथवा जलाशयों के पास लकड़ी का चौकोर शिवालय नुमा बन्द स्नान-गृह रखा रहता है। वह हटाया- बढ़ाया जा सकता है। प्रथा अत्यन्त प्राचीन है। इतिहास लेखक प्रायः ग्रीस और रोम को स्नान प्रथा को श्रेय देते हैं। मुख्यतः हमाम शैली के स्नान को। भ्रम के कारण कुछ लेखक इस प्रथा का जनक उन्हें बताते हैं । टर्किश बाथ किंवा हमाम प्रथा का श्रेय तुर्कियों को दिया जाता है। वस्तु स्थिति यह नहीं है। कुस्तुनतुनियां को जब तुर्कों ने विजय किया तो वहाँ रोम तथा ग्रीक शैली के गर्म जल द्वारा परिचालित स्नानगृह थे। तुर्कों ने उनका नाम हमाम रख दिया। टर्किश बाथ, १२ टर्किश बाथ सोप इत्यादि स्नान सम्बन्धी प्रसाधनों के नाम प्रचलित हो गये। किन्तु कश्मीर में यह प्रथा बहुत समय पूर्व से प्रचलित थी। यह रोमन याय, टर्किश बाथ की नकल नहीं थी । पाठभेद : श्लोक संख्या ४१ में 'असन्तापार्हताम्' का पाठ भेद 'न्तापहृताम्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४१(१) कल्हण यहाँ पर कश्मीर मण्डल की रचना काश्यप द्वारा हुई थी उस ओर पुनः संकेत करता है। कश्मीर में कभी गरमी नहीं पड़ती यह निर्वि- वाद है। ग्रीष्म ऋतु में जब समस्त भारत तपने लगता है। पृथ्वी प्यासी रहती है। सभी स्रोत वरफ गलने से पूर्ण रूप से चलने लगते हैं। उस समय कश्मीर में पुष्प खिलते हैं। और वर्षा ऋतु में फल लग जाते हैं। गर्मी वहाँ क्यों नहीं पड़ती उसपर कल्हण ने उत्प्रेक्षा द्वारा एक प्राचीन पौराणिक धार्मिक गाथा की ओर संकेत किया है। पाठभेद : श्लोक संख्या ४२ में 'यत्र खा' का पाठ भेद 'यत्रासा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४२ (१) विद्या वेश्म : उत्तुंग विद्या वेश्म के उल्लेख से प्रकट होता है कि कश्मीर में विद्याध्ययन

९० राजतरंगिणी त्रिलोक्यां रत्नसूः श्लाघ्या तस्यां धनपतेर्हरित् । तत्र गौरीगुरुः शैलो यत् तस्मिन्नपि मण्डलम् ॥ ४३ ॥ ४३. त्रैलोक्य में रत्नप्रसूता भूलोक श्लाघ्य है। भूलोक में कुबेर की उत्तर दिशा श्लाघ्य है। यहाँ की पर्वत मालाओं में गौरी' पिता हिमाचल श्लाघ्य है, और उसमें भी पर्वतों द्वारा आवृत कश्मीर मण्डल श्लाघ्य है। पर यथेष्ट ध्यान दिया जाता था। विद्यालयों तथा उनके विद्या भवनों का महत्वपूर्ण स्थान सामाजिक जीवन में था। कल्हण राज्य प्रासाद, राजभवन किंवा नगर के अन्य धनी मानी नागरिकों के अथवा नगर के भवनों का वर्णन नहीं करता। केवल उत्तुंग विद्या वेश्म का उल्लेख करता है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि कश्मीर की इमारतों में सर्वश्रेष्ठ इमारतें विद्यालयों की थीं। यह कश्मीर की जनता का विद्याप्रेम तथा सरस्वती के प्रति प्रगाढ़ भक्ति का द्योतक है। देव मन्दिरों की भव्यता की ओर संकेत नहीं किया गया है। यह अभाव खटकता है। महत्व- पूर्ण है। इस बात का प्रमाण है कि कश्मीर में विद्या वेश्म को मन्दिरों की अपेक्षा प्राथमिकता दी जाती रही होगी। (२) कुंकुम : केशर भारत में केवल कश्मीर में होती है। विश्व में केशर की सर्वश्रेष्ठ रोडी स्पेन में होती है। स्पेन की केशर दुनिया में सबसे अच्छी होती है। केशर किश्तवार तथा कश्मीर के अन्य स्थानों में होती है। कश्मीर में केशर की खेती के लिए पद्मपुर अर्थात् पामपुर प्रसिद्ध है। कश्मीर तथा अन्य देशों के कुंकुम अर्थात् केशर का वर्णन भावप्रकाश में मिलता है। काश्मीरदेशजे क्षेत्रे कुंकुमं यद्भवेद्धि तत् । सूक्ष्मकेशरमारक्तपद्मगन्धि तदुत्तमम् ॥ बाह्लीकदेशसंजातं कुंकुमं पाण्डुरं भवेत् । केतकीगन्धयुक्तंयत् तन्मध्यं सूक्ष्मकेसरम् ॥ कुंकुमं पारसीके यत् मधुगन्धि तदीरितम् । ईषत्पाण्डुरवर्णं तदधमं स्थूलकेशरम् ॥ —भावप्रकाश कश्मीर के केशर तथा अन्य स्थानों में उत्पन्न होने वाले केशरों की विशेषता तथा रूप का वर्णन भावप्रकाश करता है। कश्मीर का केशर घारक्त रंग, सूक्ष्म तथा उसकी गन्ध पद्म अर्थात् कमल की तरह होती है। यह उत्तम होती है। बाह्लीक अर्थात् बलख देश की केशर पाण्डु रंग की होती है। उसकी गन्ध केतकी की सुगन्ध की तरह होती है। उसके फूल के बीच में सूक्ष्म केशर होता है। पारसीक अर्थात् ईरान के केशर की सुगन्ध मधु अर्थात् शहद की तरह होती है। उसका रंग पाण्डु वर्ण का होता है। यह सूक्ष्म नहीं स्थूल होती है। कश्मीर तथा बाह्लीक के केशर की पंखुड़ी पतली तथा ईरान की मोटी होती है। (३) द्राक्षादि : यहाँ स्पष्ट तात्पर्य, फलों से है। कश्मीर का अंगूर बहुत प्रसिद्ध नहीं है। सेव, बम्बूगोशा, और अखरोट की ख्याति है। कश्मीर का अम्बरी सेव विश्वविख्यात है। इसका अपना एक विचित्र मधुर स्वाद है। अखरोट जितना अच्छा कश्मीर में होता है उतना शायद ही विश्व में कहीं प्राप्त हो सके। बम्बूगोशा कश्मीर की खास खोज है। कश्मीर फल और पुष्पों का भण्डार है। जल कश्मीर में सर्वत्र शीतल मिलता है। बर्फ गलने से स्रोतों में जल निरन्तर आता रहता है। पाठभेद : श्लोक संख्या ४३ में 'रत्नसूः' का 'रत्नभूः', 'गुरुः' का 'गिरि' : पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ४३ (१) कल्हण ने गौरी शब्द का प्रयोग यहाँ अत्यन्त पवित्रता एवं श्रद्धा की दृष्टि से किया है। गौरी एवं

प्रथम तरंग ९१ तत्र कौरवकौन्तेयसमकालभवात् कलौ । आ गोनन्दात् स्मरन्ति स्म न द्वापञ्चाशतं नृपान् ॥ ४४ ॥ ४४. कौरव एवं पाण्डवों के कलियुग १ समकालीन तृतीय गोनन्द के पूर्व हुए कश्मीर मण्डल के राजाओं का इतिहास लुप्त हो गया है । तस्मिन् काले ध्रुवं तेषां कुकृत्यैः काश्यपीक्षुजाम् । कर्तारः कीर्तिकायस्य नाभूवन् कविवेधसः ॥ ४५ ॥ ४५. उन राजाओं के पूर्व कुकृत्यों के कारण काश्यपी १ में कोई कृती कवि नहीं हुआ जो उनकी कीर्ति काया निर्माण निमित्त लेखनी उठाता । गिरिजा देवी पार्वती का नाम है । हिमाचल की कन्या मानी जाती है । किन्तु गोरी उस कन्या को कहते हैं जो आठ वर्ष की होती है । कुमारी होती है । ग्वारो कन्या देवी स्वरूप होती है । प्राचीन हिन्दू प्रथा के अनुसार इस प्रकार की कन्याओं को नवरात्र की नवमी को भोजन कराया जाता है । उनकी पूजा होती है । पूर्वीय उत्तर प्रदेश में इसको 'छोहरी' खिलाना कहते हैं । पाठभेद : श्लोक संख्या ४४ में 'भवात्कलौ' का पाठभेद 'भवान् कलौ' तथा 'गोनन्दात्' का 'गोनदत्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४४ (१) कलियुग : उपोद्घात, कश्मीर वर्णन के पश्चात् कल्हण इतिहास लिखने का प्रारम्भ इस श्लोक से करता है । इसका प्रारम्भ वह कश्मीर के बावन लुप्त राजाओं से करता है । उनका कोई सूत्र कल्हण को नहीं मिल सका । इतिहास सामग्री भी वह अपने समय में उनके विषय में नहीं प्राप्त कर सका । अतएव वह स्पष्ट कहता है कि गोनन्द (तृतीय) के पूर्व के बावन राजाओं की स्मृति लुप्त हो गयी है । कल्हण ने यहाँ 'गोनन्दात्' शब्द का प्रयोग किया है । गोनन्द प्रथम का उल्लेख उसने श्लोक संख्या १:१६ में किया है । गोनन्दात् शब्द यहाँ पर तृतीय गोनन्द के लिये प्रयुक्त किया गया है । ज्ञात राजाओं का नाम गोनन्द तृतीय से प्रारम्भ होता है । कल्हण ने अपने इतिहास का प्रारम्भ काल (वराहमिहिर के बृहद् संहिता से ) युधिष्ठिर के राज्यकाल से आरम्भ किया है । युधिष्ठिर के राज्याभिषेक तथा कथित समय का आधार कल्हण ने नीलमत पुराण को माना है । गोनन्द प्रथम कश्मीर का ऐतिहासिक पुराकालीन राजा रूप में चित्रित किया गया है । नीलमत पुराण के अनुसार गोनन्द पाण्डवों का सम कालीन था । राजा जनमेजय ने ऋषि वैशम्पायन से आश्चर्य चकित होकर पूछा कि नाना देश के राजाओं ने महाभारत में भाग लिया । क्या कारण है कि कश्मीर के राजा महाभारत युद्ध में किसी पक्ष की तरफ से भाग नहीं लिया । ऋषि वैशम्पायन ने राजा जनमेजय की शंका का समाधान किया है । उसी प्रसंग में कश्मीर के इतिहास का वर्णन किया है । वही कथोपकथन नीलमत पुराण का वर्तमान स्वरूप है । पाठभेद : श्लोक संख्या ४५ में 'कुकृत्यैः' का पाठभेद 'कुकृतैः' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४५ (१) काश्यपी : काश्यपी का यहाँ अर्थ कश्मीर है । अगय्या पृथ्वी के सताइस नामों में एक

९२ राजतरंगिणी

[बायाँ स्तम्भ] नाम कश्मीर भी है। यहाँ काश्यपी का पृथ्वी भी अर्थ लगाया जाय तो अर्थ के भाव में विशेष अन्तर नहीं पड़ता। वह अधिक व्यापक अवश्य हो जाता है। कश्मीर मण्डल के कवियों के स्थान पर पृथ्वी पर कोई कवि नहीं हुआ। यह अर्थ हो जायगा। श्लोक ४५ से ४७ तक संस्कृत साहित्य तथा कवियों की प्रशस्ति में कहे गये श्रेष्ठ पद हैं। उनके माधुर्य, पद लालित्य तथा भाव का अनुवाद करना कठिन है। कवि तथा लेखक अपनी लेखनी द्वारा व्यक्तियों को महान् तथा अमर बना देता है। कवि कल्हण ने उसे अत्यन्त संक्षिप्त तथा स्पष्ट रूप में रखा है। अंग्रेजों के महान् कवि कारलाइल ने भी इसी प्रकार भावोद्रेक 'हीरोज् प्रोएट' में किया है ! कल्हण राजतरंगिणी १:१३ से २० तक श्लोकों में कश्मीर के इतिहास लिखने का हेतु उपस्थित करता है। वह स्वीकार करता है। इतिहास का पुनर्लेखन उचित नहीं है। तथापि लोग इतिहास लिखते हैं। नवीन सामग्रियों की प्राप्ति, नवीन अनुसन्धान, त्रुटि पूर्ण भ्रामक एकांगी घटनावलियों तथा मतों को निवारणार्थ घोर नवीन कल्पना, गंतव्य और अनुभूति द्वारा लेखक इतिहास लिखने के लिए अनुशासित होता है। कल्हण ने कश्मीर के तत्कालीन इतिहासों में व्याप्त त्रुटियों के निवारणार्थ लेखनी उठाई थी। पूर्व काल में कश्मीर का अत्यन्त विस्तृत इति- हास था। राजाओं का व्यापक वर्णन किया गया था। इतिहासकार सुव्रत ने कश्मीर का संक्षिप्त इतिहास लिखा था। डाक्टर बूलर का मत है कि सुव्रत ने विद्यालयों तथा पाठशालानों में अध्ययन तथा अध्यापनार्थ विद्यार्थियों के लिए इतिहास का संक्षिप्त नोट बनाया था। उस नोट के कारण कालान्तर में इतिहास का विस्तृत वर्णन विस्मृत हो गया। सुव्रत के संक्षिप्त इतिहास के प्रयोग तथा प्रच- लन के कारण प्राचीन इतिहास ग्रन्थ लुप्त हो गये।

[दायाँ स्तम्भ] सुव्रत की रचना कठिन थी। समझने के लिए व्याख्या तथा भाष्य की आवश्यकता पड़ती थी। सर्व साधारण को इतिहास का वास्तविक ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता था। इतिहास के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए सुलभ सामग्री प्राप्त नहीं थी। कवि क्षेमेन्द्र ने नृपावली नामक ऐतिहासिक ग्रन्थ की रचना की थी। इतिहास की अपेक्षा उसे काव्य कहना अधिक संगत होगा। निस्सन्देह काव्य दृष्टि से श्रेष्ठ होने पर भी कल्हण के विचार से उसमें इतनी त्रुटियां रह गयी थी कि उसमें निहित इतिहास सामग्री को निर्दोष कहना कठिन था। क्षेमेन्द्र का उपनाम व्यासदास था। कश्मीर मण्डल में कवि क्षेमेन्द्र राजा अनन्त (१०२८-१०६३ ई०) तथा राजा कलश (१०६३- १०८९ ई०) के राजत्व काल में समय व्यतीत किया था। उसका जन्म शारदा अर्थात् शारदी में हुआ था। शारदी भारत में विद्या का केन्द्र था। उसने वहां शिक्षा प्राप्त की थी। उसे हर प्रकार की ज्ञानार्जन की सुविधा थी। वातावरण पाण्डित्यपूर्ण था। अनेक विचारधाराओं के संगम में उसने स्नान किया था। उस समयका इतिहास कश्मीर की राज- नीतिक, राजवंशीय, प्रासादीय, दलीय, षड्यन्त्रों, असंतोषों, नैराश्य एवं रक्तरंजित घटनाओं से भरा पड़ा है। उसके ग्रन्थ 'समयमातृका' का रचना-काल सन् १०५० ई० तथा अंतिम ग्रन्थ 'दशावतार चरित' का सन् १०६० ई० है। क्षेमेन्द्र के पूर्वज कश्मीर राजा की राजसेवा में अमात्य पद पर थे। क्षेमेन्द्र के पिता का नाम प्रकाशेन्द्र था। पितामह का नाम 'सिन्धुनामय' था। प्रपितामह का नाम 'सिन्धु' था। उसने साहित्य शास्त्र 'अभिनव गुप्त' से सीखा था। उसके दीक्षा गुरु 'सोमपाद' थे। गुरु के विचारों से प्रभावित था। इसके ग्रन्थ 'रामायण मंजरी' और 'भारत मंजरी' में रामायण, और महाभारत की कथाओं का और 'बृहत्कथा मंजरी' में मौलिक कथाओं संक्षिप्त संग्रह है। महाकवि 'गुणाढ्य' ने पैशाची

प्रथम तरंग ९३ भुजवनतरुच्छायां येषां निषेव्य महौजसां जलधिरशना मेदिन्यासीदसावकुतोभया । स्मृतिमपि न ते यान्ति क्ष्मापा विना यदनुग्रहं प्रकृतिमहते कुर्मस्तस्मै नमः कविकर्मणे ॥ ४६ ॥ ४६. उन महत्त्वशाली कवि कृति को सादर नमस्कार करता हूँ, जिनके अनुग्रह बिना उन प्रतापशाली राजाओं को जिनकी बलवती भुजा की छाया से समुद्र वेष्टित मेदिनी वनच्छाया तुल्य निर्भय थी। कोई स्मरण भी न करता । येऽप्यासन्निभकुम्भशावितपदा येऽपि श्रियं लेभिरे येषामप्यवसन् पुरा युवतयो गेहेष्वहश्चन्द्रिकाः । तांल्लोकोऽयमवैति लोकतिलकान् स्वप्नेऽप्यजातानिव भ्रातः सत्कविकृत्य किं स्तुतिशतैरन्धं जगत्त्वां विना ॥ ४७ ॥ ४६. जिनके पदों द्वारा हस्त मस्तक पद दलित होता था; जिन प्रसिद्ध प्राप्त के प्रासादों में कमनीय कामिनियों दिवा शशि के समान विहरती थीं; उन लोक तिलकों के अस्तित्व का स्वप्न में भी भला कवि कृति के बिना कौन स्मरण रखता ? ओ ! कवि बन्धु !! जिनके बिना यह जगत् अन्धकार में रहता उन आपकी शत-शत स्तुति क्यों न करूँ ।

भाषा में 'वड्डकहा', (संस्कृत वृहत्कथा) लिखा था। ग्रन्थ अनुपलब्ध है। उसका संस्कृत अनुवाद उपलब्ध है। क्षेमेन्द्र ने उसकी कथाओं को संस्कृत पद में संक्षिप्त कर लिखा है। इसके अतिरिक्त 'बोध-सत्त्वावदान' नामक अवदान की रचना भी इन्होंने की थी। क्षेमेन्द्र की 'नृपावली' अभी तक प्राप्त नही हुई है। उसके मिलने पर कश्मीर के इतिहास पर नवीन प्रकाश पड़ सकता है।

क्षेमेन्द्र कुलीन था। उसका समय सन् ९९० से १०९५ ई० तक था। उसकी शिक्षा बहुत अच्छी हुई थी। उसने विदेश भ्रमण किया था। शैव सम्प्रदाय का अनुयायी था। सोमपाद किंवा भागवत के साथ अध्ययन करने के कारण उसका झुकाव वैष्णव मत की ओर हो जाना स्वाभाविक था।

क्षेमेन्द्र ने बौद्ध धर्म का गम्भीर अध्ययन किया था। बौद्ध धर्म के विषय में उसकी धारणा ऊँची थी। 'नरमाला' संस्कृत साहित्य का उत्कृष्ट ग्रन्थ है। क्षेमेंद्र ने अपने समकालीन कायस्थ कर्मचारियों की कटु आलोचना की है।

समयमातृका में वर्णित स्थलों का पता आज भी कश्मीर में लगाया जा सकता है। क्षेमेन्द्र कवि रंगमंच का प्रेमी तथा नाटक देखने का शौकीन था। मुस्लिम काल में भारतीय रंगमंच का अराजकता, धार्मिक उन्माद तथा संरक्षण के अभाव में लोप हो गया। भारतीय कलाकार कश्मीर में आश्रय निमित्त आने लगे। नाट्यकला तथा रंगमंच कश्मीर में विक- सित होने लगे। कश्मीर में भी हिन्दू राज्य की समाप्ति तथा मुस्लिम राज्य के उदय के साथ नाटक तथा रंगमंच संरक्षणहीन हो गये। वे स्वतः लोप हो गये। कश्मीर की जनता के मुस्लिम हो जाने पर धार्मिक नाटकादि में रुचि नहीं रह गयी थी। 'कवि- कण्ठाभरण' में क्षेमेन्द्र लोगों को रंगशाला में जाने की सलाह देता है।

९४ राजतरंगिणी अष्टषष्ट्यधिकामब्दशतद्वाविंशतिं नृपाः । अपीपलंस्ते कश्मीरान् गोनन्दाद्याः कलौ युगे ॥ ४८ ॥ ४८. कलियुग काल में गोनन्द तथा उसके उत्तराधिकारी राजाओं ने दो हज़ार दो सौ छियासी वर्षों तक काश्मीर मण्डल का राज्य किया । भारतं द्वापरान्तेऽभूद्वार्तेयेति विमोहिताः । केचिदेतां मृषा तेषां कालसंख्यां प्रचक्रिरे ॥ ४९ ॥ ४९. इस काल गणना को भ्रम के कारण कतिपय इतिहासकार इसलिये ठीक नहीं मानते। उनकी धारणा है कि महाभारत का युद्ध द्वापर के अन्त में हुआ था। लब्धाऽऽधिपत्यसंख्यानां वर्षान् संख्याय भूभुजाम् । भुक्तात् कालात् कलेः शेषो नास्त्येवं तद्विवर्जितात् ॥ ५० ॥ ५०. यदि उन राजाओं का राज्य काल जिनको वर्ष काल ज्ञात है योग किया जाय तो कलियुग के व्यतीत हुए काल में से कुछ शेष नहीं बचता, जैसा कि निम्नलिखित पंक्तियों से ज्ञात होगा। पाठभेद : ग्यारह ऐतिहासिक ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हैं। कल्हण श्लोक संख्या ४६ में 'भुजवनतरु' का पाठभेद ने उनके नाम का उल्लेख नहीं किया है। केवल 'भुजतरुवन' मिलता है । ग्रंथ-संख्या दी है। श्लोक संख्या ४७ में 'स्वप्नेऽप्य' का पाठभेद ऐतिहासिक प्रमाणों के अभाव में प्राचीन ग्रन्थ- 'सर्वोऽप्य' मिलता है । कारों को कश्मीर के ५२ राजाओं के चरित्र तथा इतिहास का ज्ञान नहीं था। गोनन्द आदि चार श्लोक संख्या ४८ में 'कश्मीरान्' का पाठभेद राजाओं का वर्णन कल्हण ने नीलमत पुराण के 'काश्मीराम्' मिलता है । आधार पर किया है। श्लोक संख्या ४९ में 'भारतम्' का पाठभेद महाव्रती पाशुपत संप्रदायवादी कवि हेलाराज 'युद्धम्' मिलता है । द्विज ने १२ सहस्र श्लोकों की 'पार्थिवावली' नामक ग्रन्थ की रचना की थी। हेलाराज वाक्यपदीय श्लोक संख्या ५० में 'नास्त्येवम्' का पाठ भाष्य के लेखक हैं। उनका काल प्रामाणिक तौर 'नास्त्येव' मिलता है। 'वर्जितात्' तथा 'वर्जनात्' पर निश्चित नहीं कहा जा सकता है। अनुमान मिलता है । लगाया जाता है। वे नवीं अथवा दसवीं शताब्दी में पादटिप्पणियाँ : हुए थे। हेलाराज ने गाथाओं, लोकोक्तियों तथा ५० (१) कल्हण ने अपने पूर्ववर्ती इतिहासकारों जनश्रुतियों के आधार पर राजाओं के वृत्तान्त का के ११ ग्रन्थों का अध्ययन किया था। उसे नीलमत के संकलन किया था। राजाओं के नामों का सम्बन्ध विचारों का अध्ययन किया था। देव मन्दिरों, नगरों, किसी न किसी मन्दिर, मूर्ति, अग्रहार, तथा ग्रामों ताम्रपत्रों, शासनपत्रों, प्रशस्ति पत्रों एवं अन्यान्य से रहा होगा। उनके साथ कोई न कोई गाथा जोड़ शास्त्रों के अध्ययन से अपना भ्रम दूर कर, उसने दी गयी होगी, अतएव हेलाराज ने इतिहास उन राजतरंगिणी लिखने में हाथ लगाया था। उक्त आधारों पर लिखा होगा ।

प्रथम तरंग ९५ शतेषु षट्सु सार्धेषु त्र्यधिकेषु च भूतले । कलेर्गतेषु वर्षाणामभूवन् कुरुपाण्डवाः ॥ ५१ ॥ ५१. कलियुग के छः सौ तिरपन वर्ष व्यतीत हो गये तो इस भूतल पर कौरव एवं पाण्डव हुए थे । पद्ममिहिर ने अशोक के पूर्व कालीन ५२ राजाओं तथा लव के पश्चात् ८ राजाओं का और वर्णन किया है। पद्म मिहिर ने इन आठो नामों को हेलाराज की पुरानी पुस्तक 'पार्थिवावली' से लिया था । इतिहासकार छविल्लकार ने बावन राजाओं में अशोक से अभिमन्यु तक के पाँच राजाओ का और वर्णन किया है। इस लेखक के विषय में विशेष जानकारी नहीं है। अशोक, जलोक, दामोदर, हुष्क, जुष्क, कनिष्क का वर्णन कल्हण ने इसी कवि के आधार पर राजतरंगिणी में किया है। पाठभेद : श्लोक संख्या ५१ में 'मभूवन्' का पाठभेद 'मभवन्' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ५१. क्षेमेंद्र के लगभग एक शताब्दी पश्चात् अर्थात् सन् ११४८-११४९ ई० में कवि कल्हण ने राजतरंगिणी की रचना की थी। कल्हण के लगभग ३०० वर्ष पश्चात् जोनराज ने (सन् १४७१-१४७२ ई०) में मुसलिम शासन-काल में राजतरंगिणी लिखी । श्रीवर ने जैन राजतरंगिणी सन् १४८६ ई० में कश्मीर के बादशाह जैनुल आबदीन के समय में लिखी थी। प्रज्ञाभट्ट ने सन् १५१२ ई० में राजावलो पटक लिखा। कश्मीर के संस्कृत इतिहासकारों में शुक ने अपनी राजतरंगिणी सन् १५९६ ई० में लिखी थी। वह प्राचीन शैली का अन्तिम लेखक था। उसके पश्चात् किसी प्रसिद्ध किंवा अप्रसिद्ध इतिहासकार का पता नहीं चलता। जिसकी लेखनी वैज्ञानिक ढंग से कश्मीर का वास्तविक इतिहास लिखती। इसके पश्चात् मुसलिम इतिहास लेखकों का काल आता है। वे प्राचीन भारतीय शैली परम्परा तथा संस्कृत ज्ञान से अनभिज्ञ थे। अतएव उनका लेखन भ्रामक हो गया है। सुलतान सिकन्दर बुतशिकन (१३६३-१४१६ ई०) के समय में प्रायः सभी प्राचीन तथा हिन्दू धर्म सम्बन्धी ग्रन्थ जलवा दिये गये। शेष को जल समाधि दे दी गयी। अथवा किसी प्रकार नष्ट कर दिये गये । सुलतान जैनुल आबदीन ने १५ राज- तरंगिणियों का पता लगाया था। परन्तु आज वे प्राप्त नहीं हैं। उनके नाम का पता अभी तक नहीं चल सका है। यदि वे मिल जांय तो कश्मीर के इतिहास पर कुछ और प्रकाश पड़ सकता है। कल्हण ने लौकिक संवत् ४२२४ तदनुसार सन् ११४८-११४९ ई० में राजतरंगिणी लिखी। सन् १३३६ ई० में कोटा रानी के पश्चात् मुसलिम शासक कश्मीर में हुए। मुसलिम अधिकार में कश्मीर रणजीत सिंह के समय तक रहा। सिकन्दर बुतशिकन (सन् १३८९-१४१६ ई०) का समय कश्मीर के इतिहास का भयंकर काल था। सभी मन्दिर नष्ट कर दिये गये। पुस्तकें फूंक दी गयीं। केवल ११ ब्राह्मण घरों के अतिरिक्त सभी मुसलमान हो गये थे। कुछ भी इतिहास सामग्री शेष नहीं रह गयी। जैनुल आबदीन बादशाह (सन् १४२०-७० ई०) के समय जोनराज ने (१४७१-१४७२ ई०) राजतरं- गिणी लिखना प्रारम्भ किया। कल्हण की मृत्यु के ३२१ वर्ष पश्चात् पुनः राजतरंगिणी की श्रृंखला जोड़ी गई। उसने सन् प्रायः ११५० से जैनुल आवदीन के काल तक का इतिहास लिखा। जैनुल आवदीन के जीवन काल

२६ राजतरंगिणी लौकिकेऽब्दे चतुर्विंशे शककालस्य सांप्रतम् । सप्तत्याऽभ्यधिकं यातं सहस्रं परिवत्सराः ॥ ५२ ॥ ५२. लौकिक संवत् का चौबीसवां वर्ष है; इस प्रकार संवत् के एक हजार सत्तर वर्ष अब तक व्यतीत हो चुके हैं।

श्रीवर ने तृतीय राजतरंगिणी लिखी। इसमें जैनुल आवदीन से मुहम्मद शाह ( सन् १४८४ ई० ) तक का वर्णन मिलेगा । उसने अपनी आंखो देखा वर्णन किया है। श्रीवर के पश्चात् श्री प्रजाभट्ट ने राजा- वली पिटक लिखा। उसने सन् १४८५ से सन् १५१३ ई० अर्थात् लौकिक संवत् ६१ से ८६ तक अर्थात् २८ वर्ष का मुहम्मद शाह ( सन् १४८४- १४८६ ) तथा फतह शाह (सन् १४८६-१५१४ ई०) का इतिहास दिया है। तत्कालीन अराजकता से ऊबकर प्रजाभट्ट ने आगे नही लिखा। प्रजाभट्ट ने जहाँ तक लिखा था उसके पश्चात् बुध्यात्मज के पुत्र शुक ने मुगल शासन काल तक का इतिहास लिखा है। इसी को चौथी राजतरंगिणी की संज्ञा दी गयी है। उसने फतह शाह ( सन् १४८६-१५१४ ई० ) के समय से लेकर मोमरा खाँ (सन् १५७८-१५८६) तक अर्थात् किस प्रकार जलालुद्दीन अकबर ने कश्मीर को अपने राज्य मे मिलाया। लगभग १०० वर्षों की घटनाओ का वर्णन किया है। शुक ने अपनी राजतरंगिणी में मंगलाचरण के पश्चात् कल्हण के प्रायरुथन की शैली अपनाया है। उसने अपने पूर्व के इतिहासकारों का वर्णन किया है। भारतीय संस्कृत साहित्य तथा कश्मीर का यह अन्तिम इतिहास ग्रन्थ है। चारो राजतरंगिणियो की विशेषता यह है कि निष्पक्ष रूप से विचारो को व्यक्त किया गया है। इसके पश्चात् मुमलिम इतिहासकारो का उदय होता है। सबका आधार राजतरंगिणी है। परन्तु उसे तोड़-मरोड़ कर रखने का प्रयास किया गया है। साधिकारिक कश्मीर के इतिहास का वर्णन पुनः अकबर के राज्यकाल में मिलता है। अकबर के नवरत्न तथा मन्त्री अबुल फजल ने आइने अकबरी मे 'सूबा कश्मीर' पर एक अध्याय लिखा है। उसमें कश्मीर के हिन्दू राजाओं और मुगलों तक हुए मुस्लिम राजाओ की तालिका दी गयी है। उनका संक्षिप्त वर्णन लिखा गया है। कश्मीर की तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था, रीति-रिवाज, तौल, बाट, शासन और दर्शनीय स्थानों का वर्णन निष्पक्ष भाव से किया गया है। आज तक लिखे इतिहासों का मूल साधिकारिक स्रोत, उक्त ग्रन्थ है। अतएव मैंने भी उनका ही आश्रय लिया है। मध्यकालीन तथा कुछ आधुनिक लेखको ने जिस तरह कश्मीर के इतिहास को तोड़-मरोड कर उसे दूसरे रंग मे डालने का प्रयास किया है। उसका मैने उदाहरण देकर आलोचना की है। सर्व साधारण में उनके लेखों के कारण भ्रम उत्पन्न हो गया है। पाठभेद : श्लोक संख्या ५२ में 'त्याभ्यधि' का पाठभेद 'त्याह्यधि' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ५२ (१) लौकिक संवत् : कश्मीरी संवत् को लौकिक किंवा सप्तर्षि संवत् कहते हैं। अल्बेरुनी ने अपने पर्यटन वर्णन में काश्मीरी संवत् का उल्लेख किया है। कश्मीर में शताब्दी छोड़कर लिखने की प्रथा है। अतएव शताब्दी न देकर केवल चौबीस का उल्लेख कल्हण ने किया है। सन् ईसवी लिखते समय आज भी प्रथा है कि १९६८ न लिखकर केवल ६८ लिखा जाता है। अतएव लौकिक वर्ष २४ का अर्थ है २४२४ लौकिक वर्ष। वह जिस समय राजतरं- गिणी लिख रहा था उसका लौकिक संवत् देता है। इस प्रकार उसका राजतरंगिणी का रचना काल साधिकारिक रूप से प्रकट हो जाता है।

प्रथम तरंग ९७ प्रायस्तृतीयगोनन्दादारभ्य शरदां तदा । द्वे सहस्रे गते त्रिंशदधिकं च शतत्रयम् ॥ ५३॥ ५३. प्रायः१ गोनन्द तृतीय के राज्याभिषेक से अबतक २३३० वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। वर्षाणां द्वादशशती षष्टिः षड्भिश्च संयुक्ता । भूभुजां कालसंख्यायां तद्द्वापञ्चाशतो मता ॥ ५४ ॥ ५४. उन बावन लुप्त राजाओं का राज्य काल ऐसा मत है कि १२६६ वर्ष होता है। ऋक्षादृक्षं शतेनाब्दैर्यात्सु चित्रशिखण्डिषु । तच्चारे संहिताकारैरेवं दत्तोऽत्र निर्णयः ॥ ५५ ॥ ५५. सप्तर्षि एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र पर एक सौ वर्षों में जाते हैं। इस प्रकार की गति के कारण संहिताकार ने इस समस्या के निराकरण निमित्त हल निकाल दिया है।

कलि संवत् पच्चीस चैत्र सुदी एक को ईसापूर्व ३०७५-७६ होता है। शक संवत् सन् ईस्वी से ७८ वर्ष पश्चात् आरम्भ होता है। कल्हण ने राज- तरंगिणी की रचना शक संवत् १०७० में प्रारम्भ की थी । यह काल लौकिक संवत् का ४२२४ वाँ वर्ष होता है। यह कश्मीरी संवत् अबतक कश्मीर तथा उसके आस पास पर्वतीय क्षेत्र में चलता है। लौकिक संवत् २५ कलि संवत् से आरम्भ होता है। शक संवत् का प्रारम्भ ३१५४ वर्ष में होता है। कल्हण के और शक संवत् के समय में १०७० वर्ष का अन्तर होता है। इस प्रकार ३१५४ + १०७० वर्ष मिलकर ४२२४ वर्ष हो जाते हैं।

पाठभेद : श्लोक संख्या ५३ में 'गोनन्दादा' का पाठभेद, 'गोनर्दादा' मिलता है ।

पादटिप्पणियाँ : ५३ (१) प्राय — प्रायः शब्द का प्रयोग कल्हण ने किया है। वह निश्चित रूप से समय निर्धारित नही कर सका है। उसके समय जो कुछ सामग्री प्राप्त थी उसी पर उसने मोटे तौर पर हिसाब लगाया था ।

श्लोक संख्या ४८ में दिया गया वर्ष काल २२६८ वर्ष है। कल्हण के दिये 'राजत्व के वर्ष कालों का योग तरंग दो से आठ तक का १३२८ वर्ष मोटे तौर पर होता है। इस २२६८ वर्ष मे तरंग एक के राजाओं का १२६६ वर्ष दिया काल श्लोक सं० ५४ का घटा दें तो १००२ वर्ष आता है। यह काल गोनन्द तृतीय से युधिष्ठिर प्रथम का राजत्व काल होता है। यदि वर्ष काल १३२८ + १००२ का योग कर दिया जाय तो २३३० वर्ष काल आता है। यही काल गोनन्द तृतीय से कल्हण तक का राज्य काल होगा ।

५४ (१) मत : कल्हण ने मत शब्द का यहाँ प्रयोग किया है। उसने काल गणना स्वयं की थी । तत्कालीन प्राप्त सामग्रियों के आधार पर वह एक निश्चित 'मत' पर पहुँचा होगा । अतएव इस श्लोक में उसने अपना मत प्रकट किया है। किसी प्राचीन काल गणना के आधार पर निश्चयात्मक बात नहीं कहा है। मत में विभिन्नता हो सकती है। कोई मत नही मान सकता । अथवा भविष्य में यह मत गलत हो सकता है। किन्तु एक बात निश्चयात्मक रूप से कह देने से वह प्रमाण मान लिया जाता है। कल्हण स्पष्ट संकेत करता है कि यह काल गणना स्वतः प्रमाण नहीं किन्तु मत मात्र है ।

पाठभेद : श्लोक सख्या ५५ में 'तच्चारे' का पाठभेद 'उच्चारे' मिलता है ।

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९८ राजतरंगिणी आसन्मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ । षड्द्विकपञ्चद्वियुतः शककालस्तस्य राज्यस्य ॥ ५६ ॥ ५६. जिस समय राजा युधिष्ठिर पृथ्वी पर शासन कर रहे थे उस समय मुनि१ मघा२ पर थे । युधिष्ठिर३ का राज्य काल शक संवत् से २५२६ वर्ष पूर्व था । पादटिप्पणियाँ : ५५ (१) संहिता : यहाँ पर संहिताकार से तात्पर्य बृहत्संहिताकार से है । कल्हण यहाँ बृहत् संहिता का ( १२ : ३ ) उल्लेख करता है । कल्हण ने उक्त श्लोक संख्या ५१ मे जिस मत का प्रतिपादन किया है। उसके प्रमाण में बृहत् सहिता का उल्लेख करता है। इस प्रकार कुरु पाण्डव और गोनन्द प्रथम का काल शक संवत् से २५२६ वर्ष पूर्व है। यह समय कलि संवत् ६५३ होता है । ५६ (१) मुनि का अर्थ यहाँ सप्तर्षि से है । (२) मघा से तात्पर्य मघा नक्षत्र से है । (३) युधिष्ठिर : युधिष्ठिर के राज्याभिषेक का समय कल्हण प्रथम गोनन्द का प्रथम वर्ष राजत्व काल देता है। यही समय उसने अपनी काल गणना के लिये आधार माना है । राजतरंगिणी श्लोक १८४ मे कल्हण गोनन्द प्रथम का पौत्र गोनन्द द्वितीय को कहता है । कल्हण गोनन्द द्वितीय को महाभारत काल का सम- कालीन मानता है । इसमे कोई विरोध नही मालूम होता। युधिष्ठिर के अभिषेक तथा महाभारत युद्ध काल के आरम्भ मे वर्षों का अन्तर है। इस मध्य- वर्ती काल मे एक राजा का घोर हो जाना कोई असम्भव नही बात मालूम पडती । महाराज युधिष्ठिर के काल निर्णय के सम्बन्ध में विभिन्न मत हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ने उद्धव से श्रीमद्भागवत (एकादश स्कन्ध) मे कहा है कि उनकी मृत्यु के पश्चात् कलियुग का प्रवेश होगा। कल्हण कहता है कि मघा नक्षत्र पर जब सप्तर्षि थे । उस समय युधिष्ठिर राज्य कर रहे थे । श्री- मद्भागवत के बारहवें स्कन्ध के द्वितीय भाग में उल्लेख है कि जब सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर होंगे तब कलियुग का प्रवेश होगा। जिस दिन भगवान् श्रीकृष्ण का स्वर्गारोहण होगा उसी दिन कलियुग का आरम्भ होगा। कल्हण वराहमिहिर की तिथि मानता है। युधिष्ठिर शक संवत् से २५२६ वर्ष पूर्व हुए थे। अर्थात् कलि सवत् ६५३ था । दूसरे वह मानते हैं कि गोनन्द कलियुग के आरम्भ मे हुआ था। इस मत के मानने वाले कहते हैं कि महा- भारत द्वापर के अन्त में हुआ था । कल्हण और नीलमत पुराण दोनों गोनन्द से काश्मीर का इतिहास प्रारम्भ करते हैं। कलि संवत् का आरम्भ ३१०१ वर्ष ई० पू० से माना जाता है। यहोल के जैन शिलालेख से प्रकट होता है कि यहोल मन्दिर का निर्माण राजा पुलकेशिन द्वितीय चालुक्य वंशीय ने महाभारत के ३७३५ वर्ष पश्चात् अर्थात् वर्तमान प्रचलित शक संवत् ५५६ में कराया था । इस प्रकार स्पष्ट होता है कि इस समय के प्रचलित शक सवत् के ३१९७ वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ था । आइने अकबरी मे अबुलफजल लिखता है कि विक्रमादित्य से ३०४४ वर्ष पूर्व युधिष्ठिर राजा हुए थे । राजतरंगिणी के प्रथम तरंग के श्लोक ४४ तथा ४९ से प्रकट होता है कि महाभारत द्वापर के अन्त में हुआ था । मिताक्षरा की भूमिका में श्री बापूदेव शास्त्री लिखते हैं कि कलियुग की प्रथम शताब्दी में परीक्षित् का जन्म हुआ था। राजा

प्रथम तरंग ९९ कश्मीरेन्द्रः स गोनन्दो वेल्लद्गङ्गादुकूलया । दिशा कैलासहासिन्या प्रतापी पर्युपास्यत ॥ ५७ ॥ ५७. वह दिशा १ जिसका तुषार मण्डित जाज्वल्यमान कैलास हास था, जिसका दुकूल कल्लोलिनी गंगा थी २, प्रतापी काश्मीरेन्द्र गोनन्द ३ की उपासना करती थी । जनमेजय के समय कलियुग के १२५ वर्ष व्यतीत हो चुके थे । श्री तारानाथ तर्कवाचस्पति का मत है कि कलियुग के ८० वर्ष बीतने पर राजा परीक्षित का जन्म हुआ था । ज्योतिष ग्रंथ खंड-खाद्य के रचनाकार ब्रह्मगुप्त थे । ( शक ५२० संवत् ) उसने प्राचीन ज्योतिष आर्यभट के आधार पर गणना की है कि विक्रमा- दित्य के समय कलि के ३०४४ वर्ष व्यतीत हो चुके थे । निर्णय सिन्धु से मालूम होता है कि शक संवत् में यदि ३१७९ वर्ष और जोड़ दिया जाय तो कलि- युग का आरम्भ तथा युधिष्ठिर के राज्यकाल का ज्ञान हो जायगा । नीलमत पुराण में गोनन्द का उल्लेख आता है । कल्हण ने गोनन्द सम्बन्धी सामग्री नीलमत से ली होगी । वहाँ नीलमत का कुछ श्लोक उद्धृत करना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित होगा । इममर्थं पुरा जातु गोनन्दाख्यो नृपोत्तमः । तीर्थयात्राप्रसंगेन बृहदश्वमुपागतम् ॥ २८ : ४८ गोनन्द उवाच : मन्वन्तरेषु पूर्वेषु नासीद्देशमिमं किल । काश्मीराख्यं बभूवास्मिन्कथं वैवस्वतेऽन्तरे ॥ २९ : ५० एवमुक्त्वा स गोनन्दो बृहदश्वेन भूभुजा । ३७२ : १५८ एवमुक्तोऽपि गोनन्दो बृहदश्वेन भूमिप । प्रावर्तयत् समुच्छिन्नानाचारान् कालदोषतः ॥ ८७५ : १०४६ काश्मीरकस्तु गोनन्दो बृहदश्वेन भाषितम् । श्रुत्वा स्वकीयम् आचारम् किमपृच्छदतः परम् ॥ ७७८ : १०४९ वैशम्पायन : काश्मीरकस्तु गोनन्दो बृहदश्वेन भाषितम् । श्रुत्वोवाच मुनिश्रेष्ठं बृहदश्वं नराधिपः ॥ ८७९ : १०४९ वैशम्पायन उवाच : एवमुक्त्वा स गोनन्दं बृहदश्वो नराधिपम् । धर्मात्मा तीर्थयात्रार्थं जगामाभीप्सितां गतिम् ॥ १३६६ : १५८२ बहु मेने तथात्मानम् गोनन्दः समरप्रियः । स प्रशास वसुधां राजा धर्मानुसारतः ॥ १३७९ : १५८३ गोनर्द और गोनन्द दो भिन्न नाम है । गोनर्द एक प्रदेश का नाम है । हेमचन्द्र ने गोनर्द को योग- सूत्र तथा महाभाष्य के रचयिता पतञ्जलि मुनि का निवास स्थान माना है । गोनर्द उत्तर प्रदेश के गोण्डा जिला का प्राचीन नाम है । गोनर्द व्यक्ति विशेष का नाम भी हो सकता है । पाठभेद : 'कश्मारेन्द्रा' का 'काश्मीरेन्द्रः'; 'नन्दा' का नदों' तथा 'दुकूलया' का 'दुगूलया' पाठभेद मिलता है । टिप्पणियाँ : ५७ (१) दिशा : यहाँ दिशा का अर्थ उत्तर दिशा होगा । कैलास तथा गंगा दोनो उत्तर दिशा मे हैं । कश्मीर स्वतः उत्तर दिशा में हैं । कश्मीर की सीमा का भी वर्णन परोक्ष रूप से कल्हण ने किया है।

तृतीय तरङ्ग: मेघवाहन, मातृगुप्त व प्रवरसेन का शासन

१०० राजतरंगिणी विहाय देहं शेषाहेर्र्विषाश्लेषभयादिव । भूर्गारुत्मतरत्नाङ्के भेजे तस्य भुजे स्थितिम् ॥ ५८ ॥ ५८. पृथ्वी शेषनाग के विष के भयभीत होकर शेष नाग के शरीर का त्याग कर गरुड़ के पवित्र रत्नों द्वारा आभूषित राजा की भुजाओं का आश्रय थी।

काश्मीर के उत्तर पूर्व निस्सन्देह कैलास है। गंगा काश्मीरो सिन्धु नदी को गंगा तथा वितस्ता का पूर्व में पडती है। वह कश्मीर की कभी सीमा यमुना कहा गया है। नीलमत पुराण का उल्लेख नहीं हो सकती। किन्तु कश्मीर में गंगा से अभि- यहाँ संगत होगा। प्राय सिन्धु नदी से भी लिया जाता रहा है। नील- गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता यमुना तथा।' मत पुराण के पद- 'गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता —294 : २९७-२१८ यमुना तथा' से प्रतीत होता है कि यहाँ उस सिन्धु ५७ (३) गोनन्द : गोनन्द काल से सीमा का से तात्पर्य है जो दरस उपत्यका से प्रवाहित होती अनुमान किया जा सकता है। नीलमत पुराण में इस काश्मीरी प्रयाग के समीप वितस्ता में आकर मिलती काल का उल्लेख है : है। जोनराज भी सिन्धु से मनसबल सरोवर कुरुपाण्डववेलायां भूमिर्भगवता स्वयम् । में नहर लाने की बात का उल्लेख करता है। प्राचीन पाचित्वाभूरितिसुतानवतीर्णान् जघान यत् ॥ लेखकों ने सिन्धु का उद्गम गंगा झील अर्थात् गंगबल 10 : १० के उत्तर पूर्व हरमुख शिखर के हिमानी को माना तस्मिन् कालेऽथ सम्भूतू राजा विशदकीर्तिमान् । है। कश्मीर में अनेक जल स्रोतों को गंगा नाम काश्मीरान् पालयन् सौम्य गोनन्द इति संज्ञया ॥ दिया गया है। यहाँ दुकूल अर्थात् सूक्ष्म वस्त्र से 11 : ११ अर्थ इसी नदी से लगाना चाहिए। मैं जोजिला युधिष्ठिर तथा अर्जुन के नामो का उल्लेख मुझे पास से श्रीनगर लौट रहा था। मार्ग में सडक नीलमत में नहीं मिला। कश्मीर के प्रसिद्ध नागों सिन्धु के तट से जाती है। मुझे कल्हण का यह में युधिष्ठिर तथा अर्जुन का नाम आता है। महा- श्लोक याद था। सिन्धु का जल पाषाण शिलाओं से भारत के राजा तथा उसके पात्र के रूप में वर्णन टकराता उछलता इस प्रकार चलता है कि मालूम नही मिलता। पडता है उज्ज्वल महीन दुकूल हवा में भर कर उड़ने हवोत्सवः शठः शाक्यः शत्रुघ्नो रामलक्ष्मणौ । की कोशिश कर रहा है। यह मत मान्य नहीं किया महादेवः कामपालो गोशिराः सयुधिष्ठिरः ॥ जा सकता कि इस श्लोक द्वारा कश्मीर मण्डल की 913 : १०७९ : १०८० सीमा गोनन्द के समय कैलास तथा वर्तमान गंगा पानीयइचाप्यनीकश्च कनकाख्यः कलिककः । नदी अर्थात् उत्तर प्रदेश तक थी। अर्जुनः पौण्डरीकश्च धनदो नदकूबरः ॥ 886 : १०५६ (२) गंगा- काश्मीरी साहित्य में सिन्धु को पाठभेद : गंगा अर्थात् उत्तर गंगा नाम से सम्बोधित किया श्लोक स० ५८ में 'देहम्' का 'दिशम्'; 'विषाश्ले' गया है। यह हरमुख शिखर के ईशान कोणीय को 'दोर्विषाश्ले' तथा 'रत्नाङ्के' का 'रत्नाङ्के' हिमानी अर्थात् ग्लेशियर के अधोभाग में है। सिन्धु पाठभेद मिलता है। नदी द्रस उपत्यका तथा हरमुख पर्वत के उत्तरी पर्व- तीय क्षेत्रों के जल को ग्रहण करती है। वितस्ता की सिन्धु सबसे बड़ी शाखा नदी है।

[Page Header] प्रथम तरंग १०१

[Verse 59] साहायकार्थमाहूतो जरासन्धेन बन्धुना । स संरुरोध कंसारेर्मथुरां पृथुभिर्बलैः ॥ ५९ ॥

[Hindi Translation] ५९. अपने बन्धु जरासन्ध १ के सहायतार्थ आवाहन पर राजा गोनन्द ने २ कंस के शत्रुओं को मथुरा नगर में अपनी सेना से घेर लिया ।


[Left Column] पादटिप्पणियाँ : ५८ गरुडप्रियरत्न : गरुड का प्रिय रत्न मरकत किंवा हरिमणि । यहाँ कल्हण अत्यन्त सुन्दर रूपक खींचा है । इससे ज्ञात होता है । कल्हण ने शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन किया था । रत्नका गुण उसकी चमक किंवा ज्योति है । रत्न गरुड़ का आभूषण है । नाग तम हैं । उनका अति भयंकर विषैला रूप काला है । तम का रंग काला होता है । ज्योति एवं तम का संघर्ष विश्व का मूल है । गरुड़ तथा सर्पों किंवा नागों के परम्परा गत संघर्ष का यही आधार है । इसकी लाक्षणिक मूर्तियाँ कुषाण काल की मथुरा संग्रहालय में संग्रहीत है । गरुड का रूप विग्रह है । पुरुष एवं पत्नी का मिश्रित आकार नरसिंह के समान है । विष्णु के वाहन है । पक्षियों के राजा है । गरुड़ का मुख्य लक्षण गति है । यह गति छंद युक्त कही गयी है । भागवत में छंदोमय गरुड़ कहा गया है । बिना दो पंखों के गति नहीं होती । इसी प्रकार बिना दो पदों के छंद नहीं होता । गति एक छंद किंवा ताल युक्त क्रिया मानी गयी है । पंखों के सिकुड़ने और फैलनेसे पक्षी गतिशील होता है । वैदिक पुरुष इसी को संकुचन और प्रसारण कहते हैं । ऋग्वेद में गरुड़ को, अग्नि, इन्द्र, मित्र, वरुण आदि के समकक्ष रखा गया है । शेष नाग अर्थात् अन्धकार से पृथ्वी भयभीत होती है । अन्धकार ज्योति से दूर होता है । गरुड़ को देखते ही अन्धकार किंवा नाग भागते हैं । कल्हण गोनन्द की भुजाओं पर गरुड़प्रिय रत्नों का उल्लेख कर बताना चाहता है कि राजा की

[Right Column] भुजाओं में अमित बल था । वे पृथ्वी को भयहीन, अन्धकार हीन करने की भुजबल से सामर्थ्य रखते थे ! पाठभेद : श्लोक संख्या ५९ में 'स संरु' का पाठभेद 'समं रु' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ५९ (१) जरासंध : जरासंध का पिता वायु पुराण के अनुसार नभग था । भागवत, विष्णु तथा मत्स्य पुराणों के मतानुसार वह बृहद्रथ का पुत्र था । अतएव जरासंध को बार्हद्रथि भी कहते हैं । हरिवंश पुराण के अनुसार उसके पिता का नाम संभव था । काशीराज की दो युगल कन्याएँ थी । उन दोनों से बृहद्रथ ने विवाह किया था । उन्हें बहुत दिनों तक सन्तान नहीं हुई । काक्षोवत पुत्र चन्द्रकौशिक ने राजा को पुत्रप्राप्ति निमित्त एक आम का फल दिया । राजा ने दोनो पत्नियों को आधा आधा फल खिला दिया । कालान्तर में दोनों रानियों के गर्भ से आधा आधा शरीर के बालक उत्पन्न हुए । उन्होंने नवजात शिशु के चौराहा पर रखवा दिया । जरा नामक राक्षसी ने उन्हें जोड़ दिया अर्थात् दोनो टुकड़ों को सन्धि में मिला दिया । शिशु जी उठा । राक्षसी उसे ले जाना चाहती है । बालक रोने लगा । रुदन सुनकर राजा बाहर आया । राक्षसी ने बालक राजा को दे दिया । बालक का नाम जरासंध पड़ा । ( महाभारत सभापर्व १६-१७ तथा मत्स्य पुराण ) भागवत के अनुसार बृहद्रथ के एक ही पत्नी के बालक के दो अलग अलग भाग पैदा हुए । जरा राक्षसी ने मन्त्र बल से उन्हें जोड़ दिया । अतएव उसका नाम जरासंध पड़ा । ( भागवत ९:२१-२२)

१०० राजतरंगिणी विहाय देहं शेपाहेर्विपक्षश्लेषभयादिव । भूर्गारुत्मतरत्नाङ्के भेजे तस्य भुजे स्थितिम् ॥ ५८ ॥ ५८. पृथ्वी शेषनाग के विष के भयभीत होकर शेष नाग के शरीर का त्याग कर गरुड़ के पवित्र रत्नों¹ द्वारा आभूषित राजा की भुजाओं का आश्रय थी ।

काश्मीर के उत्तर पूर्व निस्संदेह कैलास है । गंगा पूर्व में पडती है। वह कश्मीर की कभी सीमा नहीं हो सकती । किन्तु कश्मीर में गंगा से अभि- प्राय सिन्धु नदी से भी लिया जाता रहा है । नील- मत पुराण के पद-'गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता यमुना तथा' से प्रतीत होता है कि यहाँ उस सिन्धु से तात्पर्य है जो दरस उपत्यका से प्रवाहित होती काश्मीरी प्रयाग के समीप वितस्ता में आकर मिलती है। जोनराज भी सिन्धु से मनसाबल सरोवर में नहर लाने की बात का उल्लेख करता है। प्राचीन लेखकों ने सिन्धु का उद्गम गंगा झील अर्थात् गंगबल के उत्तर पूर्व हरमुख शिखर के हिमानी को माना है। कश्मीर में अनेक जल स्रोतो को गंगा नाम दिया गया है। यहाँ दुकूल अर्थात् सूक्ष्म वस्त्र से अर्थ इसी नदी से लगाना चाहिए । मैं जोजिला पास से श्रीनगर लौट रहा था । मार्ग में सड़क सिन्धु के तट से जाती है। मुझे कल्हण का यह श्लोक याद था। सिन्धुका जल पाषाण शिलाओ से टकराता उछलता इस प्रकार चलता है कि मालूम पडता है उज्ज्वल महीन दुकूल हवा में भर कर उड़ने की कोशिश कर रहा है। यह मत मान्य नहीं किया जा सकता कि इस श्लोक द्वारा कश्मीर मण्डल की सीमा गोनन्द के समय कैलास तथा वर्तमान गंगा नदी अर्थात् उत्तर प्रदेश तक थी ।

(२) गंगा - काश्मीरी साहित्य में सिन्धु को गंगा अर्थात् उत्तर गंगा नाम से सम्बोधित किया गया है। यह हरमुख शिखर के ईशान कोणीय हिमानी अर्थात् ग्लेशियर के अधोभाग में है। सिन्धु नदी इस उपत्यका तथा हरमुख पर्वत के उत्तरी पर्व- तीय क्षेत्रों के जल को ग्रहण करती है। वितस्ता की सिन्धु सबसे बडी शाखा नदी है।

काश्मीरी सिन्धु नदी को गंगा तथा वितस्ता को यमुना कहा गया है। नीलमत पुराण का उल्लेख यहाँ संगत होगा । गंगा सिन्धुस्तु विज्ञेया वितस्ता यमुना तथा ।' —294 : २४७-२४८

५७ (३) गोनन्द : गोनन्द काल से सीमा का अनुमान किया जा सकता है। नीलमत पुराण में इस काल का उल्लेख है : कुरुपाण्डववेलायां भूमिर्भगवता स्वयम् । पाविताभूरितिसुतानवतीर्णान् जघान यत् ॥ 10 : १० तस्मिन् कालेऽत्र समभूत् राजा विशदकीर्तिमान् । काश्मीरान् पालयन् सौम्य गोनन्द इति संशया ॥ 11 : ११

युधिष्ठिर तथा अर्जुन के नामो का उल्लेख मुझे नीलमत में नही मिला । कश्मीर के प्रसिद्ध नागों मे युधिष्ठिर तथा अर्जुन का नाम आता है। महा- भारत के राजा तथा उसके पात्र के रूप मे वर्णन नहीं मिलता । हवोत्प्लवः शठः शाण्यः शत्रुघ्नो रामलक्ष्मणौ । महादेवः कामपालो गोशिराः सयुधिष्ठिरः ॥ 913 : १०७९ : १०८० पानीयश्चाप्यर्नाकश्च कनकाख्यः कलिंककः । अर्जुनः पौण्डरीकश्च धनदो नदकूबरः ॥ 886 : १०५६

पाठभेद : श्लोक सं० ५८ में 'देहम्' का 'दिशम्'; 'विपक्षश्ले' की 'ह्यैवंपक्ष्ले' तथा 'रत्नाङ्के' का 'रत्नाङ्गे' पाठभेद मिलता है ।

प्रथम तरंग १०१ साहायकार्थमाहूतो जरासन्धेन बन्धुना । स संरुरोध कंसारेर्मथुरां पृथुभिर्बलैः ॥ ५९ ॥ ५९. अपने बन्धु जरासन्ध १ के सहायतार्थ आवाहन पर राजा गोनन्द ने २ कंस के शत्रुओं को मथुरा नगर में अपनी सेना से घेर लिया ।

पादटिप्पणियाँ : ५८ गरुड़प्रियरत्न : गरुड़ का प्रिय रत्न मरकत किंवा हरित्मणि । यहाँ कल्हण अत्यन्त सुन्दर रूपक बाँधा है । इससे ज्ञात होता है । कल्हण ने शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन किया था । रत्नका गुण उसकी चमक किंवा ज्योति है । रत्न गरुड़ का आभूषण है । नाग तम है । उनका अति भयंकर विषैला रूप काला है । तम का रंग काला होता है । ज्योति एवं तम का संघर्ष विश्व का मूल है । गरुड़ तथा सर्पों किंवा नागों के परम्परा गत संघर्ष का यही आधार है । इसकी लाक्षणिक मूर्तियाँ कुषाण काल की मथुरा संग्रहालय में संग्रहीत हैं । गरुड़ का रूप विग्रह है । पुरुष एवं पत्नी का मिश्रित आकार नरसिंह के समान है । विष्णु के वाहन हैं । पक्षियों के राजा हैं । गरुड़ का मुख्य लक्षण गति है । यह गति छंद युक्त कही गयी है । भागवत में छंदोमय गरुड़ कहा गया है । बिना दो पंखों के गति नहीं होती । इसी प्रकार बिना दो पदों के छंद नहीं होता । गति एक छंद किंवा ताल युक्त क्रिया मानी गयी है । पंखों के सिकुड़ने और फैलनेसे पक्षी गतिशील होता है । वैदिक पुरुष इसी को संकुचन और प्रसारण कहते हैं । ऋग्वेद में गरुड़ को, अग्नि, इन्द्र, मित्र, वरुण आदि के समकक्ष रखा गया है । शेष नाग अर्थात् अन्धकार से पृथ्वी भयभीत होती है । अन्धकार ज्योति से दूर होता है । गरुड़ को देखते ही अन्धकार किंवा नाग भागते हैं । कल्हण गोनन्द की भुजाओं पर गरुड़प्रिय रत्नों का उल्लेख कर बताना चाहता है कि राजा की भुजाओ में अमित बल था । वे पृथ्वी को भयहीन, अन्धकार हीन करने की भुजबल से सामर्थ्य रखते थे ।

पाठभेद : श्लोक संख्या ५९ में 'स संरु' का पाठभेद 'समं रु' मिलता है ।

पादटिप्पणियाँ : ५९ (१) जरासंध : जरासंध का पिता वायु पुराण के अनुसार नभस् था । भागवत, विष्णु तथा मत्स्य पुराणों के मतानुसार वह बृहद्रथ का पुत्र था । अतएव जरासंध को बार्हद्रथि भी कहते हैं । हरिवंश पुराण के अनुसार उसके पिता का नाम संभव था । काशीराज की दो युगल कन्याएँ थीं । उन दोनों से बृहद्रथ ने विवाह किया था । उन्हें बहुत दिनों तक सन्तान नहीं हुई । काक्षीवत पुत्र चन्द्रकौशिक ने राजा को पुत्रप्राप्ति निमित्त एक आम का फल दिया । राजा ने दोनों पत्नियों को आधा आधा फल खिला दिया । कालान्तर में दोनों रानियों के गर्भ से आधा आधा शरीर के बालक उत्पन्न हुए । उन्होंने नवजात शिशु के चौराहा पर रखवा दिया । जरा नामक राक्षसी ने उन्हें जोड़ दिया अर्थात् दोनों टुकड़ों को सन्धि में मिला दिया । शिशु जी उठा । राक्षसी उसे ले जाना चाहती है । बालक रोने लगा । रुदन सुनकर राजा बाहर आया । राक्षसी ने बालक राजा को दे दिया । बालक का नाम जरासंध पड़ा । (महाभारत सभापर्व १६-१७ तथा मत्स्य पुराण) भागवत के अनुसार बृहद्रथ के एक ही पत्नी के बालक के दो अलग अलग भाग पैदा हुए । जरा राक्षसी ने मन्त्र बल से उन्हें जोड़ दिया । अतएव उसका नाम जरासंध पड़ा । (भागवत ९.२२.२८)

१०२ राजतरंगिणी तेनोपकूलं कालिन्द्याः स्कन्धावारं न्यभ्रता । याद्वीहसितैः सार्धं योधानां मीलितं यशः ॥ ६० ॥ ६०. कालिन्दी पुलिन १ में काश्मीरी सेना ने जिस समय अपना शिविर स्थापित किया उस समय यादवीय सेना का गौरव यादवी-ललनाओं की स्मित रेखाओं के साथ लुप्त हो गया । एकदा सर्वतो भग्नाः स्वसेनास्त्रातुमुद्यतः । तं संसरोध योद्धारं संगरे लाङ्गलध्वजः ॥ ६१ ॥ ६१. एक समय पलायनोन्मुख भग्न यादवी सेना की रक्षा निमित्त लांगलध्वज १ उस योद्धा (गोनन्द) से युद्ध में रत हुए ।


[बायाँ स्तम्भ] पाठभेद : श्लोक संख्या ६० में 'स्कन्धावारम्' का पाठभेद 'स्कन्डावारम्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ६० हरिवंश पुराण (२ : ३५) के अनुसार कश्मीराधिपति गोनन्द मथुरा के पश्चिमी घेरे की ओर अपनी सेना सहित युद्ध निमित्त तत्पर था । जरासंध के नेतृत्व में मथुरा चारो ओर से महा विशाल सेना द्वारा घेर ली गयी थी । निम्न रूप से चारो दिशाओं से घेरा डाला गया था । पूर्वीय मोर्चा और घेरे पर उलूक, कैतव, अंशुमान राजा का पुत्र एकलव्य, बृहत्क्षत्र, बृहद्धर्मन्, जयद्रथ, उत्तमो जस, शल्य, कौरव, कैकेय, वैदेशि, वामदेव, तथा शिनि देश का राजा साकृति था । पश्चिमी मोर्चों पर—मद्रराज, कलिगपति, चेकितान, वाह्निक, काश्मीर राज गोनन्द कस्पेश द्रुमराज, किम्पुरुष, तथा पर्वतीय राज अनामय था । उत्तरीय मोर्चों पर—पुरुकुलोत्पन्न, वेणुदारि, विदर्भाधिपति सांवरू राज, भोजेश्वर रुक्मिन्, शूर्पाक्ष तथा मालवेश, अवन्ति देश के विद तथा अनुविंद, दन्तवक्त्र, छागलि, पुरमित्र, विराट्, शौरभ्य, मालव, शतधन्वा, विदूरथ, भूरिश्रवा, त्रिगर्त, बाण एवं पंचनद के राजा एवं योद्धा गण एवं दक्षिणी मोर्चों पर-दरद, चेदिराज तथा स्वयं जरासंध था ।

[दायाँ स्तम्भ] राजाओ तथा योद्धाओं की यह तालिका अपूर्ण है । उनके नामों में भी विभिन्नता है । किन्तु गोनन्द कश्मोरराज का नाम सभी सूचियों में है । (हरिवंश पुराण २ : ३४) अतएव यह प्रमाणित और निर्वि- वाद हो जाता है कि नीलमत पुराण तथा कल्हण वर्णित यह बात साधिकार प्रमाणित है कि गोनन्द कश्मोरराज जरासंध का पक्ष लेकर मथुरा के आक्रमण मे सम्मिलित था । श्री कृष्ण की ओर से युद्ध में भाग लेने वाले राजाओं का नाम स्पष्ट नहीं मिलता । महाभारत सभा पर्व (१४ : ३५) से इतना ही मालूम होता है कि १८ कुलों ने मिलकर जरासंध के आक्रमण का सामना करने की योजना बनायी थी । पाठभेद : श्लोक संख्या ६१ में 'भग्ना' का 'भग्नां' तथा 'स्वसेना' का पाठभेद'स्वमेवा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ६१ लांगल ध्वज-इसका शब्दिक अर्थ हलध्वज होता है । यहाँ बलराम किंवा बलभद्र के लिये आया है । बलभद्र आयु में श्री कृष्ण से तीन मास ज्येष्ठ थे । पिता वसुदेव तथा माता रोहिणी थी । इस प्रकार श्री कृष्ण विमातृ भाई थे । ये अत्यन्त सुन्दर थे । एतदर्थ इनको राम कहा जाता था । अत्यन्त बली थे । इसलिए 'बलराम' नाम पड़ गया । इनका नाम 'हली' 'हलायुध' 'सीरपाणि' 'मूसली' 'मुसलायुध' 'हलधर' आदि है ।