राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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९१ ( १ ) सुरेन्द्र : आइने अकबरी में सुरेन्द्रिर नाम दिया गया है । सुरेन्द्र का अर्थ इन्द्र होता है । हसन ने इसका शासन-काल ४७ वर्ष लिखा है । मुस्लिम इतिहासकारों ने लिखा है कि राजा की एक कन्या सतपनभानु थी । यह अत्यन्त सुन्दरी थी । उसकी सुन्दरता, यौवन तथा शालीनता की ख्याति सुनकर इफन्दियर का पुत्र बहमन उस पर मोहित हो गया । उसने भानु से विवाह कर लिया । अरदिशीर दिरजदेस्त के नाम से ईरान का बादशाह हुआ । वैदुद्दीन इतिहासकार के अनुसार—यह सम्बन्ध सुखकर नहीं हुआ । राजपुत्री के पिता, कश्मीर के राजा सुरेन्द्र के सम्बन्ध में बादशाह ने अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया । काश्मीर राजपुत्री की प्रेरणा पर बहमन मार डाला गया । हसन एक और विचित्र कहानी पेश करता है- 'राजा सिर्फ एक लड़की रखता था । कनालू नामी जो शक्ल व सूरत और इल्म व फन में मशहूर रोजगार थी । एक दिन एक ईरानी नाजिर कीमती जवाहरात लेकर बराए फरोख्त राजा की खिदमत में हाजिर हुआ । नावाकफियत की वजह से राजा को इनमें से एक भी पसन्द न आया । जिससे बेचारा बहुत ही शिकस्त- दिल हुआ । इन्तहाई मायूशी के पेशनजर नाजिर मजकूर कनालू की खिद- मत में गया । कनालू जो हर शनास थी, लेहाजा उसने एकदम तमाम जवाहरात ताजिर से खरीद लिए । 'वापसी पर सौदागर ने इस लडकी के हुस्न व जमाल और सलीफः की तारीफ अपने मुल्क के बादशाह बहमन असफंदयार से की । असफंदयार लडकी ना नादीदः आशिक हो गया । हकीम तानास्य को ख्वास्तगारी के लिए राजा के पास भेजा । राजा ने कनालू की मरजी को मुताबिक बहमन की दरखास्त मंजूर की और कीमती तोहफे व तहायफ के साथ अपनी लडकी उसके रजायी भाई लोलो हमराह बहमन के पास भेज दिया । बहमन पारजानी के साथ दाद ऐश देने में मशरूफ था कि कुछ वरष बाद अपने बीबी के रजाई भाई लोलो की गद्दारी से इस दुनिया से रुखसत हो गया । लोलो भी अपने फेल बद की सजा भुगतने से न बच सका । हसन का बयान किसी आधार पर आधारित नहीं है । विल्कुल बनावटी है । कश्मीर में मुसलिम शासन स्थापित होने पर बहुत से मुसलिम इतिहास- कारों ने कश्मीर का सम्बन्ध गैर हिन्दुस्तानी देशों से जोड़ने तथा हिन्दुओं को नीचा दिखाने का प्रयास किया है । उसी का यह एक नमूना है । कल्हण स्पष्ट लिखता है कि राजा सुरेन्द्र सन्तानहीन था । यदि हसन तथा मुसलिम इतिहास लेखकों की बात मान ली जाय कि राजा की एक कन्या थी और उसका विवाह ईरान के राजा से कर दिया गया था तो यह स्वाभाविक था कि कश्मीर मण्डल के राज्य का उत्तराधिकारी उसकी कन्या अथवा कन्या की सन्तान होती । ईरान का राजा तथा कश्मीर की राजकुमारी अपने अधिकार का अवश्य दावा करती । यदि राजकुमारी का पति उसकी अनुमति से मार डाला गया था तो इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि राजकुमारी का ईरान के राजनीतिक जीवन में प्रभाव था । अन्यथा राजा के वध-षड्यंत्र में सम्मिलित तथा सफल नहीं होती । राजा के वध के पश्चात् उसका ईरान की राजनीति में प्रवल हाथ होता । वह अपने निःसन्तान पिता का राज्य लेने का अवश्य प्रयास करती । किसी मुसलिम इतिहास- कार ने राजकुमारी का मारा जाना नहीं लिखा है । केवल हसन ने लिखा है कि राजपुत्री के रजाई अर्थात् धात्री भाई न ईरान के राजा की हत्या की और वह मारा गया । इसका एक दूसरा पहलू है । कल्हण कहता है । सुरेन्द्र का राज्य दूसरे कुल में चला गया । ऐसी स्थिति में राजा सुरेन्द्र अपनी एक मात्र सन्तान