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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 984 में से

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पृष्ठ 208

प्रथम तरंग १२५ अनर्घमहिमा दीर्घमघवृत्ताद्वहिष्कृतः । अथ साश्चर्यचयोऽभूत् सुरेन्द्रस्तत्सुतो नृपः ॥ ९१ ॥ सुरेन्द्र ९१. उसके पश्चात् उसका पुत्र सुरेन्द्र१ राजा हुआ । वह पापों से बहुत दूर था। उसमें असीमित महत्ता थी । उसके कार्यों से जगत् आश्चर्यित था । पादटिप्पणियाँ : ९० (१) खोनमुप : यह प्रसिद्ध वर्तमान ग्राम खनमोह है। पाम्पुरके उत्तर तथा उत्तर-पश्चिम लगभग ३ मील पर है। यह केशर की खेती के लिए प्रसिद्ध है। विक्रमांकदेवचरित के लेखक कवि विल्हण की जन्म-भूमि है। (वि० १८.७०:७) विक्रमादित्य त्रिभुवन मल्ल ने कल्याण में सन् १०७६ से ११२७ ई० तक राज्य किया था। यहाँ के मन्दिरों को मुस्लिम जियारत में परिणत कर दिया गया है। विल्हण जैसे महान् कवि का यहां स्मारक नही है। यह देखकर दुःख हुआ । स्थानीय ग्रामीणों से बातचीत की। किसी ने विल्हण का नाम जैसे यहाँ सुना हो नही है। यह नाम उनके लिए अपरिचित सा लगा। इस स्थान की क्यों प्रसिद्धि है किसी को कुछ मालूम नही। प्राचीन इतिहास लोग भूल गये हैं। श्रीनगर जाने वाली सड़क के वार्ड तरफ सटा एक नाग है। सड़क के नीचे पुश्ता बांधा गया है। सड़क के एक ओर उठता पहाड़ है। दूसरी तरफ नीचे के कुण्ड बने हैं। सड़क के पुश्ता के लगभग १५ फुट नीचे चोखटा कुण्ड बनाया गया है। जल सडक के नीचे नली से सरोवर होकर कुण्ड में पहुँचता है। जल दूसरी तरफ वाली पहाड़ी से आता है। जलस्रोत का जल उपयोगी बनाने के लिये दो कुण्ड चोकोर बने हैं। पहला कुण्ड सड़क के पुश्ता से सटा है। उसके दक्षिण कोण पर कुछ शिवलिंग तथा ठोस मन्दिराकार शिलाखण्ड रखे हैं। दूसरे कुण्ड में उतरने के लिए सीढ़ियां नाग की बाईं तरफ से बनी हैं। उन सीड़ियों के बाईं तरफ फर्श पर कुछ ठोस शिलाखण्ड मन्दिराकार रखे थे। स्नान करने के लिए एक स्त्री तथा एक पुरुष के लिए लकड़ी के स्नान गृह बने रखे थे। ग्राम की जनता मुसलिम है। मुसलिम स्त्रियां कुण्ड में वस्त्र धो रही थी। कुण्ड का जल गन्दा हो गया था । शहतूत के वृक्ष आस पास काफी हैं। बादाम के पेड़ इस ओर बहुत मिलेंगे। बादाम के बाग, शालो तथा केशर यहाँ की मुख्य कृषि है। स्थान रम्य है। ग्रामीण जनता सरल तथा भावुक है। कुण्ड के दक्षिण पार्श्व के बाग में मसजिद तथा जियारतें हैं। (२) खागी : वर्तमान ग्राम खाडा है। यह एक बड़ा ग्राम है। वोरू परगना में है। इसका उल्लेख रा० त० १:३४० में पुनः किया गया है। गोपा- दित्य ने खोंगिका अग्रहार स्वरूप इसका दान किया था। हैदर मलिक तथा नारायण कोल के इतिवृत्त के अनुसार काकपुर ग्राम है। यह ग्राम पाम्पुर के ऊपर स्थित है। उसे खागो कहा गया है। परन्तु इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। खागी से ३६ मोल उत्तर एक शैलबाहु बाहर निकला है। इसे पोष्कर कहते हैं। यह पीर पंजाल पर्वतमाला से मैदान की तरफ निकलता है। इसके पूर्व छोर पुष्कर नाग है। नीलमत तथा माहात्म्यों में इसकी संज्ञा तीर्थ की दी गयी है। लोग यहाँ की यात्रा करते हैं। कशमीर में कई पुष्कर तीर्थों का वर्णन है। एक सुरेश्वरी तीर्थ से सम्बन्धित सम्भवतः फाक में था।

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