राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ राजतरंगिणी ततस्तस्य सुतः प्राप रिपुनागकुलान्तकः । भूर्यः शौर्यश्रियः श्रीमान् खगेन्द्रः पार्थिवेन्द्रताम् ॥ ८९ ॥ खगेन्द्र ८९. कुश के पश्चात् उसका पुत्र रिपुनाग कुलान्तक पार्थिवेन्द्र श्रीमान् खगेन्द्र राजा हुआ। यह शौर्यशाली और जननेता था। स खागिखोनमुपयोः कर्ता मुख्याग्रहारयोः । हरहाससितैः कृत्यैः क्रीताँल्लोकान्क्रमाद्ययौ ॥ ६० ॥ ९०. वह खोनमुप' तथा खागी२ अग्रहारों का कर्ता था। शिव के हास तुल्य उज्ज्वल अपने शुभ कर्मों द्वारा उसने स्वर्ग लोक क्रय कर स्वर्ग गमन किया ।
एक दूसरी कुशस्थली अनर्तदेश की राजधानी थी। पुण्यजन नामक राक्षसों ने रैवत राजा के समय इसे लूट लिया था। (पुराण विष्णु ४:१:१९, वायु ८६:२४:२४, भागवत १:१०:२७; ब्रह्माण्ड ३:६१:२०) कुशद्वीप का उल्लेख नीलमत पुराण में मिलता है। कुशमाल समुद्र को कुशद्वीप से मिलाने की चेष्टा की गयी है। अफ्रीका के उत्तरी पूर्वीय तट नुबिया के समीपवर्ती समुद्र को इसकी सज्ञा दी गयी है। (सुपारग जातक भाग ४ पृष्ठ १४०) जम्बूः शाकः कुशः क्रौञ्चः शाल्मलिर्दीप एव च । गोमेधः पुष्करश्चैव द्वीपाः पूज्या पृथक्-पृथक् ॥ 587 : ७०८ कुशपुर किंवा कुशभवनपुर नाम जनश्रुति के अनुसार राम के पुत्र कुश के नाम पर रखा गया है। यह तीन तरफ गोमती नदी से घिरा है। उत्तर प्रदेश में है। कुशावती वर्तमान कुशीनारा अथवा कुशीनगर है। जहाँ भगवान् बुद्ध का परिनिर्वाण हुआ था। यह मल्लों की राजधानी थी। (जातक ५:२७८; दीघ- निकाय २:१७०) कुश वैदिक साहित्य में कुशा के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। यह सरड़ी अथवा धातु के सूप में भी प्रयुक्त किया गया है। (शतपथ ब्राह्मण २:१; १५:२:२५; ३:१:२:१६; ५:१३:२:७; .
यणो सहिता ४:५:७, तैत्तिरीय ब्राह्मण १:५:१०:१) (२) कुरुहार : वर्तमान कुलर है। लिदर नदी की पश्चिम दिशा में लगभग ४ मील उत्तर लिदर उपत्यका में स्थित है। यह एक बडा गांव है। पण्डित दयाराम कौल का मत है कि यह दक्षिणपुर परगना में है। ८९ (१) खगेन्द्र : आइने अकबरी ने खगेन्द्र का नाम कहेगुन्दर दिया है। खगेन्द्र का अर्थ गरुड़ होता है। हसन ने इसका राज्यकाल ३० वर्ष दिया है। खगेन्द्र का शाब्दिक अर्थ गरुड होता है। नाग का अर्थ सर्प है। गरुड तथा सर्प में वंशपरम्परागत शत्रुता है। गरुड़ सर्प किंवा नाग का संहार करता है। कल्हण ने वही उपमा यहाँ दी है। गरुड खग अर्थात् पक्षियों का राजा है। तात्विक दृष्टि से खगेन्द्र ज्योति तथा नाग तम के प्रतीक है। ज्योति एग तम अर्थात् अन्धकार एवं प्रकाश का संघर्ष ही खगेन्द्र एवं नागों का चिरकालीन संग्राम है। खगेन्द्र जिस प्रकार पक्षियों का नेता है। उसी प्रकार मानव नामधारी खगेन्द्र जनता का नेता है। गरुड़ विष्णु का वाहन है। वेगवान् है। शौर्यशाली है। इस प्रकार गरुड़ के नाग विध्वंसक, तथा नेतृत्व, एवं शौर्य की तुलना मानवीय खगेन्द्र से कल्हण ने की है। पाठभेद : श्लोक संख्या ९० में ' मिलता है।