भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 211

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

१२८ राजतरंगिणी दरद्देशान्तिके कृत्वा सोरकाख्यं स पत्तनम् । श्रीमान्बिहारं विदधे नरेन्द्रभवनाभिधम् ॥ ९३ ॥ ९३. उसने दरद देश १ के समीप सोरक २ नामक पत्तन बसाया और उस श्रीमान् ने ३ नरेन्द्र भवन विहार का निर्माण कराया । तेन स्वमण्डलेऽखण्डयशसा पुण्यकर्मणा । विहारः सुकृतोदारो निर्मितः सौरसाभिधः ॥ ९४ ॥ ९४. उस अखण्ड यशशाली पुण्यकर्मा राजा ने अपने मण्डल में सौरस १ विहार की स्थापना की जो सुकृत तथा उदारता के लिये प्रसिद्ध था । यहाँ कल्हण ने सुरेन्द्र शब्द का अच्छा निर्वाह किया है । पाठभेद : श्लोक संख्या ९३ में 'सोरकाख्यं' का पाठभेद 'सरोकाख्यं' तथा 'सौरसारव्यं' मिलता है । पादटिप्पणियाँ . ९३ (१) दरद देश : इसका वर्णन प्राचीन ग्रन्थों में आता है । यह अंचल कश्मीर का आज भी एक भाग है। कश्मीर प्रदेश के उत्तर में है। इसको दर्दस्तान कहते हैं। जातकों में इसकी स्थिति हिमवा अर्थात् हिमालय में बतायी गयी है। हिमालय की शाखा हिन्दुकुश में है । मार्कण्डेय पुराण में दर्दुर पर्वत का उल्लेख है। इस अंचल के पर्वत को दर्दुर कहा जाना ठीक है। यूनानियों ने दरदाई नामक जाति का उल्लेख किया है। जातकों में उपचर के पाँचवें पुत्र के दद्दरपुर नगर बसाने का उल्लेख मिलता है। ( चेतिय जातक : जातक भाग १:६७ ३:१५-१६ । विशेष परिशिष्ट दरद जाति में देखिये ) । (२) सोरक : दरद अर्थात् दर्दस्तान के साथ कल्हण के स्वमण्डल शब्द के प्रयोग से प्रतीत होता है कि यह स्थान कश्मीर के बाहर था। इस स्थान का पता अभी तक नहीं लग सका है। एक मत है कि दर्दस्तान की सीमा पर वह स्थान है । (३) नरेन्द्र भवन : कल्हण ने भवन शब्द का प्रयोग विहारों के लिए किया है। नरेन्द्र-भवन-सुह्य स्पंद भवन, अमृत भवन, मोराक भवन आदि विहारों का वर्णन मिलता है। भवन शब्द का साधारण अर्थ निवास स्थान होता है । सोरक तथा नरेन्द्र भवन विहार स्थानों के विषय से निश्चय पूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ये कहाँ थे । पाठभेद : श्लोक संख्या ९४ में 'सुकृतोदारः' का पाठभेद 'स्वकृतोदारे' और सुकृतोदारे' तथा 'सौरसाभिधः' का पाठभेद 'सौरसाभिध'' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ९४ (१) सौरस : पंडित पी० गोविन्द कौल ने सौरस विहार का स्थान वर्तमान ग्राम सुरस बताया है । यह नागाम परगना के संगरफेद ( छतस्कनी ) पर स्थित है । यह स्पष्ट है कि नाम सौरस स्थान का सुरस शब्द की व्युत्पत्ति के आधार पर रखा गया है । (२) विहार स्थापना : विहार शब्द का राजतरंगिणी एवं कश्मीर के इतिहास में यहाँ प्रथम बार उल्लेख मिलता है । मालूम होता है कि राजा सुरेन्द्र के समय बौद्ध धर्मावलम्बी कश्मीर में आए और राजा ने उस धर्म की ओर आकर्षित होकर विहारों की स्थापना की थी। विहार की स्थापना भिक्षुओं के लिए की जाती है । अतएव यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बौद्ध धर्म के प्रचारक कश्मीर मंडल में पहुँच चुके थे । उनका प्रभाव कश्मीर में बढ रहा था ।