राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग. १२९ तस्मिन्निस्सन्ततौ राज्ञि प्रशान्तेऽन्यकुलोद्भवः । बभार गोधरो नाम सम्भूधरवरां धराम् ॥९५॥ गोधर ९५. राजा सुरेन्द्र जब सन्तान हीन स्वर्ग गमन किया तो अन्य कुलोद्भव गोधर१ राजा हुआ । उसने सुरम्य पर्वतों सहित पृथ्वी का भार उठाया । गोधराहस्तिशालारव्यमग्रहारमुदारधीः । म प्रदाय द्विजन्मभ्यः पुण्यकर्मा दिवं ययौ ॥९६॥ ९६. उस उदारधी राजा ने गोधर१ हस्तिशाला२ अग्रहार द्विजन्मों को प्रदान किया और पुण्य कर्म करते हुए स्वर्ग गमन किया । . विहार शब्द रहने तथा कोठरी जिसमें भिक्षु- निवास करते हैं दोनों के लिये आता है । संघाराम के अन्दर अनेक कोठरियां होती है। उनमें एक कोठरी का नाम विहार पड़ता है। मूलगन्धकुटी विहार भगवान् बुद्ध के रहने की कोठरी थी । बौद्ध मठों के लिये कालान्तर में विहार शब्द की संज्ञा दी जाने लगी । विहारों की अधिकता के कारण बिहार प्रदेश का नाम पड़ा है। विहार शरीफ एक स्थान पटना से लगभग ३० मिल दक्षिण पूर्व पंचानन नदी पर स्थित है। पाठभेद : श्लोक संख्या ९५ में 'वरां धरां' का पाठभेद 'वसुन्धराम्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ९५ (१) आइने अकबरी में गोधर नाम दिया गया है । हसन इस राजा का राज्य-काल ३२ वर्ष देता है । पाठभेद : श्लोक संख्या ९६ में 'गोधराह' का पाठभेद 'गोधरोह' तथा 'गोधर अस्ति हिल्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ९६ (१) गोधरं दिवसर परगना के वर्तमान ग्राम गोधर, अस्तेल प्राचीन गोधर तथा हस्तिशाला अग्रहार हैं । गोधर विशोका नदी के तट पर ग्राम है । यह विशोका में मिलने वाली स्थानीय नदी १७ गोदावरी के संगम पर है। गोदावरी माहात्म्य में गोदर नाम से गुदर ग्राम का उल्लेख पाया है। उसे गोदावरी उद्भव गया से सम्बन्धित करता है। अस्मिन् गिरौ महादेवी गौतमेन महात्मना । गौर्वा विदारिता प्रोक्तो गौद्रो गिरिसत्तमः ॥ यह गोदावरी नदी दक्षिणापथ की सबसे लम्बी बड़ी और प्रसिद्ध नदी नहीं है। कश्मीर की साधारण एक स्रोतस्विनी है । नीलमत पुराण में उल्लेख हैं। नदी चित्ररथा पुण्या भृगनन्दा भृगा तथा । गोदावरी वैतरणी तथा मन्दाकिनी शुभा ॥ १२५४ : १४६६, १४६७ गोदावरी माहात्म्य में उल्लेख आता है । यस्मिन्गिरौ महादेवि गौतमेन महात्मना । कृत्या गौर्दारिता प्रोक्तो गोदरः सः गिरिर्महान् ॥ यस्मिन् ग्रामे गोद्राख्यः पर्वतः संप्रतिष्ठितः । स ग्रामो प्रथितः क्वापि गोदराख्यो महेश्वरि ॥ गौर्वा विदारिता यत्रोत्थिता गंगा जलोच्छिता । सैव गोदावरी नाम गंगा परमपावनी ॥ (रघुनाथ मंदिरजम्मूः सं० ३६६४।३६ बी०) थ्तीन यहाँ आये थे । उन्हें यहाँ के मियां, जागीरदार तथा स्थानीय पुरोहितों से मालूम हुआ था कि एक जनश्रुति प्राचीन काल से सुनाई पड़ती चली आती है कि इस स्थान पर राजा गुदर ने एक नगर