भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

प्रथम तरंग. १३५ यः शान्तवृजिनो राजा प्रपन्नो जिनशासनम् । शुष्कलेत्रवितस्तात्रौ तस्तार स्तूपमण्डलैः ॥१०२॥ १०२. यह नृप जिसके पाप शान्त हो गये थे, जिन¹ शासन स्वीकार किया। शुष्कलेत्र² तथा वितस्तात्र³ स्थानों को स्तूप मण्डलों से आच्छादित कर दिया। १६५५ संवत् में राज्यारोहण तथा उसके पश्चात् इतिहास का यह वह काल है जब रोम और जलोक का राज्यारोहण क० १७२६ संवत् में बताता कार्थेज यूनिक युद्ध में रत थे। बुद्ध धर्म का कश्मीर हैं। इस प्रकार अशोक का राज्य काल ७१ वर्ष में प्रवेश करने के कारण बौद्धधर्मानुयायियो को कष्ट होता है न कि एक्कावन वर्ष। वह अशोक तथा सहने का आदत पड़ गयी थी। सहिष्णुता की भावना जलोक के बीच किसी और राजा को नहीं रखता। बढ़ गयी थी। भूकम्प विसूचिका तथा महामारी अशोक के पश्चात् जलोक का होना स्वीकार आदि का स्थिरतापूर्वक सामना करना चाहिये यह करता है। भावना बढ़ने लगी थी। उन्हें केवल दैवो प्रकोप ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध हो चुका है कि मानकर चुप बैठने की पुरानी आदत बुद्ध धर्म के राज्य उत्तराधिकार का संघर्ष २७० वर्ष ईशा पूर्व व्यावहारिक रूप और ज्ञान के कारण बदल रही थी। आरम्भ हुआ था। अशोक २७४ वर्ष ई० पू० राज नास्तिक बुद्ध धर्म के वैज्ञानिक तर्क ने पुराने विचारों सिंहासन पर बैठा था। उसकी मृत्यु ई० पू० २३२ में एक क्रान्ति उपस्थित कर दी थी। कर्म, वर्ष में हुई। (परिशिष्ट ए० 'अशोक' ले० राधाकुमुद आचरण, और शील की ओर लोगो को उन्मुख किया मुकर्जी, १९६२ संस्करण)। था। अन्ध विश्वास, निष्क्रियता, केवल सैद्धान्तिक इस प्रकार उसका राज्यकाल केवल ३८ वर्ष आकाशीय उड़ान के स्थान पर भूमि पर चलने की ठहरता है। अतएव हसन का राज्यारोहण, राज्य- ओर लोगो को प्रवृत्त किया था। काल आदि सब भ्रामक, परस्पर विरोधी तथा अशोक के कारण कश्मीरियो के चरित्र निर्माण अप्रमाणित उसकी अन्य बातों की तरह होता है। में बौद्ध धर्म का अत्यधिक प्रभाव पड़ा है। यही अशोक ने कितने दिनों तक शासन किया, इस पर कारण है कि कश्मीर की मसजिदें बौद्ध पगोड़ा तुल्य कोई प्रकाश कल्हण नहीं डालता। उसका सम्बन्ध दिखायी पड़तो है। यद्यपि नूरजहाँ ने सर्व प्रथम मौर्य वंश से भी नही जोड़ता है। अपने मसजिद के निर्माण द्वारा सेमेटिक स्थापत्य एवं रत्नाकर पुराण की बात केवल कपोलकल्पना वास्तु कला का प्रवेश कश्मीर में कराया था। है। इसका लाभ उठाकर हसन ने अनुमान से समय निश्चित किया है। बुद्ध धर्म कल्हण के समय तक कश्मीर में किसी अशोक के जीवन की प्रमुख घटनाओ पर तिथि- न किसी रूप में अत्यन्त लघु पैमाने पर प्रचलित वार प्रकाश डाल देने से इतिहास समझने मे सुविधा था। कल्हण स्वयं शैव था। 'अशोक' परिशिष्ट में होगी। कश्मीर के इतिहास पर प्रकाश पड़ेगा। विस्तार के साथ विवेचन किया गया है। अन्यथा इसका उल्लेख परिशिष्ट 'अशोक' में किया टिप्पणी स्वतः बहुत बड़ी हो जातो। गया है। जोनराज, श्रीवर, प्रज्ञाभट्ट एवं शुक की राज- अशोक कश्मीर का राजा था। इसपर विस्तृत तरंगिणियों में अशोकेश्वर तथा अशोक का विवेचन मैने परिशिष्ट 'अशोक' में किया है। अशोक उल्लेख मै प्राप्त नही कर सका। उनका किसी का एक राज्यपाल तक्षशिला में रहता था। सन्दर्भ मे भी वर्णन नही मिलता।