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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 984 में से

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पृष्ठ 217

१३४ राजतरंगिणी

मन्दिरों को खण्डित कर उनके पत्थरों से मसजिद तथा जिमारत बनाना साधारण बात हो गयी थी । काशी विश्वनाथ का मन्दिर, मथुरा तथा अयोध्या का जन्म स्थान, महरौली दिल्ली में विष्णु पर्वत पर, विष्णु मन्दिर के स्थान पर, कुतुबमीनार तथा मसजिद, कूबते इसलाम आदि का बन जाना अनेक उदाहरण हैं । कश्मीर में राजाश्रय न मिलने के कारण बुद्ध धर्म तथा उससे सम्बन्धित इमारतों की उपेक्षा हो गयी । बुद्ध धर्म के प्रति रुचि न होने के कारण तत्स- म्बन्धी धार्मिक स्थान क्षीणता को प्राप्त होते होते सुप्त हो गये । कल्हण अशोक के १६ शताब्दी पश्चात् हुआ था । इतने लम्बे काल तक बिना जीर्णोद्धार किंवा मरम्मत के किसी भी रचना का कायम रहना कठिन था । कश्मीर का प्रत्येक राजा किंवा रानी अपने काल में अपने नाम से किसी न किसी नवीन इमारत की रचना अपना नाम कायम रखने के लिए करता था । मेरी समझ में यही कारण है । बौद्ध भुवन रचना सामग्रियां जो प्रायः उस समय जीर्णा- वस्था में थीं, बिसरी थीं और जिनका जन जीवन में विशेष महत्त्व नही रह गया था । कल्हण ने उनका प्रयोग नहीं किया। इसलिये 'देवानाम् प्रिय' 'प्रियदर्शी' शब्दों का अभाव कल्हण के साहित्य में मिलता है ।

जीर्णोद्धार कराया । कालान्तर में उसने जैन शासन चलाया । राजा जैनेह का अशोक भतीजा था । उसके काल में ब्राह्मण संस्कार के स्थान पर जैन शासन कश्मीर में चलाया गया । राजा जैनेह कौन था इसपर अबुल फजल आइने अकबरी में कोई प्रकाश नहीं डालता । हसन लिखता है—'राजा शचोनर वल्द शकुनी के पोतों में से अशोक था। कलयुग संवत् १६५५ में अपनी ख्वाहिश से तख्त कश्मीर को जीनत देकर परगना खादर भारत मे एक शहर आलीशान और दिलपसन्द महलात वाला बनाया । पिछले मुअरखीन इन मकानों की तायदाद ६ लाख लिखते हैं । शहर के आस-पास एक निहायत ऊँचो और पायदार फसील बनवायी । पनगलवा और पतेख के गाँव आबाद करके बरहमनों को बख्शिश दिये और मजहब जैन यानी बुद्ध मजहब जिसका जिक्र पहले हिस्सा में आ चुका है, अपने लिए पसन्द किया । उसकी इशाअत और तबलीग में दिल व जान से कोशिश की और सारे मुल्क मे उमके अहकाम जारी कर दिये। कसबा बिजबारह मे पिछले तमाम मन्दिर तबाह व बरबाद करके उनकी जगह अपने मजहब के इबादतखाने निहायत आलीशान और पुख्तगी से बनवाये । बैजवारह के मुत्तसिल ही एक और मन्दिर बनवाया जिसका नाम अपने नाम पर अशोकेश्वर रखा । मोजा हैवलतरो और मोजा बतर द्रेल में के बहुत से मन्दिर बनवाये । बिल आखीर अछूतों की मुखालिफत और उनकी नाफरमानी से पेशनजर तारिकुल दुनिया होकर पहाट बदेश्वर की तलहटी में नारायण नाग के चश्मा पर बूनेश्वर का मन्दिर जिसके निशानात ताहान मौजूद हैं बनवाया । यहां आतों बकिया उम्र इबादत बग्ग हकूमत करके इस दारेफानी से रुख्सत हुआ ।'

हसन का यह कहना है कि ५१ वर्ष अशोक ने राज्य किया सर्वथा मिथ्या है । अशोक का यह क०

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