राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 216, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १३३ एवं स्तूपों के स्थान, कालादि के वर्णन द्वारा कल्हण अशोक का पूर्णतया वर्णन करता । उनके कारण इतिहास पर नवीन प्रकाश पड़ता । यदि कश्मीर में अशोक सम्बन्धी ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त होती तो कल्हण जैसी पैनी दृष्टि वाला इतिहास लेखक, इस प्रकार की दुर्लभ सामग्रियों की उपेक्षा नहीं कर सकता था । तथापि सत्यसंध शब्द देवानाम् प्रिय तथा प्रियदर्शी से कम महत्त्व नहीं रखता । सम्भव है इस विशेषण का उल्लेख किसी भूगर्भ स्थित शिला- लेखादि में कभी प्राप्त हो जाय । यह भी सम्भावना हो सकती है । कश्मीर के किसी शिलालेख किंवा ग्रन्थ में अशोक के नाम के साथ सत्यसंध विशेषण लगा कल्हण को मिल गया हो, जो अब लुप्त हो गया है । मुझे इसकी सम्भावना अधिक मालूम होती है । कल्हण ने अपने पूर्व इतिहासकारों के अशोक सम्बन्धी उल्लेखों से लेखन सामग्री प्राप्त की थी । शिलालेखादि यदि मिला होता, उन्हें पढ़ लिया होता और अशोक जैसे महान् सम्राट् पर उन आलेखों के आधार पर बहुत कुछ लिखता । कल्हण ने स्वयं लिखा है । उसने तत्कालीन प्राप्त शिलालेखों आदि का अध्ययन किया था । उनके आधार पर इतिहास लिखा था । अतएव अशोक द्वारा निर्मित स्तम्भों, स्तूपों तथा चैत्यों के अभिलेखों पर अशोक का प्रसिद्ध विशेषण, देवा- नाम् प्रिय मिलना सम्भव था । क्योंकि अशोक के समस्त साम्राज्य में लिखने की यह शैली प्रचलित थी । कल्हण ने स्तूपों, चैत्यों तथा स्तम्भों के आलेखों का अपनी इतिहास सामग्री में उल्लेख नहीं किया है । उन्हें अपना स्रोत नहीं माना है। उनकी गणना अपने इतिहास सामग्री में नहीं की है । कल्हण से सात शताब्दी पूर्व हुएनसांग ने भारत की यात्रा की थी । उसके समय में बुद्ध धर्म ह्रास की ओर कश्मीर में था । यही प्रतिक्रिया समस्त भारत- वर्ष में हो रही थी । कश्मीर उसका अपवाद नहीं था । हुएन सांग स्वयं लिखता है। कश्मीर में किसी एक धर्म विशेष की ओर जनता की आस्था नहीं थी । कश्मीर में सनातन धर्म एवं शैव सिद्धान्त की प्रबलता उत्तरोत्तर होती गयी । लोग भारतवर्ष के समान कश्मीर में बुद्ध धर्म को बारहवीं शताब्दी में प्रायः भूल चुके थे । कश्मीर में कुछ उत्सव बुद्ध धर्म सम्बन्धी पूर्व काल से होते चले आये थे । वे किसी रूप में कुछ होते रहे । वे पूर्व काल की केवल धुँधली स्मृति मात्र थे । कश्मीर के राजा नव निर्माण निमित्त पुरानी सामग्रियों का भी उपयोग करते थे । मन्दिरों, चैत्यों, स्तूपों, मठों, शाला तथा विहारों के ध्वंसावशेषों, शिलाखण्डों, पत्थरों, ईंटों का प्रयोग मुक्तहस्त करते थे । भारत में भी सारनाथ के धर्मराजिक स्तूप के पूरे स्तूप के ईंटों तथा शिलाखण्डों का उपयोग तत्कालीन काशी के राजा तथा उनके कुटुम्बियों ने किया था। उस विशाल स्तूप की केवल नींव मात्र रह गयी है । भगवान् ने सारनाथ में प्रथम उपदेश किंवा धर्मचक्र प्रवर्त्तन जहाँ किया था वहाँ बहुत बड़ा स्तूप था । वर्तमान धमेक स्तूप जैसा बना था । वह धर्मराजिक स्तूप था । अज्ञान के कारण लोगों ने उसे ईंटों का खदान या पहाड़ समझ लिया था। उस स्तूप में से भगवान् की धातु मिली थी । भ्रम के कारण उसे अस्थि समझ कर गंगा में प्रवाह कर दिया गया था । भारत ही केवल इसका अपवाद नहीं है । इसराइल की यात्रा में मैंने देखा कि क्रूसेड के समय निर्मित गिरजाघरों, उपासना स्थानों तथा प्रासादों में लगे स्तम्भों तथा पत्थरों का उपयोग 'केसरिया' (हैफा के समीप ) के बन्दरगाह तथा घाटों के बनाने में किया गया था । भारत में इसी प्रकार