भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

१३२ राजतरंगिणी राजाग्रहारयोः कर्त्ता शमाङ्गाशानारयोः । सोऽभूदपुत्रः सुत्रामविष्टरार्धसमाश्रयी ॥१००॥ १००. यह राजा राजकीय अग्रहार शमांगासा तथा शनार की स्थापना किया। राजा निःसन्तान था उसने इन्द्र का आधा सिंहासन प्राप्त किया । प्रपौत्रः शकुनेस्तस्य भूपतेः प्रपितृव्यजः । अथावहदशोकाख्यः सत्यसन्धो वसुंधराम् ॥१०१॥ अशोक १०१. तत्पश्चात् सत्यसंध १ अशोक २ जो भूपति के प्रपितृव्य तथा शकुनी ३ का प्रपौत्र था, वसुंधरा पर राज्य किया । १०० (१) समांगासा : यह वर्तमान सामत ग्राम है। यह एक बड़ा ग्राम है। कोठार अथवा कुठहार परगना के अरपथ नदी के वाम तट पर स्थित है । हैदर मलिक लिखता है 'शमाल काश' नामक गाव कुटहार परगना मे राजा ने बसाया था । समानासा का उल्लेख पुनः कल्हण ने रा० तं० ८:६५ में किया है । (२) शनार : वीही परगना में शार नाम ग्राम है। यह रन्भू के दक्षिण पूर्व एक भील पर होगा । हैदर मल्लिक के अनुसार राजा शचीनर ने वीही परगना में 'शरार' ग्राम आबाद किया था । शार लोहे के कारवार का केन्द्र था । सार का अर्थ लोहा होता है । यह पूर्व काल में लोहा बनाने का केन्द्र था । स्टोन ने यहा की यात्रा सन् १८९१ में की थी । यहाँ के गाँव के मध्य की जियारत 'ख्वाजा खिज़्र' में प्राचीन ध्वस्तावशेष के विशाल पत्थर लगे हैं। यह जियारत सन् १५८० ई० की बनी है। एक नाग अर्थात् निर्भर के समीप कुछ अलंकृत स्तम्भ पड़े हैं। श्री वाइने ने अपने यात्रा-वर्णन (ट्रेवेल्स २:३५) में इसका उल्लेख किया है । हसन ने शनार को शारदा गांव माना है । १०१ (१) सत्यसंध का अर्थ होता है सत्य- प्रतिज्ञ, सत्यवादी, सत्य संकल्प, वचन पालक तथा ईमानदार । निःसन्देह अशोक सच्चरित्र था । सत्य- प्रिय था । सत्य प्रतिज्ञ था । मालूम होता है । कल्हण के समय अशोक नाम से सम्बन्धित प्रसिद्ध विशेषण 'देवानाम् प्रिय' 'प्रियदर्शी' जनता विस्मृत कर गयी थी । सम्भव है अशोक कालीन लिपि, भाषा तथा पालि भाषा विज्ञ उस समय कोई नहीं रह गया था । अशोक सम्बन्धी ऐतिहासिक स्वल्प किंवा प्रचुर सामग्री कल्हण को नही प्राप्त थी । अतएव उसने विस्तार के साथ अशोक जैसे महान् राजा के विषय में नहीं लिखा है । अशोक का जन्म ईसा पूर्व २९७ में हुआ था । वह सिंहासन पर ईसा पूर्व २७२ में बैठा । उसकी मृत्यु ईसा पूर्व २३२ मे हुई थी । इस प्रकार कल्हण और अशोक के काल में १३८० वर्षों का अन्तर पड़ता है । कल्हण के समय देवानाम् प्रिय एवं प्रियदर्शी विशेषण लोग भूल गये थे । कल्हण ने अशोक जैसे सम्राट् का राज्य काल एवं समस्त वर्णन केवल ७ श्लोकों ( १ : १०१-१०७ ) में समाप्त कर दिया है । स्पष्ट है कि उस समय कश्मीर में अशोक सम्बन्धी ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध नहीं थी । उसके निर्मित चैत्य, विहार जिन पर पालि भाषा तथा ब्राह्मी लिपि आदि में शिलालेख अंकित रहे उनका पढ़ना तथा अर्थ लगाना लोग भूल गये थे । अन्यथा अशोक द्वारा निर्मित विहारो, चैत्यों