राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १३१ तत्सूनुर्जनको नाम प्रजानां जनकोपमः । विहारमग्रहारं च जालोराख्यं च निर्ममे ॥९८॥ जनक । ९८. प्रजागण के लिये जनक तुल्य उसका पुत्र जनक¹ राजा हुआ । उसने जालोर² विहार तथा अग्रहार निर्मित किया । शचीनरस्तस्य सूनुः क्षितिं क्षितिशचोपतिः । ततः श्रीमान्क्षमाशीलो ररक्षाऽक्षतशासनः ॥६६॥ शचीनर ९९. उसके पश्चात् उसका पुत्र शचीनर¹ जो पृथ्वी पर शचीपति तुल्य था, पृथ्वी की रक्षा किया । उस श्रीमान् क्षमा शील के शासन का कोई स्वेच्छया उल्लंघन नहीं करता था । कुल्या के तत्सम रूप से प्रयुक्त होता है । कुल नाला के लिए व्यवहार किया गया है। सम्भव है किसी रूप में कुल्या का अपभ्रंश नाला शब्द हो गया है । नलिका शब्द छोटी धारा के लिए प्रयुक्त किया गया है । नलिका का अपभ्रंश नाली है । ऋषिकुल्यामासाद्य देवकुल्यां तथैव च । अश्वतीर्थं प्रभासं च वारुणं तीर्थमेव च ॥ 1316 : १५३० सुवर्ण मणि कुल्या को स्वर्णमय नादो कहते हैं । यह वर्तमान सुनमन् कुल है। जैनपुरी अधित्यका के पूर्वीय अंचल में निल्लू, परगम, कुजुरू, आदि गाँवों में बीम मिल बहती आदयिन गांव से थोड़ी दूर पर विशोका अर्थात् विसावू नदी में पुनः मिल जाती है। यह विशोका नदी से ही लागू ग्राम के समीप निकाली गयी है । ९८ (१) जनक : आइने अकबरी ने जन्नेक नाम दिया है। वैदुद्दीन इतिहासकार कहता है कि जनक ने अपने पुत्र को ईरान पर आक्रमण करने के लिए भेजा । उस समय ईरान का राजा होमार्द्र था । वहमन के पुत्र दरब द्वारा आक्रमणकारी राजपुत्र मार डाला गया । (२) जालोर : हसन ने जालोर तथा जालोर बाग का दान देना लिखा है। विहार का अर्थ उसने गांव लगाया है। यह गलत है। हसन को इतना भी ऐतिहासिक ज्ञान नहीं है कि विहार बौद्धों के देवस्थान को कहते हैं । यदि रत्नाकर पुराण से अथवा अन्य किसी ग्रन्थ से यह लिया गया है तो विहार का अर्थ सर्वदा बौद्ध स्थान के रूप में किया गया है। इस राजा का राज्य-काल वह ३२ वर्ष देता है । पं० गोविन्द कौल जालोर को वर्तमान ग्राम जोलुर बताते हैं। यह जैनगिर परगना में है। हैदर मल्लिक 'जालुर:' को 'विहू' अर्थात् 'वोहों' परगना में होना बताते हैं। इस पर कुछ और अन्वेषण की आवश्यकता है । ९९ (१) शचीनर : आइने अकबरी में नाम सजोनीर दिया गया है। हसन ने राजा शचीनर का राज्य-काल ४० वर्ष दिया है। यह केवल अनुमान है। वैदिक साहित्य में शची शब्द का प्रयोग शक्ति, सामर्थ्य के अर्थ में किया गया है । इंद्र का नाम शचीपति है। यहाँ शचीपति का शाब्दिक अर्थ होगा इन्द्र । (ऋग्वेद १:१७:४. १:६२:१२; १:१०३:२; १:१०९:७, ३:६० ६ शाखायन गृह्यसूत्र १:१२, वाजसनेयि संहिता १९:८१ तथा ऐतरेय ब्राह्मण ७:३३ ) । कल्हण ( तरंग ८:३४११ ) ने शचीनर की माता का नाम शची दिया है ।