भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

प्रथम तरंग १३७ धर्मारण्यविहारान्तर्वितस्तात्रपुरेऽभवद् । यत्कृतं चैत्यमुत्सेधावधिप्राप्त्यक्षमेक्षणम् ॥१०३॥ १०३. वितस्तात्र पुर में धर्मारण्य विहान्तर्गत राजा द्वारा निर्मित एक चैत्य' था। वह इतना ऊँचा था कि आँखें उसके शिखर तक नहीं पहुँच पाती थीं। में इतने मन्दिर, देवालय एवं विहार पत्थरों से बने थे कि लगभग सात या आठ शताब्दी से पत्थर कही से लाने की आवश्यकता ग्रामों तथा छोटे स्थानों में नहीं थी। पुराने पत्थरों से काम. चल जाता था। कश्मीर में शायद ही कोई ऐसी जियारत या दरगाह मिलेगा जिसमें प्राचीन ध्वंसावशेषों के शिला खण्ड न लगे हों अथवा वे मन्दिरों तथार विहार के स्थान पर न निर्मित किये गये हों। कल्हण ने इसका उल्लेख पुनः तरंग १:१७० में किया है। (३) वितस्तात्र : यह स्थान वनिहाल पर्वत मूल में वैरी नाग के वायव्य दिशा में लगभग एक मिल पर विद्ययत्रो ग्राम है। इस ग्राम का वर्तमान नाम वियवृतुर है, गाँव छोटा है। ग्राम के समीप एक सरोवर है। उसमें एक बड़ा जलस्रोत है। यह झरना वितस्ता नदी का मुख्य उद्गम कहा जाता है। वनिहाल नाम का मूल वितस्तात्र ग्राम ही था। उसी का अपभ्रंश तथा बिगड़ता. रूप वनिहाल एक मत के अनुसार हो गया है। स्थानीय हिन्दू इसे एक तीर्थ मानते है। वाइन ने अपने भ्रमण में इसका उल्लेख किया है। वितस्ता माहात्म्य (२ : ४०) में इसे 'वितस्ता वतिका' कहा गया है। राजा अनन्त के समय में कल्हण ने (७:३६४) वितस्तात्रपुर का उल्लेख किया है। महाराज सुस्सल के राज्य काल (सन् ११२१-११२८ ई०) में कल्हण ने 'वितस्ता' स्थान का उल्लेख (८: १०७३) किया है। कल्हण के निम्नलिखित उद्धरण इस स्थान के सम्बन्ध में द्रष्टव्य है। (१:१०२; १०३; १:१७० ७:३५४, ८:१०७३-७४) १८ नील नाग किंवा वैरी नाग की यात्रा के समय इस स्थान की यात्रा की जा सकती है। यह स्थान किसी बड़े नगर के लिये उपयुक्त स्थानाभाव के कारण नहीं है। इसका महत्त्व प्राचीन काल में पूर्वीय पंजाब से आवागमन मार्ग के कारण था। रावलपिण्डी तक रेलवे लाइन और वहाँ से राजपथ द्वारा उरी होते बारहमूला सडक से पहुँचा जाता था। यह सड़क सर्वदा खुली रहती है। हिमपात के कारण मार्गविरोध नही होता। भारतीय स्वाधीनता और कश्मीर पर पाकिस्तानी आक्रमण के कारण यह मार्ग बन्द हो गया है। रावलपिण्डी पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद नाम से हो गया है। अतएव बनिहाल मार्ग का महत्त्व बढ़ गया है। भारत और कश्मीर को सम्बन्धित करने वाला यही एक मात्र मार्ग शेष रह गया है। सन् १९६३ के पूर्व बनिहाल के पास का मार्ग शीतकाल में तुषारपात के कारण अवरुद्ध हो जाता था। अब वहाँ बहुत नीचे दूसरी सुरंग खोद कर मार्ग बनाया गया है। इससे यह मार्ग अब पूर्णतया खुला रहता है। कश्मीर आने वालो को प्रथम दर्शन बनिहाल से वितस्तात्र ग्राम तथा नील कुण्ड किंवा वैरी नाग का मिलता है। इस स्थान का महत्त्व अब बढ़ गया है। इस स्थान पर स्तूपों के ध्वन्सावशेष नहीं मिलते। कुछ स्थानों में प्राचीन इमारतों के आकार मात्र भूमि में मिलते हैं। वहाँ गढ़े और अनगढ़ पत्थर भी कुछ पड़े हैं। परन्तु स्थान का रूप आधु- निक प्रगति के साथ बदलता जा रहा है। कुछ वर्षों में यह सब भी लुप्त हो जायगा। पत्थरों का प्रयोग स्थानीय जनता मुक्तहस्त करती है।

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