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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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१३८ राजतरंगिणी स षण्णवत्या गेहानां लक्षैर्लक्ष्मीसमुज्ज्वलैः । गरीयसीं पुरीं श्रीमांशक्रे श्रीनगरों नृपः ॥१०४॥ १०४. उस श्रीमान् ने श्रीनगरी१ की स्थापना की जिसका महत्त्व उसके लक्ष्मी द्वारा समुज्ज्वल छानवे लाख गेहों के कारण थी।

पाठभेद : श्लोक संख्या १०३ में 'यत्कृतं' का पाठभेद 'यात्कृतं' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : : १०३ (१) चैत्य : कश्मीर में चैत्यों की श्रृंखला थी। प्रत्येक ग्राम तथा महत्त्वपूर्ण स्थानों में चैत्य निर्मित थे। उनकी पूजा बौद्ध तथा हिन्दू दोनों करते थे। धर्मारण्य विहार तथा चैत्य दोनों का लोप हो गया है। कल्हण के वर्णन से प्रतीत होता है कि उसके समय विहार तथा चैत्य दोनों का अस्तित्व था। कश्मीर में हिन्दूराज के लोप तथा जनता के मुस्लिम धर्म ग्रहण करने के कारण विहारों तथा चैत्यों का कोई महत्त्व नहीं रह गया। वे गिरते-पड़ते खँडहर हो गये। उनके पत्थर लोग उठा ले जाने लगे। जब केवल आकार मात्र शेष रह जाता था तो उन पर इमारत बना दी जाती थी, इस प्रकार प्राचीन स्थानों का अस्तित्व लोप हो जाता था। यह बात केवल हिन्दू अथवा बौद्ध धर्मस्थानों के सम्बन्ध में ही नहीं लागू होती । बड़ी-बड़ी जियारतें तथा मजारें इसी तरह लोप की जाती है। मैं सन् १९४८ में दिल्ली आया था तो सफदरजंग से महरौली तक बिलकुल आबादी नहीं थी। चारों ओर कब्रिस्तान, मजार तथा जियारतें थीं आज वहाँ कुछ भी नहीं है। बदायूँ में बहुत बड़ा कब्रिस्तान है। वहाँ पर ऊँची पक्की कब्र के चारों ओर जमीन खोद देते हैं। दो-चार वर्षों के पश्चात् कब्र स्वतः गिर जाती है। पत्थर तथा ईंट बेच दिये जाते हैं। जमीन समथर हो जाती है। उन पर नवीन इमारत बन जाती है। पाठभेद : श्लोक संख्या १०४ में 'लक्षै' का पाठभेद 'लक्ष्यै' मिलता है।

पादटिप्पणियाँ : १०४ (१) श्रीनगरो : अशोक ने दो नगरियों का निर्माण कराया था। कश्मीर में श्रीनगर तथा नेपाल में देवपत्तन। नेपाल में अशोक की कन्या चारुमति गयी थी उसका विवाह देवपाल से हुआ हुआ था। पति-पत्नी दोनों नेपाल में धर्म प्रचारार्थ आबाद हो गये थे। अशोक की नेपाल यात्रा के स्मरणार्थ नगर बसाया गया था। देवपत्तन नगर के नाम से अनुमान किया जा सकता है कि देवपाल ने अपने श्वशुर अशोक की यात्रा की स्मृति में नगर बसाया होगा। ऋग्वेद में श्री शब्द सम्पदा के अर्थ में व्यवहृत किया गया है ( ८:२:१९; अथर्ववेद ६:५४;१, ६:७३:१, ९:५:३१, १०:६:२६, ११:१:१२ २१, १२:१:६३, १२.५:७ ) श्री शोभा, सम्पन्न, वृद्धि, विभूति, कीर्ति, यश, प्रभा, सिद्धि, विष्णुपत्नी लक्ष्मी, सरस्वती तथा वाणी के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है। शतपथ ब्राह्मण में ( ११:४.३ ) श्री को देवी माना गया है। अतएव श्रीनगरो का अर्थ संपदा, वृद्धि, यश, कीर्ति तथा सरस्वती नगरी हुआ। श्रीराज्य वर्तमान मैसूर राज्य का पुराना नाम था। दक्षिण-पूर्व एशिया में श्रीविजय साम्राज्य स्थापित था। जनरल कनिंघम ने वर्तमान ग्राम पाण्डरेथन अर्थात् पुराणधिष्ठानपुर को अशोक निर्मित श्रीनगरो की संज्ञा दी है। वह वितस्ता के वाम तट पर है, वर्तमान श्रीनगर से २ मील ऊपर श्रीनगर अनन्त-नाग सड़क पर स्थित है। कनिंघम ने कल्हण के रा० त० १.१२४ तथा रा० त० २:९९ के आधार