राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १३९ पर इसका निर्धारण किया है। क्योकि जलौक ने ज्येष्ठ रुद्र देवस्थान की स्थापना श्रीनगरो में की थी। इस देवस्थान को शंकराचार्य पर्वत पर स्थित मन्दिर से सम्बन्धित करते हैं। पर्वत मूल में दक्षिण-पूर्व २ मील दूर पर पाण्डेरेन्यन है। किन्तु प्रोफेसर बुहलर ने इस मत को ठीक नहीं माना है। वर्णनों से प्रतीत होता है कि जलौक का मन्दिर या तो पर्वत पर था अथवा उसके समीप कहीं आसपास होना चाहिए । पुराधिष्ठान शब्द का अर्थ पुरानी राजधानी है। सोदर जलस्रोत समीप होने ( रा० त० १:१२४ ) के कारण इसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। योग वासिष्ठ में राजा यशस्कर के सन्दर्भ में अधिष्ठान नगर का उल्लेख किया गया है। वास्तव में नगर का नाम अधिष्ठान था। नगर प्राचीन होने पर उसमे पुरा अर्थात् प्राचीन शब्द विशेषण की तरह जोड़ दिया गया था। यह नगर राजा यशस्कर के समय तक समृद्धशाली था। योग वासिष्ठ मे कहा गया है कि वृक्षों तथा पर्वतों से सुशोभित पुराधिष्ठान कश्मीर के मध्य में स्थित है। यह वर्णन आज की परिस्थितियों में भी मिलता है। बौद्ध ग्रन्थ महावंश में उल्लेख आता है। उत्कल जनपद के अधिष्ठान नगर के तपस्सु और मल्लिक व्यापारी थे। भगवान् को बुद्धत्व प्राप्त होने के पश्चात् उरुवेला में राजायतन वृक्ष के नीचे प्रथम बार भोजन उन लोगों ने दिया था। उक्त नगर कश्मीर में नही उड़ीसा में था । गुप्त काल में छोटे राज्यो की राजधानियो को अधिष्ठान कहा जाता था। उड़ीसा में अधिष्ठान नामक एक आबादी है। नवीन राजधानी प्रवरसेनपुर है। प्रवरसेन द्वितीय ने उसका निर्माण कराया था। वह वर्तमान श्रीनगर है। उसे प्रवरपुर कहा गया है। श्रीनगर का नपुंसक लिंग में कल्हण ने सब स्थानो पर वर्णन किया है। वह केवल इस स्थान पर उसका स्त्री रूप में प्रयोग किया है। हैदर मल्लिक तथा मुहम्मद अजीम आदि इतिहास लेखक अशोक-द्वारा निर्मित राजधानी को लिदर नदी के वाम तटपर 'शीर' स्थान को बताते हैं जो खादरयार परगना में है। प्रोफेसर बुहलर ने एक स्थान पर कहा है कि कुछ काश्मीरी पण्डितों का मत है कि यह नगर इस्लामाबाद अर्थात् अनन्त नाग के समीप था । पण्डरेथन में खनन कार्य किया गया है। जिस सरोवर में पण्डरेथन का मन्दिर निर्माण किया गया था उसका जल निकाल कर उसके नींव तक खनन कार्य किया गया था। मन्दिर १८ वर्ग फीट क्षेत्रफल में स्थित है। मन्दिर का निर्माण कश्मीर के राजा पार्थ ने सन् ९२१ ई० में कराया था। जहाँगीर अपनी आत्मकथा में लिखता है : 'नगर का नाम श्रीनगर है। झेलम नदी इसके बीच से बहती है। इसका उद्गम वैरनाग कहलाता है। जो चौदह कोस दक्षिण है। हमारी आज्ञा से सोते के पास एक इमारत तथा बाग बनवाया गया है। नगर में पत्थर तथा लकड़ी के बड़े मजबूत चार पुल बने हुए हैं। जिनसे लोग आते जाते हैं। इस देश की भाषा मे पुल को कदल कहते हैं। नगर में एक बड़ी ऊँची मसजिद है। जो सुलतान सिकन्दर के चिह्न स्वरूप वर्तमान है। और हिजरी सन् ७९५ ई० में बनी थी। कुछ दिनों के बाद यह जल गयी। और तब पुनः सुलतान हुसेन ने इसे बनवाया। यह पूरी नहीं हुई थी कि उसके जीवन का प्रासाद ढह गया। सन् ९०९ हिजरी के सुलतान के वजीर इब्राहीम माकरी ने इसे सुंदरता के साथ पूर्ण किया। उस समय से अब तक १२० साल से यह बनी हुई है। मेहराब से पूर्वी दिवाल तक एक सौ पैंतालीस गज है और चौड़ाई एक सौ चौवालीस गज है। इसमें चार ताक हैं और चारों ओर दालान तथा खंभे हैं। संक्षेप में कश्मीर के शासकों का इससे अच्छा स्मारक और कोई नहीं है। मीर सैय्यद