भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 223

१४० राजतरंगिणी हमदानो कुछ दिन इस नगर में रहा था। इसका स्मारक यहाँ एक खानकाह है। नगर के पास दो झीलें हैं जो वर्ष भर जल से भरी रहती हैं। इनके जल का स्वाद कभी बिगड़ता नहीं। मनुष्यों के आने जाने और अन्न ईधन आदि लाने के लिए नावें काम में आती हैं। नगर तथा परगनो में सत्तावन सो नावें तथा चौहत्तर सो नाविक हैं। कश्मीर प्रान्त में अड़तालीस परगने हैं। यह दो भागों में विभक्त हैं। और नदी के ऊपरी भाग को बमराज कहते हैं। यहाँ भूमि का कर या व्यापार के लेन-देन में सोना चाँदी देने की प्रथा नहीं है। केवल कुछ सायर कर में दिया जाता है। ये वस्तुओं का मूल्य चावल के खरवारों से करते हैं और हर खरवार तीन मन आठ सेर वर्तमान तोल से होता है। कश्मीरियों में २ सेर का एक मन होता है और चार मन अर्थात् आठ सेर का एक तर्क होता है। कश्मीर की आय तीस लाख तिरसठ हजार पचास खरवार ग्यारह तर्क है। यह नगदी में सात करोड़ छियालीस लाख सत्तर सहस्र दाम होता है। साधारणतः यहाँ आठ सहस्र सवार रहते हैं।' (पृष्ठ ६५३) बरनीयर लिखता है—'कश्मीर प्रदेश तथा उसकी राजधानी दोनों का नाम कश्मीर है।' मुसलिम काल में श्रीनगर का नाम छोड़कर श्रीनगर को कश्मीर कहने लगे थे। सिक्खों ने सन् १८६१ ई० में जब कश्मीर विजय किया तो उन्होंने पुराना नाम श्रीनगर कश्मीर की राजधानी का पुनः प्रचलित किया। बरनीयर तथा उन्नीसवीं शताब्दी तक मुसलमान लोग श्रीनगर को 'कश्मीर' या 'कशूर' कहा करते थे। बरनीयर श्रीनगर का वर्णन करता है—'नगर के चारों ओर चहार दिवारी नहीं है। यह तीन चौथाई लीग लम्बा तथा आधा लीग चौड़ा शहर है। यह मैदान के अर्ध चन्द्राकार पर्वत से २ लीग दूर पर बसा है। ताजे पानी वाले लेक के तटपर बसा है। यह सरोवर ४ से ५ लीग होगा। इस लेक मे बहुत से चलते निर्भर हैं। तथा पर्वत से स्रोतस्विनीयाँ आकर मिलती हैं। यह वितस्ता में एक नहर द्वारा मिलती है। उसमें नावें आगो जाती हैं। नदी नगर के बीच में बहती है। नदी में ७ तरडो के पुल (झेलम या वितस्ता) पर बाँधे गये हैं। नगर के मकान अधिकतर दो तथा तिमजले लकड़ी के बने हैं। कुछ पुरानी इमारतें तथा प्राय. पत्थरों के बने मन्दिर टूटे पड़े हैं। पत्थर की अपेक्षा लकड़ी सस्ती होती है। उसे नदियों द्वारा पहाड़ से लाते हैं। नदी के प्रायः सभी किनारों के मकानों के साथ वाटिकाएँ हैं अर्थात् नगर में वाटिका गृहों की अधिकता है। ये गर्मी तथा वसन्त ऋतु में बहुत ही रुचिकर लगते हैं। नगर के भीतरी भाग के बहुत मकानों में वाटिकाएं हैं। अनेक मकानों के के समीप महरे हैं। जहाँ मकान मालिक अपनी नावें रखते हैं। उनमें वे सम्पर्क स्थापित करते हैं। 'नगर के समीप एक अकेला पहाड़ है। उसके ढाल पर बड़े ही सुन्दर मकान बने हैं। मकानों में बगीचा है। चोटी पर मसजिद तथा आश्रम हैं। दोनों ही अच्छी इमारतें हैं। पर्वत की चोटी पर हरित पादपों के मुकुट हैं। अपने वृक्षों तथा बागों के कारण स्थानीय लोग उसे 'हरीपर्वत' कहते हैं। 'हरीपर्वत' के दूसरी तरफ एक और पर्वत है। उसपर एक छोटी मसजिद है। उसमें वाटिका हैं। वहाँ पर एक बहुत ही पुरानी इमारत है। उसके चिन्हों के देखने से स्पष्ट मालूम होता है। वह मन्दिर था। यद्यपि उसे तख्ते सुलेमान कहते हैं। मुसलमान कहते हैं। राजा सुलेमान जब कश्मीर में आए थे तो उन्होंने इसे बनवाया था। परन्तु मुझे सन्देह है। कभी हजरत सुलेमान का यहाँ प्रवेश हुआ था। 'दल लेक द्वीपो से भरी है। वे आरामगाह हैं। जल के बीच में वे बहुत ही हरे भरे और सुन्दर लगते हैं। उनमें फलदार वृक्ष तथा नियमित झफ्री- दार भ्रमण मार्ग से पूर्ण हैं। दो-दो फिट की दूरी पर लगाए गये हैं, यह वृक्ष इतने कम मोटे हैं कि