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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 984 में से

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दोनों हाथों के बीच में आ जाते हैं। किन्तु वे जहाज के मस्तूल इतने ऊंचे है। केवल शिरोभाग पर ताड़ के वृक्ष की तरह उनमें शाखों का गुच्छा होता है। 'लेक के तटवर्ती पर्वतों के ढालों पर मकानो तथा फूलों के बागों की भरमार है। हवा स्वास्थ्यकर है। इनका जलवायु बहुत ही अच्छा है। उनमें झरने तथा स्रोतस्विनियां खूब हैं। वहाँ से लेक, द्वीप तथा नगर का बहुत ही हृदयग्राही दृश्य मिलता है।' शालीमार बाग का बर्नियर ने ऐसा ही वर्णन किया है जैसा आज भी वह मौजूद है। केवल इतना और कहता है, 'शाहजहाँ द्वारा तोड़े गये मन्दिरों के खम्बो तथा द्वारों से नहरों के मध्य में ग्रीष्म भवन बनाया गया है। उनका मूल्यांकन करना कठिन है।' केप्टन नाइट (१८६०) श्रीनगर के विषय में लिखता है 'पूरे शहर में कोई भी प्राचीन निर्माणों के ध्वंसावशेषों को देख सकता है। वे विशाल शिलालेखों में अलंकृत मिलेंगे। ये लेख सब यहाँ लिखे मिलेंगे जो गौरवशाली प्राचीन काल की दुःखभरी कहानी कहते है। नदी के दोनों तटोंपर लकड़ियों के दर्शनीय मकानो की पंक्तियां मिलेगी।........बहुत से मकान मुझे मिलें। वे अपनी नींव की ओर जैसे 'पिसा के लीनिंग टावर' को भी लज्जित करते झाँक रहे हैं।........मकान छह मंजिलों तक ऊँचे है। इनकी खिडकियां लकड़ी के नक्काशी के कामो से सुन्दर बनी रहती हैं। 'पूर्व के वेनिस सदृश इस शहर की नदी में सैर करते हुए मैंने देखा कि नदी के तटपर बने भवनो की दीवारों में बहुत से अलंकृत शिलाखण्ड लगे थे। हम घूमते हुए एक मुसलिम कब्रिस्तान में पहुँचे। यहाँ एक गिरी मसजिद थी। उसमें बहुत से पुराने मन्दिरों के अलंकृत शिलाखण्ड लगे थे। वे प्राचीन मालूम होते थे। उन्होंने अपना जीवन इस मुसलिम भूमि से कही और प्रारम्भ किया था।' पण्डरेथन का मन्दिर सुन्दर है। में जिस समय यहाँ अपनी यात्रा में चौथी बार १३-९-१९६२ ई० में पहुँचा तो मन्दिर का द्वार वितस्ता जल के बाढ के कारण डूबने में केवल एक फीट ओर बाकी रह गया था। वितस्ता में बाढ आई थी। श्रीनगर अनन्त नाग तथा श्रीनगर-पठानकोट की सड़कों की सतह तक पानी की धारा बह रही थी। श्रीनगर पामपुर वाली सडक पर बाँध बँधने के कारण जल नहीं आ सका था। पंडरेथन का कुछ ऐसा विशद वर्णन लेखको ने किया है कि मैने समझा था कोई बहुत बड़ा मन्दिर होगा। ध्वंसा- वशेष तथा स्मारक अत्यधिक होंगे परन्तु यहाँ जितनी बार आया निराशा हुई। कश्मीर में जल प्लावन तथा वितस्ता के बाढ़ तथा उसके कारण हुए विनाश का बहुत वर्णन किया गया है। अतएव इस भयंकर बाढ के समय अपनी आँखों से कुछ देख लेने के मोह के कारण यात्रा की थी। इस समय यहाँ भारतीय सेना की छावनी पडी है। मन्दिर के पृष्ठभाग में पाकिस्तानी आक्रमण काल के समय वीरता प्रदर्शित करने के कारण मेजर शोभनाथ शर्मा, कमायूँ रेजिमेण्ट का स्मारक बना है। मन्दिर के दक्षिण मुख्य सड़क तक एक छोटा उद्यान बनाया गया है। चिनार का पेड़ लगा है। यहाँ पहले विलो अर्थात् बेंत के वृक्ष बहुत थे। परन्तु उनकी संख्या कम हो गयी है। मन्दिर का सरोवर ४० वर्ग गज होगा। मन्दिर १८ वर्ग फीट में है। सरोवर के पूर्व तरफ २ छोटे जलस्रोत हैं। उनका जल सरोवर में निरन्तर आता रहता है। सरोवर का जल झेलम नदी में एक गहरी नहर द्वारा निकल जाता है। झेलम मन्दिर से केवल २०० फीट दूर बहती है। मन्दिर कश्मीर के अन्य मन्दिरो तुल्य कश्मीर शैली पर बना है। मन्दिर का कलश गायब है या

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