भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 984 में से

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पृष्ठ 227

१४४ राजतरंगिणी मूर्ति के पृष्ठ भाग में एक चामर धारिणी युवती है। कश्मीर में उस समय महिलाओं की क्या वेशभूषा थी, किस प्रकार केशविन्यास, शृंगारादि करती थी इस विषय पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है। उसका वहाँ वर्णन अप्रासंगिक होगा। एक विचित्र खण्डित मूर्ति इस संग्रहालय में और है। मूर्ति का पाद से कटि प्रदेश तक का ही भाग शेष रह गया है। शेष भाग खण्डित कर दिया गया है। कही लुप्त हो गया है। यह पुरुष मूर्ति है। सिंह वाहन है। अर्थात् सिंह पर आसीन है। उसके पैर के अँगूठे से कटि तक, पादत्राण वस्त्रादि से विभूषित है। यह मूर्ति किसी कुषाण वंशीय राजा की हो सकती है। उसने अपनी शक्ति का परिचय सिंह पर बैठ कर दिया है। सिंहवाहिनी दुर्गा या देवी की यह मूर्ति नही है। यह किसी सैनिक राज- पुरुष की मूर्ति है। इसके पद की जो वेशभूषा है वह पेशावर जिला के ग्रामीण क्षेत्रों के बीसवी शताब्दी के प्रारम्भ काल तक प्रचलित थी। पुराधिष्ठान अर्थात् पण्डरेथन का वर्णन तथा विस्तार के साथ उल्लेख महर्षि वाल्मीकि प्रणीत 'योग वासिष्ठ रामायण' में जैसा मै ऊपर लिख चुका हूँ मिलता है। राजा यशस्कर के प्रसंग में मैने इसका वर्णन किया है। योग वासिष्ठ रामायण, पुराधिष्ठान तथा कश्मीर का सम्बन्ध है या नही। यह प्रश्न स्वयं एक स्वतंत्र विषय है। इस प्रसंग के लिये यहाँ इतना ही लिखना पर्याप्त प्रतीत होता है। योग वासिष्ठ के वर्णन और पुराधिष्ठान के भौगोलिक आदि स्थिति का पूरा मेल खाता है। कुछ विद्वान् कह सकते है कि योग वासिष्ठ का यह अंश प्रक्षिप्त है। इस विवाद में यहाँ प्रवेश करना अप्रासंगिक होगा। पर्वत के ढाल पर लगभग एक मील से अधिक के क्षेत्र में पुराने खिलौने, मूर्तियाँ आदि बहुत मिली हैं। वे इस तरह तोड़ी गयी है कि खण्ड मात्र रह गयी हैं। बादामी बाग के पास बैस्ट तथा अस्पताल आदि सैनिकोपयोगी स्थान बने है। यहाँ के खनन में हयग्रीव, वराह, रुद्र, पार्वती, शिव, भैरव, त्रिमूर्ति, लक्ष्मी की मूर्तियां मिली है। ये इतनी बुरी तरह तोड़ी गयी है कि उन्हें देखकर दया आती है। मूर्तियां भव्य, सुन्दर तथा कलापूर्ण हैं। उनकी अपनी शैली है। पण्डरेथन का सबसे पुराना फोटो कर्नल कोल की पुस्तक में छपा है। उसने पण्डरेथन के मन्दिर तथा कला पर प्रकाश डाला है। मन्दिर उस समय जिस अवस्था में था उसी अवस्था में आज है। केवल कुछ मरम्मत कर दी गया है। सैनिक छावनी के कारण इस स्थान पर कुछ चहल-पहल हो गयी है। यहाँ की मूर्तियां जिस कठोरता के साथ भग्न की गयी थी उसका प्रमाण श्रीनगर कला संग्रहालय में संग्रहीत मूर्तियां है। यहाँ के प्राप्त वस्तुओं से कश्मीर की तत्कालीन स्थिति पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है। प्रतापसिंह संग्रहालय में कुछ मूर्तियाँ तथा मूर्तिखण्ड संग्रहीत हैं। उनमें मूर्ति संख्या १६ गान्धार शैली की है। भगवान् बुद्ध ध्यान मुद्रा में आसीन हैं। महीन चीवर धारण किये है। पद्मासीन हैं। मूर्ति का हस्त नासिकादि खण्डित कर दिया गया है। भगवान् बुद्ध की खड़ी मूर्ति संख्या ११ मथुरा से प्राप्त भगवान् की प्रसिद्ध मूर्ति से मिलती है। कैप्टन सी नाइट (सन् १८६० ई०) के समय पण्डरेथन में खनन कार्य नही हुआ था। परन्तु उनके वर्णन से स्पष्ट होता है। वहीं यथेष्ट भग्नावशेष बिखरे थे। कालान्तर में खनन कार्य यहाँ पर किया गया। उससे प्रमाणित हो गया कि यह स्थान अत्यन्त प्राचीन रहा है। श्री नाइट ने अपनी पुस्तक में मन्दिर का जो चित्र दिया है उससे प्रकट होता है। मन्दिर इतना उपेक्षित एवं जीर्णावस्था में था कि शिखर पर एक