भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग १४५

पेड़ जम गया था। मन्दिर के चारों ओर नरकट के लम्बे-लम्बे पेड़ उगे थे। मन्दिर का मध्य भाग दिवाल सा लगता था। वह लिखता है—'श्रीनगर से तीन कोस इधर हम लोग एक विस्तृत दानव सम्बन्धी भूमि के ध्वंसावशेष पर ठहर गये। यह स्थान पण्डेरेथन कहा जाता है। यहाँ हमने पूर्णावस्था में एक इमारत देखी। इस प्रकार की इमारत अब तक हम लोगों ने नहीं देखी थी। उसके चारों ओर बहुत दूर तक इस प्रकार के चिह्न मिले जिनसे मालूम होता था कि प्राचीन काल में यहाँ विशाल नगर था।' 'अन्य रुचिकर अवशेषों में एक मूर्ति का ठोस अधिष्ठान देखा। वह एक फसल कटे हुए खेत में खड़ा था। मूर्ति की ठेहुनी से अधोभाग का शेष रह गया था। यह शिलाखण्ड सात फिट ऊँचा था। मूर्ति की उँगलियाँ तथा अँगूठे तोड़ डाले गये थे, किन्तु पाँव टूटने से बच गये थे। 'यहाँ से आधा मील दूर पर एक विशाल स्तम्भ की वेदी पड़ी थी। वह कुछ अच्छे स्थान पर थी। इसका व्यास छहफिट था। इसे यहाँ रखने के लिये भारी यन्त्र की आवश्यकता पड़ी होगी। कुछ दूर पर हमें स्तम्भ का भाग मिला। वह तीन भागों में खण्डित था। वह १२ फिट लम्बा था। उसका अधोभाग बहु कोणीय था। मध्य भाग गोलाकार था। शिरस् भाग नोकदार शुण्डाकार था। वह हिन्दुओं के महादेव के मन्दिर में लगे पत्थर के समान था। (पृष्ठ १२२) श्री कनिंघम (सन् १८४८ ई०) पण्डेरेथन के विषय में लिखते हैं—'इस नाम का अर्थ पुरानी राजधानी अथवा प्राचीन मुख्य नगर होता है। विभिन्न यात्रियों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से इसका उच्चारण किया है। श्री मूर क्राफ्ट ने इसे 'पण्डेयन' श्री वाइन ने 'पण्डरेण्टोन' तथा श्री बैरन हुगेल ने 'पण्डरीटन' लिखा है। १९

'इस मन्दिर की इमारत का उल्लेख सन् ६१३ तथा ९२१ के बीच मिलता है। तत्पश्चात् सन् ९५८ तथा ९७२ के मध्यवर्ती कालों में मिलता है। उस समय रोमन सम्राट् नीरो तुल्य राजा अभिमन्यु ने अपनी राजधानी में आग लगवा दी थी। किन्तु यह मन्दिर नष्ट होने से बच गया था। 'चूंकि यह एकमात्र मन्दिर पुरानी राजधानी में स्थित है, अतएव इसमें सन्देह नहीं कि यह वही मन्दिर है जो इस समय वर्तमान है। यह एक सरोवर के मध्य में स्थित है। चारों ओर जल है। यही स्थिति उस अग्निदाह के समय में रही होगी। अतएव अग्निदाह से यह बच गया था। जब कि अन्य इमारतें जलकर चूना और भस्म मात्र रह गयीं। 'बैरन हुगेल मन्दिर को बौद्धों का मानते हैं। कहते हैं। मन्दिर के अन्दर की मूर्तियां सुरक्षित हैं। किन्तु उनकी यह भ्रान्ति है। मन्दिर विष्णु का है। भीतर की मूर्तियों का कोई सम्बन्ध बौद्ध धर्म से नहीं है। 'श्री ट्रिवेक इसके भीतर तैर कर गये। उसे वहाँ किसी प्रकार की मूर्ति का दर्शन नहीं हुआ था। उस समय छत तक पानी था अतएव वह भीतर की मूर्तियां नहीं देख सके थे। 'जल के अन्दर मन्दिर बनाने का यह उद्देश्य रहा होगा कि उन्हें नागों की संरक्षता में रखा जाय। नागों के शरीर का ऊर्ध्व भाग मनुष्य तथा अधोभाग सर्प का होता है। कश्मीर में उनकी पूजा प्राचीन काल से प्रचलित थी।' जनरल एशियाटिक सोसाइटी (भाग : १६) श्री डब्लू० वेल फोहड (सन् १८७९ ई०) ने पण्डेरेथन को 'पण्डरिटन' लिखा है। वह लिखते हैं—'पण्डरिटन एक समय अत्यन्त समृद्धिशाली तथा बड़ा नगर था। प्रदेश की की राजधानी था। कितने दुःख का विषय है। अपने एक पुराने राजा के पागलपन के कारण यह पत्थरों का संग्रह मात्र रह गया है।