भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 229

१४६ राजतरंगिणी जीर्णं श्रीविजयेशस्य विनिवार्य्य सुधामयम्। निष्कल्मषेणाश्ममयः प्राकारो येन कारितः ॥१०५॥ १०५ उस निष्कल्मष राजा ने विजयेश्वर १ के पवित्र देव स्थान के जीर्ण हुए चूने आदि से बने प्राकार के स्थान पर नवीन पाषाण प्राकार का निर्माण कराया ।

'कहा जाता है। यह नगर एक समय मीलों में विस्तृत था। उसमें दर्शनीय भवन थे। अशोक ने एक देवस्थान निर्माण कराया था। उसमें भगवान् बुद्ध का एक धातु रखा गया था। इस समय उस पवित्र देव स्थान का पता नहीं है। उस गौरवशाली प्राचीन काल की स्मृति को जीवित रखने के लिये, इस एक मन्दिर के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रह गया है। यह मन्दिर सरोवर के मध्य में है। इसके चारों ओर विलों के उद्यान हैं। अतएव इसके भीतर क्या है । बहुत लोग इसके अन्दर जाकर देख नहीं सके हैं। (पृष्ठ २३६)

विजयेश्वर का मन्दिर राजा अनन्तदेव के समय में भस्म हो गया था। राजा कलश ने उसका जीर्णोद्धार कराया था। (रा० त० ७.५२४) पुराना आकार अथवा सुधामय सम्भवतः ईंट अथवा पत्थरों के ढोको का बना था। अशोक ने पत्थरों से उसका निर्माण कराया था।

नीलमत पुराण में दो स्थानों पर विजयेश का उल्लेख मिलता है। पहला वर्णन शक्र संशय तथा दूसरा वितस्ता माहात्म्य के वर्णन के सन्दर्भ में मिलता है। दोनों से कल्हण की बातों की पुष्टि होती है।

पाठभेद : श्लोक संख्या १०५ में 'सुधामयम्' का पाठभेद 'सोधम्' और 'प्राकारो' का पाठभेद 'प्रासादो' तथा 'कारितः' का 'निर्मितः' मिलता है।

पादटिप्पणियाँ : १०५ (१) विजयेश्वर. काल शिव विजयेश्वर का प्रसिद्ध देवालय वर्तमान बिजवोर तथा उसके आस- पास का क्षेत्र था। इसे विजयेश्वर क्षेत्र कहते थे। स्थानीय पुरोहितों के अनुसार विजयेश्वर का प्राचीन मन्दिर लगभग ४०० गज नदी तट से दूर वितस्ता सेतु के दूसरी तरफ था। यहाँ से कश्मीर के डोगरा राजा रणवीर सिंह ने अपने नवीन मन्दिर निर्माण निमित्त बहुत सामग्री प्राप्त की थी। यहाँ स्टीन सन् १८८९ में आये थे। मन्दिर के अधिष्ठान के पास कुछ टूटे हुए पत्थर तथा मलवे मिले थे। यहाँ पर कुछ निर्माण किया गया है। नवीन मन्दिर के समीप कुछ मूर्तियाँ जो पुरानी नही मालूम होती, रखी थी। यह मन्दिर नदी के ऊपर कुछ दूर पर बना है।

विशोकां विजयेशं च वितस्तां सिन्धुसंगमम् । एतान् सर्वानतिक्रम्य प्रययौ भरतं गिरिम् ॥ 1056 : १२४०

'—विशोका, विजयेश, वितस्ता, सिन्धु संगम पार करते हुए वह भरतगिरि पर पहुँचा । विजयेशाग्रतः स्नात्वा वितस्तायां महीपते । रुद्रलोकमवाप्नोति कुलमुद्धरते सुखम् ॥ 1303 : १५१६,१५१७

'महीपते ! विजयेश्वर के सम्मुख वितस्ता में स्नान करने वाला अपने कुल का उद्धार करता स्वयं रुद्रलोक प्राप्त कर सुख भोगता है । उक्त उद्धरणों से दो बातें स्पष्ट होती हैं। विजयेश्वर तीर्थ था। विजयेश्वर घाटपर स्नान करने पर मुक्ति मिलती थी । कुल का उद्धार होता था । सुख की प्राप्ति होती थी । विजयेश का महत्त्व सिन्धु संगम जैसा महत्त्वपूर्ण था । उसकी गणना पवित्र स्थानों में थी । इन आध्यात्मिक महत्त्व के साथ दूसरा भौगोलिक महत्त्व भी प्रकट होता है। वितस्ता