राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 230, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १४७ सभायां विजयेशस्य समीपे च विनिर्ममे । शान्तावसादः प्रासादावशोकेश्वरसंज्ञितौ ॥१०६॥ १०६. उस शान्त एवं अवसाद रहित राजा ने विजयेश्वर के समीप दो प्रासादों¹ का निर्माण सभा² स्थान में कराया उनका नाम अशोकेश्वर³ था।
तटपर विजयेश तीर्थ था। वर्तमान बिजन्नोर अथवा ब्रिजवेहरा किंवा व्रजब्रारी ही पूर्वकालीन विजयेश्वर क्षेत्र था। वहाँ के मन्दिर में एक विजयेश का मन्दिर था। अशोकेश्वर का वर्णन नीलमत पुराण में नहीं आता है। इस अभाव के दो कारण हो सकते हैं। पहला कारण यह हो सकता है कि नीलमत पुराण अशोक के पूर्व लिखा गया हो अथवा विजयेश यहाँ के प्राचीन नगर देवता थे अतएव उनका महत्त्व काशी के देवता काशी विश्वनाथ की तरह था। नीलमत पुराण ने विजयेश को ही तीर्थ तथा तीर्थ का प्रधान देवता माना होगा। अन्य देवताओं का उल्लेख विजयेश क्षेत्र में नहीं मिलता।
बिजन्नोर अर्थात् विजयेश्वर श्रीनगर से १९ मील दूर स्थित है। कल्हण के अनुसार इस मन्दिर की स्थापना विजयराज ने की थी। (राज० त० २:६२) सिकन्दर बुतशिकन ने इसे नष्ट किया था। यहाँ पर बड़ी मसजिद के समीप कुछ ध्वंसावशेष पाये जाते हैं। इस मन्दिर का स्तम्भ रतन हाजी की मसजिद में तथा प्रसाद चढ़ाने का बड़ा शिलाखण्ड मसजिद के बाहर पड़ा है। कथा है कि इस मन्दिर के नष्ट होने का समय शिलालेख पर पहले ही लिखकर रख दिया गया था। उस पर लिखा था 'बिस्मिल्लाह मन्त्रेण भग्नन्त विजयेश्वर।'
विजयेश्वर का उल्लेख जोन आदि की राज- तरंगिणी (दत्त पृष्ठ ११, ८८, १२०, १३२, १४०, १४६, १४७, ३२२, ३७२, ३८१, ४०८) में विशेष रूप से किया गया है।
१०६ (१) प्रासाद : प्रासाद शब्द से किंचित् भ्रम उत्पन्न हो सकता है। आजकल प्रासाद शब्द मन्दिरों के लिये प्रयोग नहीं किया जाता। संस्कृत में प्रासाद का अर्थ—राजभवन, विशाल भवन, देवालय एवं मन्दिर है । ‘प्रासादो देवभूभुजाम्।’ अर्थात् देवालय एवं महल दोनो का अर्थ प्रासाद है। अमर कोष (२:२:९)
(२) सभा : आज भी यह प्रथा प्रचलित है। बड़े मन्दिरों में राजा तथा श्रीसम्पन्न लोग छोटे-छोटे मन्दिर अपने नाम से स्थापित करा देते हैं। काशी विश्वनाथ के मन्दिर में इस प्रकार कितने ही शिव लिंगों की स्थापना लोगों ने करायी है। छोटे-छोटे मन्दिर दीवारों तथा खाली स्थानों में बनवा दिये जाते हैं। दक्षिण भारत की यात्रा में भी मैंने विशाल मन्दिरों में यह प्रथा प्रचलित पायी है। अशोक ने भी इसी प्रकार पुण्यार्जन निमित्त विजयेश्वर जैसे पवित्र धाम में उसके सभा स्थल अर्थात् प्राकार के भीतर मन्दिर निर्माण कराया होगा।
सभा का अर्थ यहाँ सभामण्डप तथा विशाल मन्दिर का प्राकार दोनो लगाया जा सकता है। सभा का अर्थ वास, कुटी, शाला, सभा, सभाभवन, सभासद् तथा परिषद् होता है। (अमर कोष २:२.७ तथा ३:१:१३७) सभामण्डप छाया हुआ सभा का स्थान होता है। गर्भ गृह के सम्मुख ढके स्थान को सभामण्डप कहते हैं। यह सभी मन्दिरों में होता है। यहाँ पर अर्थ सभा अर्थात् विस्तृत प्राकार वेष्टित स्थान लगाना उचित प्रतीत होता है। यद्यपि मन्दिर के सभा मण्डप में भी लोग अपने नाम से दीवालों या किसी कोने में मूर्तियाँ स्थापित कर देते हैं। अशोक के निर्मित मन्दिर निश्चय ही विजयेश्वर प्राकार के अन्तर्गत भिन्न मन्दिर थे।
(३) अशोकेश्वर : विजयेश्वर के प्रसंग में लिखा जा चुका है कि मन्दिर का पता नहीं चलता।