भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग १५१

एक जाति रूप में जीवित जागृत प्राणी माना गया है । पुराण इसका स्पष्ट निर्देश करते हैं । वह एक जाति थी । किन्तु अशिक्षित थी । नाग तथा पिशाच जाति से गये गुजरे थे । उनका कोई साहित्य तथा इतिहास नहीं मिलता । केवल पुराणों के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है । पुराणों के अनुसार भूत प्राचीन भारतीय मानव जातियों में एक जाति थी । पुराण मानव जाति के चार वर्ग करते हैं : (१) धर्म प्रजा (२) ईश्वर प्रजा (३) काश्यपीय प्रजा तथा (४) पुलह प्रजा । धर्म प्रजा की उत्पत्ति धर्म ऋषि से हुई थी । ईश्वर प्रजा की उत्पत्ति ईश्वर से हुई थी । काश्यपी प्रजा की उत्पत्ति काश्यप ऋषि में हुई थी । पुलह प्रजा की उत्पत्ति पुलह ऋषि से हुई थी । भूत योनि प्राप्त प्राणियों की पुलह प्रजा में गणना होती है । (ब्रह्माण्ड पुराण १·३२·८८, २·३·३-३५ तथा २·७) पुराणों में भूतों के राजा की संज्ञा रुद्र वैदिक देवता है । रुद्र को भूतनायक तथा गणनायक कहा गया है । भूतों को रुद्र का अनुचर एवं भव परिषद् कहा गया है । रुद्र प्रतीत होता है । कोई एक व्यक्ति नही थे । भूतों के राजा की सामूहिक संज्ञा थी । अनेक स्थानों पर इनके राजा को गणपति भी कहा गया है । यह गणपति आर्य कालीन गण राज्य के अध्यक्ष एवं सभापति से भिन्न थे । उनमें जो सबसे शक्तिशाली किंवा बलवान व्यक्ति होता था वह राजा निर्वाचित किया जाता था । उसका नाम रुद्र रखा जाता था । पुराणों में इस प्रकार के दो रुद्रों का उल्लेख मिलता है । वीरभद्र सिंहमुख नामक भूतगणों का प्रमुख था । (वामन पुराण : ४:१७) दूसरे रुद्र का नाम नन्दिकेश्वर था । शैलादि नायक भूत गणों का नेता था । (मत्स्य पुराण : १८१:२) वामन पुराण भूतगणों की जनसंख्या ग्यारह करोड़ देता है । उनमें स्पंद, शास्त्र एवं भैरवादि प्रमुख थे । इसी पुराण में भूतों के रूप एवं अस्त्रों का विस्तृत वर्णन किया गया है । उक्त पुराण में भूतों की आकृति का भी वर्णन किया गया है । जिस प्रकार किन्नरों को 'अश्वमुख' कहा गया है । उसी प्रकार भूतों को 'वानरास्य' एवं 'मृगेन्द्र वदन' कहा गया है । भस्म, खट्वांग आदि उनके आयुध थे । इनकी ध्वजा पर किसी पशु या पक्षी की आकृति बनी रहती है । प्रत्येक गण ध्वजा के नाम पर 'मयूरध्वज' आदि नाम से सम्बोधित किया जाता था । (वामन पुराण : ६७:१-२३) भूतों को ऊर्ध्वरेतस् कहा गया है । अर्थात् वे ब्रह्मचर्य का पालन करते थे । उनमें विवाह पद्धति मालूम नही पड़ती । किन्तु रुद्राणी आदि कतिपय भूत स्त्रियों का उल्लेख मिलता है । इनका वर्णन मार्कण्डेय, वामन पुराणों तथा देवी माहात्म्य में मिलता है । इनके आकृति का जो वर्णन किया गया है वह आस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका के जंगली जातियों से मिलता है । बौद्ध ग्रन्थों में भूत-प्रेत शब्द आता है । प्रेत को वे एक योनि मानते हैं । परन्तु भूत को दिवंगत व्यक्ति की आत्मा किंवा शरीर विहीन प्राणी नही मानते । 'भूत गाम' शब्द का प्रयोग किया गया है । वृक्षों आदि को काटने तथा गिराने पर प्रायश्चित्त करने का विधान है उसे 'भूत गाम' की संज्ञा दी गयी है । भूत से प्रेत अलग माने गये हैं। प्रेतों को पेच्च किंवा पेत आस अर्थात् प्रेत कहते हैं । प्रेत वत्थु तथा बम्हजाल सुत्त में इस प्रकार का उल्लेख मिलता है । मैं समझता हूँ । कश्मीर में नाग तथा पिशाचों के पूर्व भूत जाति पर्वतीय क्षेत्रों में रहती थी । वह पूरे आदिवासी थे । भारत तथा कश्मीर के सबसे प्राचीन मानव असभ्य असंस्कृत प्राणी थे । एक समय