राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० राजतरंगिणी . सब्य प्राप्त, विघ्न, भावित, आसादित, बोर भूत हैं। पुनः (३:३.७७) में अर्थ किया गया है। अत्याहितं महाभीतिः कर्म जीवानपेक्षि च। युक्ते क्ष्मादावृते भूतं प्राण्यतीते समे त्रिषु ॥ अर्थ होता है अत्याहितं —महाभय, साहसी कर्म, व्याप्य, पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश, गत्य, प्राणी, बीता समय। ब्रह्माण्ड पुराण के मतानुसार भूतों की उत्पत्ति भूत तत्त्व से हुई थी। इनका भोजन पिशित था। (२८ ३९-४०) 'पिशित' का अर्थ होता है मांस- भक्षी, राक्षस, पिशाचादि। इनका वर्णन अद्भुत है। वे कृशांग अर्थात् छोटे कद के थे। लंबकर्ण थे। प्रलम्बोष्ठ थे। लम्बे दाँत युक्त थे। नखिन् अर्थात् नख रखते थे। स्थूलपिण्डक अर्थात् स्थूल शरीर वाले थे। बभ्रु व अर्थात् लम्बी भौ वाले थे। हरि तथा मु ज केश थे। ठिगने थे। वर्ण नीललोहित था। पिंगल वर्ण भी होता था। सगोत्र विरोधी होते थे। शक्तिशाली होते थे। सर्प यज्ञोपवीत धारण करते थे। शरीर को अनेक रंगों के लेप द्वारा सज्जित करते थे। केशों को मुकुट तुल्य बाँध कर रखते थे। हाथी का चमड़ा धारण करते थे, अथवा नग्न रहते थे। इनके आयुध, शूल, धनुष, निषंग, वरूथ तथा असि थे। यह वर्णन अफ्रीका तथा आस्ट्रेलिया की घोर जंगली जातियों से मिलता है। पूर्व काल मे अत्यन्त जंगली जाति थे। किन्तु असुर एवं देवों के सम्पर्क के कारण इनकी स्थिति में विशेष सुधार हो गया था। असुरों के सम्पर्क के कारण नृत्य एवं संगीत इन्होंने सीखा। एक तरह की सामाजिक व्यवस्था में इन्होंने अपने को संघटित किया। उनकी मूल सामाजिक व्यवस्था क्या थी। पुराणो आदि मे विस्तार से वर्णन नही मिलता। स्वायम्भुव मन्वन्तर के पूर्व युग में भारतवर्ष में ये निवास करते थे। इनका निवासस्थान हिमाचल का पर्वतीय प्रदेश था। धुर उत्तरीय हिमालय भाग में रहते थे। भारतवर्ष के सबमे पुराने रहनेवाले थे। मूल निवासी थे। असुरों तथा भूत जाति में प्रायः संघर्ष होता रहा। उत्तर से असुरों का दबाव पड़ने लगा। ये अपनी रक्षा निमित्त विन्ध्य की पहाड़ियों में चले आये। यही रहने लगे थे। शंकर भगवान् तथा अन्धकासुर के युद्ध में भूतों ने शंकर के पक्ष में रहकर युद्ध किया था। इस युद्ध में विनायक भूत ने सर्वप्रथम अन्धकासुर पर आक्रमण किया था। अंधक ने विनायक को परास्त कर दिया। अनन्तर नंदी तथा विनायक दोनों ने अन्धकासुर पर आक्रमण किया था। उस युद्ध में अन्धकासुर पराजित हो गया था। अंधक शंकर की शरण में आ गया। शंकर ने उसे भूतगण का गणपति बनाया। उसका नाम भृंगी पड़ा। भूत एक जाति थी। यह पर्वतीय जाति थी। पिशाच एवं नाग जाति की तरह उत्तर पश्चिम भारतीय सीमा के आस-पास रहते थे। कश्मीर में नाग तथा पिशाचों के संघर्ष के कारण आर्यों का वहाँ आगमन हुआ। उसी प्रकार प्रतीत होता है। भूत तथा असुरों के संघर्ष के कारण कालान्तर में दुर्बल होने पर भूत जाति उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ने लगी। अन्त में विन्ध्य की पहाड़ियों में शरण ली। वैवस्वत मन्वन्तर के काल तक उनका स्थानान्तरण उत्तर से दक्षिण की ओर पूर्ण हो गया था। (वायु पुराण ३०:८९-१०१, वामनपुराण ६७:१-२३; ब्रह्माण्ड: १:३२:८८-८९; २:३:२-३४ २:८.३९-४०; २:९:६८-७८;) भूतों को प्रेतों की संज्ञा कालान्तर मे दे दी गयी। उन्हे शरीरहीन मृतको के जीव रूप में मान लिया गया। बात इसके विपरीत है। भूत को