भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग साथी अफगानिस्तान तथा भारत के पश्चिम उत्तर सीमा पर बस गये थे। उनका वहाँ राज्य भी स्थापित हो गया था। कश्मीर की सीमापर स्थित काफिरिस्तान के लोग अपने को यूनानी वंशज कहा करते थे। वे बीसवी शताब्दी के आरम्भ में गैर मुस्लिम धर्म माननेवाले थे। वे एक प्रकार से मूर्तिपूजक थे। अतएव अफगानी उन्हें काफिर और उनके भूखण्ड को काफिरिस्तान कहते थे । अंग्रेजों ने काबुल फतह किया। उस समय काफिरिस्तान के निवासियो का एक शिष्ट मण्डल उन्हें यूरोपीय तथा अपना वंशज जानकर उनसे मिलने आया था । कालान्तर मे काफिरिस्तान पर अफगानिस्तान के अमीर अब्बुलरहमान का अधिकार हो गया । उन्हें शक्ति प्रदर्शन द्वारा मुस्लिम धर्म में परिवर्तित किया गया । उनके बच्चे काबुल आदि स्थानों में इस्लामी शिक्षा प्राप्ति निमित्त भेज दिये गये । जिन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार नही किया वे बुरी तरह मार डाले गये । ( वान् क्रिश्चियन लेस्सिन लिपजिगः रा० ६६-१८७४ 'इण्डिसचे अल्त्युम्स कुण्डे' भाग २ः पृष्ठ २८५ ) अशोक के समय यूनानी अर्थात् म्लेच्छ भारत की सीमा पर रहते थे । भारतीय भूखण्डपर आक्रमण करते थे । कश्मीर की सीमा पर उनकी आबादी थी । अशोक के समय कश्मीर मण्डल में प्रवेश, उनके रीति-रिवाज एवं धार्मिक धारणाओं का कश्मीर मण्डल पर प्रभाव और उनका कश्मीर के भूखण्ड पर अनेक भागों में अधिकार हो गया होगा । एतदर्थ उनके उन्मूलन अर्थात् उनसे कश्मीर मण्डल की रक्षा निमित्त अशोक ने भूतेश्वर की पूजा कर पुत्र रत्न प्राप्त किया था । कल्हण के अन्य स्थानों के वर्णनों से भी इसी बात की पुष्टि होती है। तरंग आठ मे भोज के प्रसंग में वर्णन करता है कि भोज ने सीमान्त म्लेच्छ जाति से संपर्क स्थापित कर सहायता ली थी । ( रा० त० ८:२७६३, २७६६ ) मनुस्मृति में उन सब धर्मभ्रष्ट जातियों को म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारत में कही भी निवास करते थे। उनका सर्व प्रथम उल्लेख भारत के पश्चिम-उत्तर की सीमा पर मिलता है । किन्तु महाभारत से मालूम होता है कि राजा भगदत्त ने समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों के साथ युधिष्ठिर के राजसूयज्ञ में भाग लिया था । भीमसेन ने दिग्विजय के समय पूर्व दिशा में समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों को जीता था। सहदेव ने दक्षिण तथा नकुल ने पश्चिम-उत्तर के दिग्विजय काल में म्लेच्छों पर विजय प्राप्त की थी । स्पष्ट प्रतीत होता है। महाभारत काल में म्लेच्छ भारत मे चारो दिशाओं में थे। महाभारत के युद्ध में कौरवों का पक्ष म्लेच्छो ने ग्रहण किया था। अर्जुन ने समस्त 'जटिलान, म्लेच्छो का सहार किया था। म्लेच्छों के धंग नामक राजा का वध नकुल ने किया था । म्लेच्छहन्तृ प्रद्योत राजा का नाम म्लेच्छों के संहार करने के कारण पड़ गया था । ( म० द्रो : ६८:४२-४४, ९५:३६, म० स० : २७.२५-२६, २८:४४; २९:१५, ३१.१०, म० व० १८८:२८- २९; म० शास्व० : ९१:२५; म० क० : १४:१४- १७ ) स्पष्ट प्रतीत होता है कि प्रारम्भ मे म्लेच्छ जाति भारती सीमा पर स्थित अभारतीय धर्म मानने वाली जाति थी। कालान्तर में उन सभी जातियों को म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारतीय धर्म तथा आचार को नहीं मानते थे । (२) भूत : भूत का अर्थ होता है-अतीत-जो बीत चुका है । घटित है । पंच महाभूतो में पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश सत्त्व आते हैं। अमरकोष- कार भूत का अर्थ करता है—लक्ष्यं प्राप्तं वृत्तं भावितमासादितं च भूतं च । ( ३:१:१०४ ) अर्थात्