राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
प्रथम तरंग साथी अफगानिस्तान तथा भारत के पश्चिम उत्तर सीमा पर बस गये थे। उनका वहाँ राज्य भी स्थापित हो गया था। कश्मीर की सीमापर स्थित काफिरिस्तान के लोग अपने को यूनानी वंशज कहा करते थे। वे बीसवी शताब्दी के आरम्भ में गैर मुस्लिम धर्म माननेवाले थे। वे एक प्रकार से मूर्तिपूजक थे। अतएव अफगानी उन्हें काफिर और उनके भूखण्ड को काफिरिस्तान कहते थे । अंग्रेजों ने काबुल फतह किया। उस समय काफिरिस्तान के निवासियो का एक शिष्ट मण्डल उन्हें यूरोपीय तथा अपना वंशज जानकर उनसे मिलने आया था । कालान्तर मे काफिरिस्तान पर अफगानिस्तान के अमीर अब्बुलरहमान का अधिकार हो गया । उन्हें शक्ति प्रदर्शन द्वारा मुस्लिम धर्म में परिवर्तित किया गया । उनके बच्चे काबुल आदि स्थानों में इस्लामी शिक्षा प्राप्ति निमित्त भेज दिये गये । जिन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार नही किया वे बुरी तरह मार डाले गये । ( वान् क्रिश्चियन लेस्सिन लिपजिगः रा० ६६-१८७४ 'इण्डिसचे अल्त्युम्स कुण्डे' भाग २ः पृष्ठ २८५ ) अशोक के समय यूनानी अर्थात् म्लेच्छ भारत की सीमा पर रहते थे । भारतीय भूखण्डपर आक्रमण करते थे । कश्मीर की सीमा पर उनकी आबादी थी । अशोक के समय कश्मीर मण्डल में प्रवेश, उनके रीति-रिवाज एवं धार्मिक धारणाओं का कश्मीर मण्डल पर प्रभाव और उनका कश्मीर के भूखण्ड पर अनेक भागों में अधिकार हो गया होगा । एतदर्थ उनके उन्मूलन अर्थात् उनसे कश्मीर मण्डल की रक्षा निमित्त अशोक ने भूतेश्वर की पूजा कर पुत्र रत्न प्राप्त किया था । कल्हण के अन्य स्थानों के वर्णनों से भी इसी बात की पुष्टि होती है। तरंग आठ मे भोज के प्रसंग में वर्णन करता है कि भोज ने सीमान्त म्लेच्छ जाति से संपर्क स्थापित कर सहायता ली थी । ( रा० त० ८:२७६३, २७६६ ) मनुस्मृति में उन सब धर्मभ्रष्ट जातियों को म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारत में कही भी निवास करते थे। उनका सर्व प्रथम उल्लेख भारत के पश्चिम-उत्तर की सीमा पर मिलता है । किन्तु महाभारत से मालूम होता है कि राजा भगदत्त ने समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों के साथ युधिष्ठिर के राजसूयज्ञ में भाग लिया था । भीमसेन ने दिग्विजय के समय पूर्व दिशा में समुद्रतटवर्ती म्लेच्छों को जीता था। सहदेव ने दक्षिण तथा नकुल ने पश्चिम-उत्तर के दिग्विजय काल में म्लेच्छों पर विजय प्राप्त की थी । स्पष्ट प्रतीत होता है। महाभारत काल में म्लेच्छ भारत मे चारो दिशाओं में थे। महाभारत के युद्ध में कौरवों का पक्ष म्लेच्छो ने ग्रहण किया था। अर्जुन ने समस्त 'जटिलान, म्लेच्छो का सहार किया था। म्लेच्छों के धंग नामक राजा का वध नकुल ने किया था । म्लेच्छहन्तृ प्रद्योत राजा का नाम म्लेच्छों के संहार करने के कारण पड़ गया था । ( म० द्रो : ६८:४२-४४, ९५:३६, म० स० : २७.२५-२६, २८:४४; २९:१५, ३१.१०, म० व० १८८:२८- २९; म० शास्व० : ९१:२५; म० क० : १४:१४- १७ ) स्पष्ट प्रतीत होता है कि प्रारम्भ मे म्लेच्छ जाति भारती सीमा पर स्थित अभारतीय धर्म मानने वाली जाति थी। कालान्तर में उन सभी जातियों को म्लेच्छ की संज्ञा दे दी गयी जो भारतीय धर्म तथा आचार को नहीं मानते थे । (२) भूत : भूत का अर्थ होता है-अतीत-जो बीत चुका है । घटित है । पंच महाभूतो में पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश सत्त्व आते हैं। अमरकोष- कार भूत का अर्थ करता है—लक्ष्यं प्राप्तं वृत्तं भावितमासादितं च भूतं च । ( ३:१:१०४ ) अर्थात्
१५० राजतरंगिणी . सब्य प्राप्त, विघ्न, भावित, आसादित, बोर भूत हैं। पुनः (३:३.७७) में अर्थ किया गया है। अत्याहितं महाभीतिः कर्म जीवानपेक्षि च। युक्ते क्ष्मादावृते भूतं प्राण्यतीते समे त्रिषु ॥ अर्थ होता है अत्याहितं —महाभय, साहसी कर्म, व्याप्य, पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश, गत्य, प्राणी, बीता समय। ब्रह्माण्ड पुराण के मतानुसार भूतों की उत्पत्ति भूत तत्त्व से हुई थी। इनका भोजन पिशित था। (२८ ३९-४०) 'पिशित' का अर्थ होता है मांस- भक्षी, राक्षस, पिशाचादि। इनका वर्णन अद्भुत है। वे कृशांग अर्थात् छोटे कद के थे। लंबकर्ण थे। प्रलम्बोष्ठ थे। लम्बे दाँत युक्त थे। नखिन् अर्थात् नख रखते थे। स्थूलपिण्डक अर्थात् स्थूल शरीर वाले थे। बभ्रु व अर्थात् लम्बी भौ वाले थे। हरि तथा मु ज केश थे। ठिगने थे। वर्ण नीललोहित था। पिंगल वर्ण भी होता था। सगोत्र विरोधी होते थे। शक्तिशाली होते थे। सर्प यज्ञोपवीत धारण करते थे। शरीर को अनेक रंगों के लेप द्वारा सज्जित करते थे। केशों को मुकुट तुल्य बाँध कर रखते थे। हाथी का चमड़ा धारण करते थे, अथवा नग्न रहते थे। इनके आयुध, शूल, धनुष, निषंग, वरूथ तथा असि थे। यह वर्णन अफ्रीका तथा आस्ट्रेलिया की घोर जंगली जातियों से मिलता है। पूर्व काल मे अत्यन्त जंगली जाति थे। किन्तु असुर एवं देवों के सम्पर्क के कारण इनकी स्थिति में विशेष सुधार हो गया था। असुरों के सम्पर्क के कारण नृत्य एवं संगीत इन्होंने सीखा। एक तरह की सामाजिक व्यवस्था में इन्होंने अपने को संघटित किया। उनकी मूल सामाजिक व्यवस्था क्या थी। पुराणो आदि मे विस्तार से वर्णन नही मिलता। स्वायम्भुव मन्वन्तर के पूर्व युग में भारतवर्ष में ये निवास करते थे। इनका निवासस्थान हिमाचल का पर्वतीय प्रदेश था। धुर उत्तरीय हिमालय भाग में रहते थे। भारतवर्ष के सबमे पुराने रहनेवाले थे। मूल निवासी थे। असुरों तथा भूत जाति में प्रायः संघर्ष होता रहा। उत्तर से असुरों का दबाव पड़ने लगा। ये अपनी रक्षा निमित्त विन्ध्य की पहाड़ियों में चले आये। यही रहने लगे थे। शंकर भगवान् तथा अन्धकासुर के युद्ध में भूतों ने शंकर के पक्ष में रहकर युद्ध किया था। इस युद्ध में विनायक भूत ने सर्वप्रथम अन्धकासुर पर आक्रमण किया था। अंधक ने विनायक को परास्त कर दिया। अनन्तर नंदी तथा विनायक दोनों ने अन्धकासुर पर आक्रमण किया था। उस युद्ध में अन्धकासुर पराजित हो गया था। अंधक शंकर की शरण में आ गया। शंकर ने उसे भूतगण का गणपति बनाया। उसका नाम भृंगी पड़ा। भूत एक जाति थी। यह पर्वतीय जाति थी। पिशाच एवं नाग जाति की तरह उत्तर पश्चिम भारतीय सीमा के आस-पास रहते थे। कश्मीर में नाग तथा पिशाचों के संघर्ष के कारण आर्यों का वहाँ आगमन हुआ। उसी प्रकार प्रतीत होता है। भूत तथा असुरों के संघर्ष के कारण कालान्तर में दुर्बल होने पर भूत जाति उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ने लगी। अन्त में विन्ध्य की पहाड़ियों में शरण ली। वैवस्वत मन्वन्तर के काल तक उनका स्थानान्तरण उत्तर से दक्षिण की ओर पूर्ण हो गया था। (वायु पुराण ३०:८९-१०१, वामनपुराण ६७:१-२३; ब्रह्माण्ड: १:३२:८८-८९; २:३:२-३४ २:८.३९-४०; २:९:६८-७८;) भूतों को प्रेतों की संज्ञा कालान्तर मे दे दी गयी। उन्हे शरीरहीन मृतको के जीव रूप में मान लिया गया। बात इसके विपरीत है। भूत को
प्रथम तरंग १५१
एक जाति रूप में जीवित जागृत प्राणी माना गया है । पुराण इसका स्पष्ट निर्देश करते हैं । वह एक जाति थी । किन्तु अशिक्षित थी । नाग तथा पिशाच जाति से गये गुजरे थे । उनका कोई साहित्य तथा इतिहास नहीं मिलता । केवल पुराणों के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है । पुराणों के अनुसार भूत प्राचीन भारतीय मानव जातियों में एक जाति थी । पुराण मानव जाति के चार वर्ग करते हैं : (१) धर्म प्रजा (२) ईश्वर प्रजा (३) काश्यपीय प्रजा तथा (४) पुलह प्रजा । धर्म प्रजा की उत्पत्ति धर्म ऋषि से हुई थी । ईश्वर प्रजा की उत्पत्ति ईश्वर से हुई थी । काश्यपी प्रजा की उत्पत्ति काश्यप ऋषि में हुई थी । पुलह प्रजा की उत्पत्ति पुलह ऋषि से हुई थी । भूत योनि प्राप्त प्राणियों की पुलह प्रजा में गणना होती है । (ब्रह्माण्ड पुराण १·३२·८८, २·३·३-३५ तथा २·७) पुराणों में भूतों के राजा की संज्ञा रुद्र वैदिक देवता है । रुद्र को भूतनायक तथा गणनायक कहा गया है । भूतों को रुद्र का अनुचर एवं भव परिषद् कहा गया है । रुद्र प्रतीत होता है । कोई एक व्यक्ति नही थे । भूतों के राजा की सामूहिक संज्ञा थी । अनेक स्थानों पर इनके राजा को गणपति भी कहा गया है । यह गणपति आर्य कालीन गण राज्य के अध्यक्ष एवं सभापति से भिन्न थे । उनमें जो सबसे शक्तिशाली किंवा बलवान व्यक्ति होता था वह राजा निर्वाचित किया जाता था । उसका नाम रुद्र रखा जाता था । पुराणों में इस प्रकार के दो रुद्रों का उल्लेख मिलता है । वीरभद्र सिंहमुख नामक भूतगणों का प्रमुख था । (वामन पुराण : ४:१७) दूसरे रुद्र का नाम नन्दिकेश्वर था । शैलादि नायक भूत गणों का नेता था । (मत्स्य पुराण : १८१:२) वामन पुराण भूतगणों की जनसंख्या ग्यारह करोड़ देता है । उनमें स्पंद, शास्त्र एवं भैरवादि प्रमुख थे । इसी पुराण में भूतों के रूप एवं अस्त्रों का विस्तृत वर्णन किया गया है । उक्त पुराण में भूतों की आकृति का भी वर्णन किया गया है । जिस प्रकार किन्नरों को 'अश्वमुख' कहा गया है । उसी प्रकार भूतों को 'वानरास्य' एवं 'मृगेन्द्र वदन' कहा गया है । भस्म, खट्वांग आदि उनके आयुध थे । इनकी ध्वजा पर किसी पशु या पक्षी की आकृति बनी रहती है । प्रत्येक गण ध्वजा के नाम पर 'मयूरध्वज' आदि नाम से सम्बोधित किया जाता था । (वामन पुराण : ६७:१-२३) भूतों को ऊर्ध्वरेतस् कहा गया है । अर्थात् वे ब्रह्मचर्य का पालन करते थे । उनमें विवाह पद्धति मालूम नही पड़ती । किन्तु रुद्राणी आदि कतिपय भूत स्त्रियों का उल्लेख मिलता है । इनका वर्णन मार्कण्डेय, वामन पुराणों तथा देवी माहात्म्य में मिलता है । इनके आकृति का जो वर्णन किया गया है वह आस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका के जंगली जातियों से मिलता है । बौद्ध ग्रन्थों में भूत-प्रेत शब्द आता है । प्रेत को वे एक योनि मानते हैं । परन्तु भूत को दिवंगत व्यक्ति की आत्मा किंवा शरीर विहीन प्राणी नही मानते । 'भूत गाम' शब्द का प्रयोग किया गया है । वृक्षों आदि को काटने तथा गिराने पर प्रायश्चित्त करने का विधान है उसे 'भूत गाम' की संज्ञा दी गयी है । भूत से प्रेत अलग माने गये हैं। प्रेतों को पेच्च किंवा पेत आस अर्थात् प्रेत कहते हैं । प्रेत वत्थु तथा बम्हजाल सुत्त में इस प्रकार का उल्लेख मिलता है । मैं समझता हूँ । कश्मीर में नाग तथा पिशाचों के पूर्व भूत जाति पर्वतीय क्षेत्रों में रहती थी । वह पूरे आदिवासी थे । भारत तथा कश्मीर के सबसे प्राचीन मानव असभ्य असंस्कृत प्राणी थे । एक समय
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आया । नाग जाति ने उन्हें उद्वासित किया होगा । भूतों के नागो का यज्ञोपवीत पहनने का दो अर्थ हो सकता है। एक तो मुण्डमाला के समान नागों की हत्या का प्रतीक होगा दूसरा नागों से उनमें किसी प्रकार सन्धि हो गयी थी । प्रतीक स्वरूप हृदय स्थान पर यज्ञोपवीत धारण करते थे । शंकर किंवा रुद्र दोनों का अधिपति होकर भूतेश तथा नागेश हो गये । भूतगण नागगण उनके गण बन गये । भूत शब्द शायद इसलिये प्रयोग किया गया कि ये भूत की एक जाति थे। उनका मिश्रण पिशाच, नाग तथा आर्यों में हो गया अतएव उनका जाति का चाहे जो भी नाम रहा हो उसकी संज्ञा भूत की रख दी गयी । अर्थात् वह जाति जो भूत काल में थी । आजकल आदिवासियों में अनेक जाति तथा भाषा-भाषियों तथा धर्मावलम्बियों का बोध होता है । वास्तव में आदिवासी किस अनुसूचित कोई एक वर्ग नहीं है । इसी प्रकार भूत शब्द वर्ग तथा समष्टि वाचक है ; उससे एक वर्ग का बोध होता है । उसमें कितनी ही जातियाँ तथा उपजातियाँ क्यों न रही हों । नाग जाति के लोप हो जाने पर भी जैसे नागेश्वर, पिशाच जाति के लुप्त होने पर पिशाचमोचन तथा पिशाचेश्वर है। उसी प्रकार भूत जाति के लुप्त हो जाने पर भी भूतेश्वर उस लुप्त जाति का एक प्रतीक है । प्रचलित किवदन्ती के अनुसार व्यक्ति मरने के पश्चात् भूत हो जाता है । शरीर विहीन प्राण अन्तरिक्ष में विहार करता है । शिव संहारक देवता हैं । इस शरीर के संहार के पश्चात् काया हीन प्राण शेष रह जाता है । वह भूत है । उसके देवता जिसके कारण शरीरस्थ प्राण अशरीरस्थ हो जाता है । भूत के नेता भूतेश हो जाते है। भूतेश्वर की पूजा का प्रचलित रूप यही है । वह भूतो के देवता है । शिव के नाना रूपो मे यह भी एक रूप है । केवल हिन्दू धर्म की गाथाओ में प्रेतादि का वर्णन नही परन्तु बौद्ध ग्रन्थों मे भी खूब वर्णन मिलता है । बौद्ध पुनर्जन्म मानते है । कर्म के अनुसार मनुष्य जन्म लेता है । मुगलिम कथानकों मे भी जिनों का वर्णन मिलता है । भूतेश : कश्मीर में प्राचीन काल से शिव भूतेश की पूजा प्रचलित है । उसने कश्मीर के सामाजिक, राजनैतिक एवं ऐतिहासिक जीवन को प्रभावित किया है । हिन्दू शास्त्रों में द्वादश ज्योतिलिगों और उनके साथ उपलिंगों का उल्लेख मिलता है । भूतेश एक ज्योतिरुपलिंग है। द्वादश ज्योतिलिंग (१) सोमेश्वर, (२) मल्लिकार्जुन, (३) महाकालेश्वर (४) ओंकारेश्वर (५) केदारेश्वर (६) भीम शंकर (७) काशी विश्वनाथ (८) त्र्यम्बकेश्वर (९) वैद्यनाथ (१०) नागेश्वर (११) रामेश्वर तथा (१२) घुश्मेश्वर हैं । केदारेश्वर के उपलिंग भूतेश हैं । उनका स्थान यमुना तट है यथा—'केदारेदारवमद्भूतं भूतेशं यमुना- तटे ।' भूतेश ज्योतिलिंग नागेश्वर के भी उपलिंग हैं । यह झिल्लिका सरस्वती तट पर स्थित है । झिल्लिकासारस्वतीतीरे दर्शनात्पापहारकम्—' भारतवर्ष में बावन शक्तिपीठ हैं । उनमें शक्ति पीठ 'त्रिसन्ध्या' कश्मीर मे है । यहाँ पर देवी सती का अंग कंठ गिरा था। देवी का यहाँ नाम महामाया पड़ा था। कहा गया है। भैरवी त्रिसन्ध्येश्वर है। इसी प्रकार देवी सती का केशजाल वृन्दावन में गिरा था । देवी का नाम उमा तथा भैरव का नाम भूतेश है । कंकणी नदी का संकीर्ण गर्त शैल वाह के दक्षिण दिशा में प्रवाहित है । कंकणी के तट पर वह वेगथ ( वसिष्ठाश्रम ) ग्राम से तीन मील ऊर्ध्व दिशा मे भूतेश है । वहाँ पर सत्तरह मन्दिरो के भग्नावशेष मिलेंगे । इनका उल्लेख बिशप कोवी ने सन् १८६६ मे अपनी पुस्तक के पृष्ठ १०१ तथा मेजर कोल ने एनसिएण्ट बिल्डिंग इन कश्मीर पृष्ठ ११ पर किया है ।
प्रथम तरग १५३
उक्त मन्दिर समय समय पर कश्मीर के राजाओं द्वारा निर्माण कराये गये थे। भूतेश्वर जाते समय एक ऊर्ध्व पर्वतीय खण्ड मिलता है। उसे भरतगिरि कहते हैं। यहाँ एक लघु सरोवर है। उसे ब्रह्म सर कहते हैं। नीलमत पुराण के के अनुसार हरमुकुट, नन्दिपर्वत, भरतगिरि, अमरेश्वर, महादेव गिरि, धनद तथा वैश्रवण, इन्द्र कील, गौरीशिखर, उशोरिका, पंचालधारा, बर्हिगिरी, धन्तगिरी, पर्वतों की श्रेणियों में आते हैं।
श्रीनगर सोन मार्ग राजपथ पर वूसन से एक सड़क फूटकर पर्वतीय ग्राम वांगथ की ओर जाती है। यह वांगथ नाला के पार्श्व से चलती है। स्थल सघन देवदार तथा फर पादपावली से हरित है। चारो ओर उत्तुंग पर्वतमालाएँ हैं। नरनाग का उत्तुंग शिखर जैसे इस यात्रा का अन्तिम स्थान है। सात किंवा आठ मील की यात्रा समाप्त कर यात्री नरनाग पहुँचता है। नरनाग मन्दिरों का समूह है। उसे वांगथ मन्दिर समूह की संज्ञा विदेशी पर्यटकों ने दी है। वांगथ ग्राम से तीन मील दूर मन्दिर समूह हैं।
मैंने पहली वार यहाँ की यात्रा की थी। मार्ग कष्टप्रद था। कुछ दूर तक सड़क नाम मात्र के लिये बनी थी। तत्पश्चात् पगडण्डी का आश्रय लेना पड़ा था। दूसरी बार सन् १९६४ की यात्रा में सडक नरनाग तक करीब बन चुकी थी। वहाँ ठहरने के लिये डाक बंगला बन रहा था। पहली यात्रा मैंने सन् १९५६ में की थी। उस समय कश्मीर सरकार से कहा था। इस स्थान तक पहुँचने का मार्ग सुगम बना दिया जाय। उस समय मेरे साथ पचास संसद् सदस्यों का दल कश्मीर गया था। किन्तु भूतेश्वर जाने का कोई साहस नहीं कर सका। मैने यह यात्रा श्री गुलाम बख्शी तत्कालीन कश्मीर के मुख्य मन्त्री के प्रबन्ध की सुविधा के कारण की थी। अन्यथा यात्रा असम्भव थी। अब सड़क २०
बन गयी है। डाक बंगला तैयार हो गया है। छोटी कार अथवा जिप से सुगमता पूर्वक जाया जा सकता है।
यह स्थान मुझे कश्मीर मे बहुत ही आकर्षक, भव्य तथा जीवनमय मिला। स्थान जागृत है। जैसे जैसे व्यक्ति भूतेश्वर के समीप पहुँचता चलता है, उसके मन पर स्थान की भव्यता का गम्भीर प्रभाव पडता जाता है।
मुझे वांगथ से नरनाग तक दूसरी बार की यात्रा में पैदल चलना पड़ा था। पैदल चलने में विचित्र आनन्द का अनुभव होता है। बढ़ते चलिये उतने ही प्राकृतिक दृश्य की सुन्दरता बढ़ती मिलेगी।
नाला किंवा कंकणी नदी के तट से मार्ग चलता है। एक ओर नदी का कलकल निनादिन प्रवाह तथा दूसरी ओर देवदार तथा चीड़ के वृक्षों की सघन छाया, नदी के गर्त के दोनों ओर ऊँचे होते जाते अत्यन्त हरित पादपपूर्ण पर्वतों की श्रेणी, उनपर वृक्षों का वायु प्रवाह में झूमना, हृदय पर अपना विचित्र प्रभाव छोड़ता है। स्थान निर्जन होने पर भी मन उचटता नहीं। नदी का निनाद मन बहलाता रहता है। एकान्त का तीव्र अनुभव नहीं होने देता।
भूतेश्वर की ओर चलते रहने पर सम्मुख हिमाच्छादित हरमुकुट पर्वत जैसे ऊँचा उठता जाता है। पृष्ठ भाग में उपत्यका को घेर कर बन्द कर देता है। पहले हरित तत्पश्चात् हिमाच्छादित पर्वत मन पर सौन्दर्य मिश्रित भय उत्पन्न करता है।
मन्दिर से दो फर्लांग पहले वांगथ की ओर एक नाला पड़ता है। नाला पर लकड़ी का पुल बना है। उस पर खड़े होकर वाम पार्श्व में देखने पर एक विचित्र दृश्य मिलता है। दो हरित शिखरों के मध्य एक हिमाच्छादित पादप हीन शिखर झांकता दिखायी पड़ता है। उसके तीन छोटे छोटे शिखर त्रिमूर्ति तुल्य लगते हैं।
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मन्दिर समूह के समीप पहुँचते ही मार्ग का श्रम स्थान की अभिरामता के कारण तिरोहित हो जाता है। चारों ओर उत्तुंग शिखरमाला खड़ी मिलती है। पर्वतमालायें शिखर से मूल तक अत्यधिक हरित हैं। उनका दृश्य मन को मुग्ध कर देता है। विश्व में इतना सुन्दर पर्वतीय दृश्य दुर्लभ है। प्राचीन काल में वसिष्ठाश्रम (वैगथ) से लेकर मन्दिर समूह तक तपस्वियों के आश्रम थे। तीर्थ यात्रा पथ के दोनों ओर ब्राह्मण रहते थे। परन्तु इस समय यहाँ गूजरों की आबादी है। कृषि में मक्का यहाँ की मुख्य उपज है। गूजर हिन्दू तथा मुसलमान दोनों होते हैं। यहाँ के आबाद गूजर मुसलमान हैं। यह स्थान जंगल है। सम्भव है कालान्तर में पर्यटक-केन्द्र बन जाने पर पुष्ट और विकसित हो जाय। वन में भालू हैं। ये मक्का खा जाते हैं। उनसे रक्षा का विचित्र उपाय ग्रामीणों ने निकाल रखा है। शेर से भालू भय खाता है। शेर की आँखें अन्धकार में चमकती हैं। अतएव ग्रामीण दो स्थानों पर करीब-करीब आग जला देते हैं। दूर से मालूम होता है। शेर खड़ा है। उसकी आँखें चमक रही हैं। भालू भयभीत हो जाता है। समीप नहीं आता। शेर से भी सुरक्षा की तरकीब ग्रामीणों ने ने निकाल ली है। शेर आग से डरता है। ग्रामीण घास की ज्वाला प्रज्वलित करते हैं। शेर पास नहीं आता। भाग जाता है। सड़क निर्माण तथा पर्यटकों के आवागमन के कारण भालू तथा शेर से स्थान निरापद हो गया है। वे दूर जंगलों में चले गये हैं। सन् १८६९ में लेफ्टिनेण्ट कर्नल श्री हेनरी एच. कोल ने (सुपरिटेण्डेण्ट आर्केयालोजिकल विभाग उत्तर पश्चिम मंडल) अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'एन सिण्ट विल्डिङ्ग इन कश्मीर' लण्डन में प्रकाशित करवायी थी। वह उपलब्ध है। उसमें यहाँ के मन्दिर समूहों का चित्र दिया गया है। उस समय मन्दिरों की क्या अवस्था थी उन चित्रों के देखने से पता चलता है। श्री कोल ने यहाँ के मन्दिर समूहों को दो वर्गों में विभक्त कर उनका नामकरण किया है। एक का नाम राजदैन बल तथा दूसरे का नाम वन मन्दिर समूह रखा है। प्रथम मन्दिर समूह की संज्ञा राजदैन बल तथा पीछे वाले मन्दिर समूह को संज्ञा नागबल दिया है। बिशप कोब्री ने नागबल को पूर्वीय तथा राजदैन बल को पश्चिमी मन्दिर समूह कहा है। बिशप कोब्री के समय मन्दिरों पर घास, फूल बहुत जमे थे। (जे० एम० वी० १८६६ पृष्ठ १०१) पूर्वीय मन्दिर समूह अर्थात् नाग बल किंवा भूतेश मन्दिर के प्राकार की उत्तर पूर्व दिशा में एक छोटा सरोवर है। इस सरोवर को नारान नाग कहते हैं। नीलमत पुराण तथा कल्हण के अनुसार यह सरोवर प्रसिद्ध सोदर तीर्थ है। इस तीर्थ से बीस गज पश्चिम बड़े मन्दिर के प्राकार के बाहर उत्तरा- भिमुख एक और मन्दिर था। यह मन्दिर भैरव का मन्दिर था। नागबल अर्थात् पूर्वीय मन्दिर समूह में बड़ा मन्दिर शिव भूतेश का था। राजदैन बल अर्थात् पश्चिमी मन्दिर समूह में बड़ा मन्दिर शिव ज्येष्ठेश का था। इस मन्दिर के पश्चिम दक्षिण कोण बिशप कोब्री को शिवलिंग का अधिष्ठान दिया धरथा मिला था जिसपर शिव लिंग स्थापित किया जाता है। वह शिव अधिष्ठान ज्येष्ठेश का था। मैंने चारों ओर लगभग एक घण्टा तक उसे खोजा। परन्तु वह मुझे मिला नहीं। अतएव नहीं कह सकता कि उसका रूप क्या था। यदि वह मिल जाता तो शिव लिंग किस स्थान पर प्रतिष्ठित किया जाता है उसकी घेरे, गहराई तथा आकार से कल्पना की जा सकती थी कि शिवलिंग का प्रकार तथा आकार क्या था। कर्नल श्री कोल श्रीनगर से दो पड़ाव चलकर यहाँ पहुँचे थे। पहला पड़ाव १० मील तथा दूसरा
प्रथम तरंग १५५
१५ मील पर डाला था। आज से १०० वर्ष हो गये। उस समय वेगथ का मार्ग इतना संकीर्ण था कि यात्रा कठिनता से हो सकती थी। मार्ग में चीड़ तथा फर के इतने वृक्ष थे कि उन्हें काट कर श्री कोल यहाँ तक पहुँच सके थे। ज्येष्ठेश्वर तथा भूतेश्वर के मन्दिरों के मध्य लगभग २०० गज का अन्तर है। ज्येष्ठेश्वर मन्दिर के पृष्ठ भाग में सर्व प्रथम आयताकार एक चबूतरा १०० फीट लम्बा तथा ६७ फीट चौड़ा मिलता है। उसके पश्चात् भूतेश मन्दिर का ध्वंसावशेष पड़ता है। वेगथ की ओर से पहुँचने पर प्रथम ध्वंसावशेष ज्येष्ठेश्वर किंवा राजदेन बल समूह का मन्दिर पड़ता है। इसका मुख्य मन्दिर श्री कोल के समय आज ही जैसा खड़ा था। उसका प्राकार १७६ फीट लम्बा उत्तर-दक्षिण तथा १३० फीट चौड़ा पूरब-पश्चिम है। प्राकार की नींव का आकार आज भी अक्षुण्ण है। यद्यपि पत्थर लोग उठा ले गये हैं। नींव के पत्थर शेष रह गये हैं। उनसे प्राकार के आकार का अनुमान होता है। ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर २४ वर्ग फीट में है। इसका बहिर्वेदान चारों तरफ ३ x १५ फीट ६ इंच है। मन्दिर चौकोर है। मन्दिर के पूरब तथा पश्चिम दोनों ओर आमने सामने दो द्वार हैं। द्वार अलंकृत हैं। उनमें देवी तथा देवताओं के चित्र खोदे गये थे। इस समय उन मूर्तियों की एक प्रकार से छाया मात्र ही रह गयी हैं। मन्दिर के दक्षिण तथा उत्तर की दिवालें बन्द हैं। बन्द दीवारों के बाहरी तरफ बड़े गवाक्ष बने हैं। उनमें पूर्व काल में मूर्तियाँ स्थापित थीं। नागबल अर्थात् भूतेश्वर मन्दिर की अपेक्षा ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर अधिक अच्छी हालत में है। इसकी छत शिखर सुरक्षित है। वह मन्दिर की रचना तथा तत्कालीन स्थापत्य पर प्रकाश डालता है। छत तथा शिखर पत्रकी बनी है। मन्दिर के प्रांगण में पड़े शिलाखण्डों का रूप काल प्रभाव के कारण कुछ विकृत हो गया है। कहना कठिन है। शिला स्तम्भ गोले थे, अठपहले थे अथवा चौपहले थे। स्तम्भों के अधिष्ठान यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं। कर्नल कोल ने इस मन्दिर का प्लान पृष्ठ ७:६८ तथा मन्दिर का चित्र ८:६८ तथा ९:६८ पृष्ठों पर दिया है। उसमें ज्येष्ठेश्वर मन्दिर को लेकर ६ मन्दिर प्रदर्शित किये गये हैं। पुस्तक के चित्र देखने से स्पष्ट प्रतीत होता है कि मन्दिरों पर वृक्षादि जम गये थे। उनकी रक्षा तथा मरम्मत का भी प्रबन्ध नहीं किया गया। मुद्रित चित्र देखने से मन में भय का संचार होता है। मन्दिर वास्तव में भूतों का निवास होगा धारणा अनायास उत्पन्न हो जाती है। प्रांगण में घास, झाड़ियाँ तथा पेड़ लग गये हैं। वह एक उपेक्षित वन का रूप प्रकट करता है। सब कुछ बिखरा, अस्त-व्यस्त, टूटा-फूटा तथा भयंकर रूप से उपेक्षित तथा विघटित है। जिस समय मैं दूसरी बार पहुँचा तो घास-पात वृक्षादि साफ कर दिये गये थे। बड़े मन्दिर का उपयोग गूजर वर्षा तथा तुषारपात से रक्षा निमित्त करते हैं। उनमें अपने पशु बाँधते हैं। मन्दिर की मूर्ति जहाँ थी वहाँ गोबर तथा कीचड़ सड़ रहा था। मन्दिर में किसी प्रकार की मूर्ति तथा अधिष्ठान नहीं है। जिस समय यह मन्दिर नष्ट किया गया होगा, उस समय लिंग किंवा मूर्ति कंकणी नदी में या तो टुकड़े-टुकड़े कर फेंक दी गयी होगी। कर्नल कोल ने ६ मन्दिरों का उल्लेख किया है। परन्तु मैंने यहाँ पर छोटे-बड़े मिलाकर ११ मन्दिरों का आकार देखा। श्री कोल का प्लान अधूरा है। तत्कालीन समय में पेड़ों की झुरमुट और सघन झाड़ियों के कारण, श्री कोल को सबका पता नहीं लग सका था। बड़े मन्दिरों को ही वे लक्ष्य कर सके थे। ज्येष्ठेश्वर मन्दिर की उत्तर दिशा में ६ मन्दिर हैं। दक्षिण दिशा में एक भी मन्दिर नहीं है। उत्तर
१५६ राजतरंगिणी तरफ मन्दिर की नीव से प्रांगण ९२ फीट है। किन्तु दक्षिण तरफ केवल ३५ फीट है। कोई भी मन्दिर इस प्रकार अपने मूल रूप में जब कि भारतीय स्थापत्य, वास्तु तथा मूर्तिकला इतनी विकसित हो चुकी थी, त्रुटि नही उपस्थित कर सकता। कश्मीर के प्रायः सब मन्दिर प्रांगण की मध्य रेखा पर ही मिलेंगे। भूतेश्वर का मन्दिर भी ऐसा ही है। परन्तु ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर उत्तर-दक्षिण के प्रांगण खण्ड के मध्य मे नही है। अतएव निश्चय ही दक्षिण मन्दिर का भाग कंकणी नदी के गर्त मे चला गया है। मेरा निश्चित मत है। दक्षिण का भाग कंकणी नदी मे गिर कर नष्ट हो गया है। ज्येष्ठेश्वर के उत्तर दिशावर्ती लघु मन्दिर किसी सिधायी मे नही बने हैं। अतएव मुख्य मन्दिर के निर्माण के पश्चात् समय-समय पर काश्मीर के राजाओं ने यहाँ मन्दिर निर्माण कराया था। यह प्रथा प्रायः समस्त भारत में आज भी प्रचलित है। लोग विशाल मन्दिरों के प्रांगण में अपने नामो से लघु मन्दिरो का निर्माण कर उसमें मूर्तियो किंवा लिंगो की प्रतिष्ठा करते हैं। जनरल श्री कनिंघम के मतानुसार इस मन्दिर का निर्माण ईसापूर्व २५० वर्ष मे हुआ होगा। कर्नल कोल इसका निर्माण काल सन् ईसवी का हो आरम्भिक काल मानते हैं। ज्येष्ठेश्वर ने मन्दिर के पृष्ठ भाग में तथा विश्राम अथवा पाठ, किंवा कथा स्थान या वर्तमान लम्बे चौड़े चबूतरे के ध्वंसावशेष के मध्य मुझे ने दो ढूंढे तुल्य स्थान मिले। उनमे लम्बे-चौड़े विशाल भाग शिलाखण्ड लगे हैं। ये भी मन्दिर ही रहे होंगे। आट का वर्णन किसी अन्य पर्यटक तथा यात्री ने नही के आ या है। निरापद वहाँ ध्वंसावशेष होने का सरल अर्थ है। मन्दिर गये हैं। वे टूटे। उनके मलवा का ढूढ़ा बना जो अब सन् १८ पात से ढका पड़ा है। यह धारणा मेरी कोल ने (सुपुर् दृढ़ हो गयी कि वहाँ पर अलंकृत उत्तर पश्चिम १. णी मन्दिरो में लगाये जाते थे। बिखरे पड़े थे। वे इस मन्दिर के ही रहे होंगे अन्यथा यहाँ पर उनके अस्तित्व का कोई अर्थ मालूम नहीं होता। इस मन्दिर तथा भूतेश्वर के मध्य उक्त चबूतरा है। यह पूजा पाठ करने तथा विश्राम निमित्त बरामदा किंवा अलिन्द था। मण्डप शिला स्तम्भों की अवलियो पर निर्मित था। दोनों मन्दिरों के मध्य में होने के कारण दोनों मन्दिरो के उपासक, पुजारी तथा भक्त उससे लाभ उठा सकते थे। कर्नल कोल को यहाँ बहुत नकाशीदार किंवा अलंकृत स्तम्भ मिले थे। स्तम्भों के अधिष्ठाने भी अपने स्थानों पर मिले थे। मुझे इस समय दो चार स्तम्भ तथा दो ही चार अधिष्ठान मिल सके। उनका व्यास दो फीट था। शेष गायब थे। इससे २० फीट पूर्व भूतेश्वर के मन्दिर का प्राकार है। नागबल किंवा पूर्वीय या द्वितीय मन्दिर समूह का नाम भूतेश किंवा भूतेश्वर मन्दिर समूह दिया गया है। इसके प्रांगण का पता दिवाल पर स्तम्भावली के अधिष्ठान के चिन्हों द्वारा लगाया जा सकता है। यह १५५ फीट वर्गाकार है। इसका कोई भाग कंकणी नदी की धारा में ध्वस्त होकर नही गिरा है। चहार दिवारो का आकार तथा उनकी नीव मे लगे पत्थर वर्तमान हैं। मेजर कोल ने मन्दिर के प्रांगण में भूतेश्वर के विशाल मन्दिर को लेकर केवल सात मन्दिरों की गणना की है। उन्होंने अपने प्लान में पृष्ठ ६:६६ पर इसे प्रदर्शित किया है। उसमें मन्दिर की उत्तर दिशा में मन्दिर के मुख्य द्वार के समीप रखी टंकी किंवा एक ही पत्थर में खोदा हौज है। यह वास्तव में एक ही पत्थर की आश्चर्यजनक रचना है। यह २२ फीट लम्बा तथा ७ फीट चौड़ा है। लगभग इतना ही मोटा है। मानव बुद्धि इस विशालकाय शिला मे खुदी टंकी को देखकर चकित हो जाती है। इस दुर्गम स्थान में इतना विशाल शिलाखण्ड किस प्रकार उठा कर लाया गया होगा सरल मानव बुद्धि में कौतूहल उत्पन्न करता है।
प्रथम तरंग १५७ यह टंकी अत्यन्त विलक्षण तथा कलापूर्ण शैली से बनायी गयी है। आज तक टूटी नहीं है। अनेक भूचाल आये होंगे। उसे तोड़ने का प्रयास किया गया होगा। परन्तु वह यथावत् स्थिति में स्थित है। यहाँ के ग्रामीण बन्धु कहते हैं। इसका जल सर्वदा एक जैसा रहता है। तोरण द्वार चहार दिवारी में पश्चिमाभिमुख बना है। मन्दिर में केवल एक द्वार है। यह भी पश्चिमाभिमुख है। अतएव वह स्वयं इस बात का प्रमाण है। यह मन्दिर शिव का था। शास्त्रानुसार शिव, शंकर, रुद्र के मन्दिरों का द्वार पश्चिम तथा दक्षिण होता है। कर्नल कोल ने अपने प्लान पृष्ठ ७:८८ में भूतेश्वर मन्दिर सहित कुल ७ मन्दिरों को दिखाया है। किन्तु मुझे प्रांगण में भूतेश मन्दिर सहित कुल १२ मन्दिरों के भग्नावशेष मिले। सम्भव है। कोल की यात्रा के समय शेष मन्दिर मलबों तथा घास- फूस के अन्दर छिपे रहे हों। शताब्दियों से पड़ती धूल, वृक्ष, तुषारपात आदि के जम जाने के कारण श्री कोल को पता न चला हो। भूतेश्वर का मन्दिर प्रांगण के दक्षिण उत्तर की लम्बाई के मध्य में है। मन्दिर की उत्तर दिशा के पार्श्व में ५ तथा दक्षिण दिशा के पार्श्व में ६ मन्दिर हैं। दक्षिण पार्श्व के मन्दिरों में पूर्व में तीसरे मन्दिर के सम्मुख एक और मन्दिर बना है। यह निर्माण बहुत समय पश्चात् का मालूम होता है। वह उत्तर तथा दक्षिण मन्दिरों की सीध में नहीं आता। मैं समझता हूँ कि एकादश रुद्र की कल्पना पर ग्यारह मन्दिरों की रचना की गयी थी। अन्यथा दोनो पार्श्वों में छह-छह मन्दिर होने चाहिए थे। भूतेश रुद्रेश हैं। कल्पना की गयी है। यह अनुमान लगाया गया है। मुख्य मन्दिर भूतेश की रचना के पश्चात् कालान्तर में राजा मन्दिर निर्माण करते गये। यह तर्क सम्मत नहीं है। सामने वाला मन्दिर बनाने वाला पाँचवें मन्दिर के पश्चात् छठा मन्दिर बनवाकर उसको पंक्ति पूरा करता। वह मन्दिरों को पंक्ति के बाहर जाकर मन्दिर का निर्माण न कराता। अतएव यह मन्दिर एकादश रुद्र कल्पना पर बना है। भूतेश का मन्दिर ज्येष्ठेश्वर मन्दिर की अपेक्षा सादा है। अतएव ज्येष्ठेश्वर मन्दिर के पूर्व की रचना मालूम पड़ती है। नरनाग किंवा नारायण नाग का कुण्ड भूतेश्वर मन्दिर की उत्तर दिशा से पहाड़ों द्वारा जल स्रवित होकर आता है। उस कुण्ड किंवा सर से निकलता स्पष्ट दिखायी पड़ता है। वह बहता कंकणी नदी में गिर जाता है। जल अत्यन्त निर्मल है। हल्का है। कर्नल कोल ने इसीलिए इसे नाग कहा है। नाग का अर्थ जल स्रोत होता है। कुण्ड के दो ओर पूर्वकाल की बनी सीढियाँ अपनी पूर्वावस्था में वर्तमान हैं। इस कुण्ड की सफाई नहीं हुई है। चारो ओर मुस्लिम गूजरों की आबादी है। अतएव कुण्ड की सफाई नहीं है। उसमे पत्ती, टूटी लकड़ी तथा पहाड़ों पर से गिरे कंकड पत्थर पड़े थे। पत्तियों के सड़ने के कारण कुण्ड का स्तर साफ नहीं था। जल निरन्तर कुण्ड में आता और निकलता रहता है अतएव वह साफ लगता है। इस कुण्ड का निर्मल जल तथा यहाँ की मनो- मुग्धकारी प्राकृतिक दृश्यावली देखकर जलपान के लोभ का संवरण नहीं कर सका। मैने जल पीया। बहु मधुर तथा शीतल था। उसमे मुझे जैसे जीवन मिला। इस कुण्ड किंवा सर को सोदर तीर्थ कहते थे। इसके जल का बड़ा ही विशद वर्णन किया गया है। इसके नाम पर एक दूसरा सोदर तीर्थ श्रीनगर के समीप निर्माण कराया गया था। उसका यथा स्थान वर्णन किया है। इस सरोवर के समीप एक विशाल शिलाखण्ड पड़ा मिला। यह १५ फीट लम्बा ८ फीट चौड़ा तथा ६ फीट मोटा था। यह शिलाखण्ड मूर्ति का अधि- ष्ठान है। कंकणी नदी में आध मील दूर धारा के मध्य एक शिलाखण्ड है। उस पर एक कोठरी बनी है।
१५८ राजतरंगिणी सोऽथ भूभृज्जलोकोऽभूद् भूलोकसुरनायकः । यो यशस्सुधया शुद्धं व्यधाद्ब्रह्माण्डमण्डलम् ॥१०८॥ जलौक१ १०८. अस्तु 'जलौक राजा हुआ। वह भूलोक पर इन्द्र के तुल्य था। उसने अपने धवल यश द्वारा ब्रह्माण्ड मण्डल को शुद्ध कर दिया था। चार व्यक्ति उसमें निवास कर सकते हैं। इसके मध्य में एक शिवलिंग का स्थान है। एक दिवाल में मूर्ति रखने का ताखा बना है। मैं जब यहाँ आया तो किसी ने इस मन्दिर का पता मुझे नहीं बताया। शिवयोगी के निवास योग्य वह आदर्श स्थान माना जायगा। योगियों के योग तथा ध्यानियों के ध्यान करने के लिये सुरम्य, एकान्त, जलाशय एवं पादप पूर्ण वनथीययुक्त स्थान आदर्श कहा जायगा। दुर्बल हृदय व्यक्ति दिन में चाहे जितना यहाँ के प्राकृतिक दृश्यों का आनन्द उठा ले, परन्तु सन्ध्या होते ही स्थान की सुन्दरता अन्धकार की गम्भीरता के साथ भयंकर रूप धारण कर लेती है। आधुनिक .... योजनाओं के योग से वह .... कता .... अथवा .... रूप .... होती .... लगता .... हैं। यहाँ पर अ.. .... ललेख नहीं मिला है। यदि क.. .... स्थान के काल निर्णय में सहायता मि.. स्थापत्य ी के आधार पर काल निर्णय का अनु लगाया सकता है। शिलालेख मिलने पर कश्मीर के आर तूव वास्तु कला शैली तथा उसके विकास के के भा अच्छा प्रकाश पड़ सकता है। पुरातत्त्व- निरापद स्थान पर आकर अध्ययन तथा गये हैं। चाहिए। अन्यथा यहाँ इस समय सन् १८ सामग्रियां बिखरी पड़ी हैं, नष्ट कोल ने (सुप...। उत्तर पश्चिम ... कल्हण ने पुनः भूतेश का उल्लेख राजा जलौक के सन्दर्भ में (त० १:१५८) किया है। उसमें नन्दि क्षेत्र में एक सुदृढ़ पाषाण मन्दिर निर्माण कराने का उल्लेख मिलता है। यह मन्दिर जलौक द्वारा उन्नत भूतेश मन्दिर है। नरेन्द्रदित्य के सन्दर्भ में कल्हण ने (त० १:३०७) में इसका उल्लेख किया है। ललितादित्य के सन्दर्भ में इसका उल्लेख कल्हण ने (त० ४.१८९ में) किया है। अवन्तिवर्मा ने (त० ५:४६) यहाँ दानादि किया था। अशोक के समय में भूतेश नाम से स्थान प्रसिद्ध था। छोटा मन्दिर या केवल शिवलिंग रहा होगा। जलौक ने उस स्थान पर भव्य मन्दिर निर्माण कराया जिसके भग्नावशेष का अस्तित्व आज वर्तमान है जो देखा जा सकता है। इसका उल्लेख पुनः तरंग ५.५५-५९ में किया गया है। राजा उच्छल के सन्दर्भ में (त० ८:७७-११०) इसका उल्लेख किया गया है। कल्हण ने इस मन्दिर का अन्तिम बार उल्लेख (त० २७:५६, ३३-५६) में किया है। भूतेश की कृपा एवं उनके प्रसाद से अशोक का पुत्र जलौक हुआ था। अतएव यह उचित प्रतीत होता है। जलौक ने भूतेश मन्दिर का निर्माण कराया। जोन, प्रज्ञाभट्ट एवं थीवर की राजतरं- गिणियों में भूतेश्वर का विस्तृत वर्णन नहीं मिलता। जिससे इस विषय पर और प्रकाश पड़ सकता। अबुल फज़ल आइने अकबरी में इस मन्दिर का उल्लेख नहीं करता। हैदर मलिक भूतेश्वर का भूनिसर किया बुथगर नाम से उल्लेख करता है।
प्रथम तरंग १५९ हरिमुकुट यात्रा से लौटते समय भूतेश मन्दिर का स्थान मार्ग पर पड़ता है। परन्तु इस पर विशेष ध्यान कभी नहीं दिया गया था। मालूम होता है मन्दिर के नष्ट भ्रष्ट हो जाने के कारण इसका महत्त्व लोग भूल गये थे। पाठभेद : श्लोक संख्या १०८ में 'साध्य' का पाठभेद 'मोधो' तथा 'ज्वलोको' का 'उजलोको' तथा 'गुधया' का 'श्रद्धया' मिलता है। १०८ (१) जलोक : आइने अकबरी में नाम ज्यूलोक दिया है। अबुल फजल के अनुसार—'राजा ने समुद्र तक विजय प्राप्त किया था। विजय यात्रा से लौटते समय वह कन्नौज गया था। उस समय कन्नौज (कान्यकुब्ज) हिन्दुस्तान की राजधानी थी। जलोक कन्नौज से अनेक गुणी तथा विद्वानों को कश्मीर लाया। उनमें सात को चुनकर विभिन्न विभागों का मुख्याधिकारी नियुक्त किया। उनमें एक ज्योतिष विभाग था। 'उसके आदेश पर सर्पों का एक बहुत बड़ा समूह चलता था। उन्हीं पर आरूढ होकर राजा लम्बी जल यात्रा करता था। राजा किसी समय युवा और किसी समय वृद्ध बन जाता था। उसके सम्बन्ध में अनेक चमत्कारिक बातें कही जाती है। इस राजा के समय बुद्ध धर्म मानने वालों के साथ सहिष्णुता का व्यवहार किया जाता था।' अबुल फजल ने राजतरंगिणी के फारसी अनुवाद तथा प्रचलित जनश्रुति पर राजा जलोक का उल्लेख किया है। जलोक के समय कन्नौज भारतवर्ष की राजधानी नहीं था। पाटलीपुत्र राजधानी था। यहाँ सर्पों का तात्पर्य नागो से अबुल फजल का मालूम होता है। इतिहासकार आज़म ने लिखा है :—कश्मीर पर एक नया धर्म लादा गया। उश्ट्रि टिम्ब से अशोक के पुत्र जलोक ने म्लेच्छों को निकाल बाहर किया। राजा देश-विजय हेतु निकला। उसने उत्तरी ईरान जीत लिया। उत्तरी ईरान जीतने का कोई साधिकार प्रमाण नहीं मिलता। विदेश यात्रा का अर्थ आज़म ने उत्तरी ईरान लगाया है। आज़म ने यह तथ्य कहाँ से पाया कोई प्रमाण नहीं देता। बैदुद्दीन इतिहासकार लिखता है :—'ईरान का राजा इस समय 'दोराव' था। ईरान के विजय के पश्चात् उसने कन्नौज जीता था।' आज़म तथा बैदुद्दीन की बातें यदि मान ली जाँय तो नवीन धर्म पारसियों की अग्नि पूजा हो सकती है। कश्मीर में बुद्ध तथा सनातन धर्म दोनों उस समय प्रचलित थे। दोनों में विरोध नहीं था। ईरान से सम्पर्क में आने पर इसी की सम्भावना हो सकती है। अग्नि पूजक पंजाब के उत्तर तथा पश्चिमी भाग में एक समय आबाद थे। किन्तु कश्मीर में अग्नि पूजा पारसियों की शैली की कभी प्रचलित नहीं थी। हवन, यज्ञ, पञ्चाग्नि, अग्निहोत्र आदि सनातन धर्म के अंग थे। आर्य धर्म में परम्परा से यज्ञ होता आया है। वह यज्ञ वेदी तक सीमित था। महात्मा जरदस्तू द्वारा प्रसारित तथा प्रचलित अग्नि पूजा का चिह्न कश्मीर में अभी तक मिल नहीं सका है। किसी अग्निकुण्ड, अग्निमन्दिर किंवा अग्नि वेदी का उल्लेख नीलमत पुराण एवं राजतरंगिणी में नहीं मिलता। जलोक ने ईरान विजय के पश्चात् एक नवीन धर्म कश्मीर पर लादा वह भ्रामक एवं तथ्यहीन है। हसन लिखता है :—'जलोक राजा अशोक का दूसरा बेटा था। कलिसंवत् १७२६ मुखालिफों का किला फतह करके सखावत और इन्साफ परवरी में
१६० राजतरंगिणी
नेकनामी हासिल की। मुल्क की आबादी में हद दरजा कोशा रहा। लार में मौजा बारहमूला उसी की तासीरात में से है। कल्हण पण्डित ने उसे फरिश्ता सीरत जानकर अच्छी अच्छी खूबियों से मुत्तसफ इंसान साबित किया है। पण्डित उद्भट्ट जो अपने वखत का एकता था उसी के तरतीययाफ्तो में से था। उसके कहने सुनने से राजा जलौक ने फोरन् बुद्धमजहब छोड़ दिया। और अपने बाप के बर खिलाफ शेव मजहब अख्तियार कर लिया। विजयेश्वरी और नन्दह किशोर मन्दिरों की पूजा पाठ अपने ऊपर लाजिम कर ली। सख्त रियाजतो और वहानी सफाई और करावतो के पेश नजर अपने जमाना का एकता था।
कफ—'कहते हैं कि हर दिन वाडू वेजवारह और बारहमूला के मन्दिरो की पूजा-पाठ के लिए घोड़ो पर सवार होकर जाया करता था। एक सांप तावा किया हुआ था। जिस पर हर दिन सवार होकर जहाँ चाहता था पहुँचता था। यह साँप उसे बाकी सांपो से भी बचाता था। शिवजी के तमाम मन्दिरो को निहायत उम्दगी से सजाया। इसके जमाने मे बुद्धमजहब की कोई रौनक न रही।
'मशहूर है कि एक औरत ने उससे सवाल किया कि मुझे कुछ बतौर खैरात के दे। राजा ने कहा कि जो मांगेगी दूँगा। इसके बाद औरत मजकूर देवी की शक्ल में मुतशक्ल हो गयी। और राजा से इन्सान का गोश्त मांगा। राजा किसी इन्शान के कतल पर राजी न हुआ। और खुद उसके हवाला कर दिय'। देखकर उस औरत ने इन्तहाई खुशी के साथ राजा के हक में तौफीक इबादन की दुआ माँगो—फकत।
'बाद अजई राजा ने मुल्को के फतह करने का पुख्त. इरादा कर लिया। सर जमीन हिन्दुस्तान मुल्क में कन्नोज और बिहार तक के बहुत से शहर अपने कब्जा अख्तियार मे कर लिये। तिमिर नाशक के कोल के मुताबिक कन्दहार और वाख्तर तक के बहुत से शहरो पर अपना कब्जा और इक्तदार जमा लिया। गाम गाम के मुल्को और इलाको की फतह के बाद जब अपने मुल्क को लोटा तो बहुत से दस्तकार और अहल पेशा आदमी उमरे साथ थे। अपने मुल्क की दौलतमन्दी और शान व शोकत इम दरजा तक पहुँचा दी कि दूर दराज के इलाको के रहने वाले लोगो के दिल उसे सुनकर बाग बाग हो जाते थे। उसके वखत तक कश्मीर में मुल्की ओहदेदारों का इन्तजाम न था। राजा ने मुल्की मुआमलात के इन्तजाम को चलाने के लिए अजखुद आफ़िसर मुकर्रर किये। भोर उन्हें अपने फराइज का जवाब देह करार दिया। जो ओहदेह जात इस राजा ने पैदा किये उनकी तफसोल हस्व जैल है।
(१) उहदा दिवानी—इसके जिम्मा मुल्को लेन देन का इन्तजाम था। (२) उहदा खानसामानी—इसके जिम्मा खजानो की हिफाजत और आमदनियों का हिसाव व किताब था। (३) दारोगा फोरखाना—इसका काम फौज के हथियार, लिवाम और सामान वगैरह को हिफाजत था। (४) बख्शी—फौज की इन्तजाम के लिये। (५) वजारत—बादशाह की राय और मशविरा के लिए। (६) दारोगा मदर—खैरात और सदकात की तक्सीम के लिए। (७) नकीब—सिपाहियो और किसानो की खबरगोरो के लिये।
अलगरज हकूमत के इन्तजाम को पुस्तगो और अद्दल व इन्साफ, सखावत और रास्त बाजी में लाशानी था। कहते हैं कि गोटी नीद नाम की एक दवाई पाई थी। जिससे सोना बनाया करता था। इल्म सीमया बखूबी जानता था। आखिर कार कपाल मोचन के मुकाम जो कसवा सूपियान में सोनगुल नहर का मुन्बथ है राहे बहक हो गया। उसको वीवी ईशान देवी इन्तहाई दरजा की रियाजत कीश भोर बाहिम्मत औरत थी। उसके मादर चकर और हस्त
प्रथम तरंग १६१ यस्य दिव्यप्रभावस्य कथाः श्रुतिपथं गताः । आश्चर्याच्चपलतां यान्ति नियतं द्युपदामपि ॥ १०९ ॥ १०९. राजा के दिव्य प्रभाव की कथा जब देवताओं के कानों तक पहुँची तो वे आश्चर्य चकित स्तम्भित हो गये । कोटिवेधिनि सिद्धे हि स रसे हाटकार्पणैः । असीसुषिरतां हर्तुं हेमाण्वस्य ध्रुवं क्षमः ॥ ११० ॥ ११०. कोटिवेधिनो रस की सिद्धि द्वारा करोड़ों वस्तुओं को सुवर्ण में परिणत कर शून्य गगन मण्डल को सुवर्ण दान द्वारा भर देने में राजा सक्षम था । हाल बनाकर गरीबों और मसकीनों को बख्श दिये । शामदेव के शागिर्द से नन्दी पुराण पढ़कर नन्दीश्वर का मजहब अपने ऊपर अख्तयार कर लिया । बुद्ध मजहब फजहवन् तर्क कर दिया । राजा जलोक की कुल हुकूमत साठ साल थी ।' (पृष्ठ ३९४०) हसन ने अपने पूर्व के मुस्लिम इतिहासकार तथा कल्हण सब के द्वारा वर्णित घटनाओं का समन्वय कर लिया है । सब की बात मान ली है । उसने 'इतिहास तिमिर नाशक' का उल्लेख किया है। काशी के राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिन्द' ने भारत का एक अत्यन्त संक्षिप्त इतिहास लिखा था । मैंने उसे अपनी बाल्यावस्था में पढ़ा था। वह हिन्दी तथा शायद उर्दू दोनों भाषाओं में छपा था। हसन ने यही इतिहास पढ़ा था। इतिहास तिमिर नाशक साधारण लोगों के पढ़ने के लिये उन्नीसवीं शताब्दी में लिखा गया था। मेरे पास इसकी मूल प्रति थी । वह 'कलकतिया नागरी' मोटे टाइप में धार्ट कागज पर छपा था । उन दिनों उसका मूल्य था । क्योंकि कोई और इतिहास भाषा में उपलब्ध नहीं था । राजा शिवप्रसाद नागरी और हिन्दी भाषा के महान् पक्षपातियों एवं उन आन्दोलकों में थे जिन्होंने हिन्दी को उर्दू से भारत में बचाया था। उन दिनों हिन्दी के स्थान पर उर्दू चलाने का प्रचार तेजी पर था। काशी की नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना तथा तत्कालीन हिन्दी आन्दोलन की यही पीठिका थी । हसन का ऐतिहासिक ज्ञान कितना सीमित था यह इसी एक बात से प्रमाणित होता है कि उसने अपने मत की पुष्टि इतिहास तिमिर नाशक का उद्धरण देकर करना चाहा है; जिसका ऐतिहासिक महत्त्व साधारण है। जलोक सम्बन्धी हसन के मत को मैं उसी प्रकार मान्यता देने में अपने को असमर्थ पा रहा हूँ जैसे अबुल फजल, आजम तथा हैदुद्दीन को । जलोक का वर्णन कल्हण ने कवि श्री छविलाकर के आधार पर किया है। श्री छविलाकर ने जैसा वर्णन किया होगा उसे ही कल्हण ने अपनी पुस्तक राजतरंगिणी में स्थान दिया है। इस सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक वर्णन परिशिष्ट 'जलोक' में द्रष्टव्य है । पाठभेद : श्लोक संख्या १०९ में 'आश्चर्याच्च' का 'आश्चर्याश्च' और 'नियतं' का 'निश्चयं' और 'द्युपदां' का 'द्युसदां' पाठभेद मिलता है । श्लोक संख्या ११० में 'वेधिनि' का 'वेदिनि'; 'सुषिरताम्' का 'सुस्वितताम्' और 'हर्तुं' का 'कर्तु' और 'हेमाण्वस्य' का 'हेमांगस्य' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ११० (१) कोटिवेधिनि रस : कल्हण ने धातुओं से सुवर्ण बनाने का उल्लेख राजा ललितादित्य (रा० त० ४ : २४६ तथा ३६३) और सिकन्दर बुतशि- कन के वर्णन प्रसंग में; जोनराज ने अपनी राज- तरंगिणी (श्लोक संख्या ५७८) में किया है। २१
१६२ राजतरंगिणी संस्तम्भ्याम्भःप्रविष्टेन तेन नागसरोऽन्तगम् । तारुण्यं फणिकन्यानां निन्ये संभोगभज्यताम् ॥ १११ ॥ १११ अपना तारुण्य फणि कन्याओं के संभोग में सफल करने के निमित्त राजा नाग- 'सरोवरों में जल स्तम्भित कर प्रवेश करता था । भारत में प्राचीनकाल से यह कथा प्रचलित चली आती है । साधु महात्मा तथा चामत्कारिक पुरुष स्वर्ण बनाने की सिद्धि प्राप्त करते हैं । मुख्यतया पारा सिद्ध कर उसके द्वारा सोना बनाया जाता है । इसी प्रकार यह कथा भी प्रचलित है । पारस पत्थर के स्पर्श कराने से धातुएँ तथा लोहा सोना बन जाता है । इस प्रकार चामत्कारिक बातें माधु महात्मा तथा महान् पुरुषों की महत्ता वृद्धि के निमित्त उनके जीवन से सम्बन्धित कर दी जाती हैं । कोटिवेधिनी रस का कल्हण ने उल्लेख यहाँ किया है । यह रस क्या था ? कैसे बनता था ? इसका प्रयोग किस प्रकार किया जाता था ? इस पर अब तक प्रकाश नही पड़ सका है । यह किसी प्रकार का रस था । जिसके सिद्ध करने से सुवर्ण तैयार हो जाता था । १११ (१) नागसरोऽन्तरम्ः यहाँ यह अर्थ करना समीचीन मालूम होता है। नाग अर्थात् झरनों, प्रपातों एवं सरोवरों का जल स्तम्भित, अर्थात् रोककर राजा नागकन्याओं के साथ भोग कर अपना यौवन सुफल करता था । जलप्रपात, स्रोत तथा सरोवर कश्मीर में नागो के स्थान माने गये हैं । वे प्रत्येक सरोवर तथा प्रपातो एवं स्रोतों में निवास करते हैं । यहाँ पर नागकन्याओ का रहना स्वाभाविक है । जलप्रपात, स्रोत तथा सरोवर को स्तम्भित करने का अर्थ जल शान्त करना है । उन्हें अपने काम प्रसग निमित्त हलचलहीन बनाना है । अत्यन्त एकान्त वातावरण उत्पन्न करना है । यहाँ पर कल्हण ने किसी सरोवर, स्रोत एवं प्रपात विशेष का उल्लेख नही किया है । उसका मन्तव्य मालूम होता है। राजा किसी नाग किंवा सर विशेष की नागकन्या के स्नेह सूत्र द्वारा ही सीमित नहीं था । वह इच्छानुसार कश्मीर के अगणित नागों तथा सरों में प्रवेश कर अनेकानेक नागकन्याओं से सम्बन्ध स्थापित करता था । वह किसी एक स्थान से बँधा नही था । कल्हण इस प्रकार राजा जलोक की ऋद्धि का वर्णन गौण रूप से कर देता है । राजा ऋद्धि सम्पन्न था । वह नागो तथा सरों के जलो को बाँध देता था । जल बाँध देने की कथा योगियो के जीवन से सम्बन्धित की जाती हैं । योगी नदी के जल को स्तम्भित किंवा बाँधकर नदी पार पैदल चला जाता है । जल बाँधकर अपना चमत्कार दिखाता है । चामत्कारिक कथानको से साहित्य भग पड़ा है । कल्हण राजा जलोक के कोटिवेधिनी रस तुल्य उसके दूसरे चमत्कार का वर्णन करता है । कल्हण एक तीसरे चमत्कार को और राजा के जीवन से सम्बन्धित करता है । राजा जल मे प्रवेश करता था । जल में डूबने अथवा रहने पर साधारण प्राणी प्राणवायु के अभाव मे मर जाता है । परन्तु राजा जलोक वहाँ नागकन्याओ के साथ विहार करता था । राजा की दिव्य शक्ति का जो उल्लेख कल्हण ने श्लोक संख्या १०९ मे किया है उन्ही का यहाँ विस्तार करता है । राजा में इतना अधिक दैवी गुण किंवा प्रभाव था कि मनुष्य होते हुए भी वह देवताओं तुल्य अद्भुत कार्य करता था । राजा का जल के अन्दर बिना प्राणवायु प्राप्त किये विहार करना स्वतः एक चमत्कार की बात थी । कल्हण ने राजा के दिव्य प्रभाव का यह तीसरा उदाहरण दिया है ।
प्रथम तरंग १६३ तत्कालप्रबलप्रौढबौद्धादिसमूहजित् । अवधूतोऽभवत्सिद्धस्तस्य ज्ञानोपदेशकत् ॥ ११२ ॥ ११२. राजा का ज्ञानोपदेशक एक तेजस्वी दार्शनिक अवधूत था, जिसने कश्मीर मण्डल में सफलता से फूल कर प्रबल हो उठे बौद्ध 'समूह को शास्त्रार्थ में परास्त किया था। ११२ (१) बौद्ध : अशोक के कारण बौद्धधर्म का प्रचार प्रबल हो उठा था। संघ का भी संगठन सुदृढ़ हो गया था। अशोक ने कश्मीर सीमान्त पर (१) मानसेहरा, (२) शहबाज गढ़ी, तथा (३) धौली में लगे शिला अभिलेख में धर्म प्रचार तथा संघ संघटन का निर्देश दिया है। धौली में कश्मीर के सीमान्त स्थान तक्षशिला का भी उल्लेख किया गया है। अशोक ने धर्म प्रचारार्थ पंच वर्षीय योजना बनायी थी। शहबाज गढ़ी तृतीय अभिलेख में उसने स्पष्ट लिखा है—वदष षषभिषितेन... अणपितं । सवत्रमअ विजिते युत रजिको प्रदोशक पंचषु पंचषु ५ वषेपु अनुसंयनं निक्रमंतु एताम्ये वो करण इमिस धंमनुशस्तिये थ अनयेपि क्रमये।' अभिलेख के बारह वर्ष (पश्चात्) मेरे द्वारा ऐसी आज्ञा दी गयी। सर्वत्र मेरे राज्य में, युक्त, रज्जुक, प्रादेशिक पाँच-पाँच (५) वर्ष पर इस कार्य के लिये, इस धर्मानुष्ठान के लिये तथा, अन्य कार्य के लिए दौरे पर जाँय।' मानसेहरा तृतीय अभिलेख में पुनः लिखा गया है ' देवनं प्रिये प्रियदशि रज एथ अह (१) दुवड शवष भिपितेन में इयं अणपयिते (२) सवत्र विजि तसि .......तरनु प्रदेशिके पंचसु ५ वषेषु ' अनुसंयनं निक्रमन्तु एतये अ अध्रये इमये धमनु शस्तिये यथ अग्रये पि क्रमणे (३) सधुमत पितृप्य मित्र संस्तुत............ 'अतिकिनं च श्रमण भ्रममणं सधुदने प्रणन अनरंभे सधु अपव्यत अपभडत मधु (४) परिप वि थ युतनि गणनसि अण पयि शति हेतुने च । वियंज न ते च । देवानां प्रिय, प्रियदर्शी राजा ने ऐसा कहा द्वादश वर्षाभिषिक्त मुझने ऐसा आज्ञा हुआ। राज्य में सर्वत्र मेरे युक्त, रज्जुक, प्रादेशिक (नामक राज्य कर्मचारी) पाँच-पाँच (५) वर्षों में दौरे पर निकलें। इस प्रयोजन के लिए इस धर्मानुशासन के लिए तथा अन्य भी कार्य के लिए। ... परिषद् युक्तों को हेतु (कारण) और व्यञ्जन (अक्षरशः अर्थ) के साथ (इन नियमों की) गणना करने के लिए आज्ञा देंगी। उक्त दोनों स्थानों के पंचम अभिलेखों में धर्म महामात्र की नियुक्ति के साथ अपने पुत्र, प्रपौत्र आदि के लिये अभिषेक के तेरहवें वर्ष में अशोक ने आदेश दिया। '११. देवनं प्रियो प्रियदसि रय एवं अहति कलणं दुकरं यो आदि करो कलणस सो दुकरं करोति सो मय बहुकलं किटुं तं मअ पुत्र च नतरो च तंन ये मे अपचं वक्षन्ति अवकप॑ तथ ये अनु वटिशन्ति ते सुकटं कर्पति यो चु अ तो ... ...कं प हये शदि सो दुक्टं कवति पयं हि सुकरं स अति क्रतं अतर नो भुत पुव धंम महमत्र नम सो तोदश वषभिसितेन १२ मम धम महमत्र किट ते सत्र प्रपंड़ेषु वषट धमं धिध नये व धम वडिय हिद सुखये च धमयुतसं.........।' [ देवानां प्रिय प्रियदर्शी राजा ने ऐसा कहा। जो कल्याण का प्रारम्भ करता है वह दुष्कर कार्य करता है किन्तु मुझसे बहुत कल्याण किया गया। यदि मेरे पुत्र, नाती और उनके परे मेरे अपत्य कल्प के अन्त तक (इसका) अनुसरण करेंगे ये कुछ सुकृत करेंगे। जो यहाँ (इस देश में) इसका एक अंश भी नष्ट करेगा वह दुष्कृत करेगा। पाप सुकर है। बहुत समय बीता। भूतकाल में धर्म महामात्र नाम (का अधिकारी) नही थे। किन्तु राज्याभिषेक के तेरह वर्ष पश्चात् मेरे द्वारा धर्म महामात्र (नियुक्त) किये गये।
१६४ राजतरंगिणी धर्म की स्थापना, धर्मवृद्धि और धर्मयुक्तों के हित सुख के लिये वे पाषण्डों (धार्मिक सम्प्रदायों) मे व्याप्त हैं ।'] मानसेहरा में भी यही अभिलेख है । कश्मीर की सीमा पर प्राप्त दोनों अभिलेखों के पश्चात् 'धौली के प्रथम पृथक् अभिलेख में अपने राजनैतिक आदर्श में धर्म प्रचार का आदर्श भी रखा । उसने महामात्रों के साथ ही साथ कुमार अर्थात् राज्यपालों के लिये त्रिवर्षीय योजना प्रस्तुत की । यहाँ तक्षशिला के नाम का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है जो कश्मीर की सीमा और कभी कश्मीर राज्य के अन्त- र्गत था । २१. 'अकस्मा पलिकिलेसे वनो सियाति (२३) एताये च अठाये हथ्यं मते पंचसु पंचसु वसे । २२ सुनिस्ग मयि खामि ए अक्रकसे अचंडे सखिनालंभे होयति एतं अठं जानितु ... तथा २३ कलंति अथ मम अनुसथीति (२४) उजेनि तेपि खु कुमाले एताए य अठायं निखा मयिस .... २४. हे दिसमेव वग नो च अति कामयिसति तिनि वसानि (२५) हेमेव तखसिलाते पि (२६) अद्वा अ ... २५. ते महामाता निखमिसंति अनुसयानं तदा अहा पयितु अतने कंमं एतं पि जानिसंति २६. तं पि तथा कलंति अथ लाजि ने अनु साथीति (२७) [ बिना किसी कारण के परिक्लेश (शारीरिक कष्ट) का दण्ड न मिले । इस प्रयोजनके लिए मैं महामात्रों को पाँच-पाँच वर्षों के अन्तर से दौरे पर भेजूँगा । जो अकर्मश, अचण्ड, श्लक्ष्णारम्भ (सर- निकलेंगे तब वे अपने कर्तव्यों की अवहेलना न करते हुए मेरे इस आदेश को जानेंगे (२६) और ऐसा कार्य भी करेंगे जैसा राजाका अनुशासन है । ] अशोक ने सामाजिक जीवन में भी आमूल परि- वर्तन करनेका विचार किया जैसे उसने 'विहार यात्राके स्थानपर' 'धर्म यात्रा' का प्रचलन किया । (जौगढ अष्टम अभिलेख) उसने स्वयं स्थान स्थान पर २५६ से अधिक पड़ाव डाला था । (गुर्जरा तथा सहसराम अभिलेख) । राजाश्रय, प्रचारादिके कारण बौद्ध धर्मको विशेष बल मिला । चीनी यात्रियोको अशोक निर्मित कम-से-कम चार स्तूप कश्मीर उपत्यका से मिले थे । पाँच सौ चैत्यों का निर्माण हुआ था । कल्हण इस दशा की ओर संकेत करता है । बौद्ध धर्मानुयायी प्रबल हो गये थे । वे धर्म प्रचारके उत्साहसे भर गये थे । उनका अपने धर्मके समर्थन निमित्त शास्त्रार्थ करना व्यावहारिक बात मालूम होतो है । पुराने सनातन धर्मके पक्षपाती अवधूतने उन्हें शास्त्रार्थमें पराजित किया था । कल्हण वहाँ गौण रूपसे संकेत करता है । जनता तथा जलोक राजा पुराने धर्मकी ओर पुनः मुड़े थे । यद्यपि उसने बौद्ध धर्मका विरोध नही किया था । (२) अवधूत : 'महानिर्वाण तत्र' के अनुसार अवधूतों का वर्गीकरण किया गया है । अवधूत शैव तथा वैष्णव दोनो सम्प्रदाय के होते थे । अवधूतका शाब्दिक अर्थ त्यागी किंवा संन्यासी होता है । उनका वर्गीकरण 'महानिर्वाण तन्त्र' के अनु- सार (१) ब्रह्मावधूत (२) शैवावधूत (३) वीरा- नया (४) कुलावधूत होते हैं ।
प्रथम तरंग १६५ विजयेश्वरनन्दीशक्षेत्रज्येष्ठेशपूजने । तस्य सत्यगिरो राज्ञः प्रतिज्ञा सर्वदाऽभवत् ॥ ११३ ॥ ११३. उस सत्यवादी राजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि नन्दिक्षेत्र स्थित ज्येष्ठेश्वर१ तथा विजयेश्वर की सदा पूजा किया करेगा।
गुह्यांग ढकने मात्र के लिये कौपीन होता है। शरीर भस्म किंवा रक्त चन्दन से पुता रहता है। हाथो में काष्ठ दण्ड, परशु एवं डमरू और मृगचर्म रहता है। कुलावधूत उसे कहते है जो कुलाचार में अभिषिक्त होकर भी गृहस्थाश्रम में रहता है।
वैष्णव सम्प्रदाय में रामानन्द की शिष्य परम्परा में अवधूत होते हैं। वैष्णव अवधूत के सर के केश लम्बे होते हैं। कण्ठ में स्फटिक की माला रहती है। शरीर पर कंथा रहता है। हाथ में दरियाई नारि- यल का खप्पर होता है। इस सम्प्रदाय के बंगाल में पृथक् पृथक् अखाड़े होते हैं। सभी जाति के लोग इसमें सम्मिलित हो सकते हैं। ये गृहस्थों के द्वार पर वीर अवधूत नामका स्मरण कर एकतारा किंवा अन्य कोई वाद्य यंत्र बजाकर गाते हैं। इनके निवास की शैली अव्यवस्थित रहती है। इन्हें बंगाल में कुछ लोग बाउल गायक कहते हैं। परन्तु वह अवधूतो का एक भेद मात्र है।
नाथ सम्प्रदाय में अवधूतों का स्थान बहुत ऊंचा माना गया है। वे प्रकृति विकारों से दूर रहते हैं। कैवल्य की प्राप्ति निमित्त आत्मचिन्तन तथा अभ्यास में निरन्तर रत रहते हैं। 'सगुण एवं निर्गुण' ब्रह्म दोनों से पर की उनकी स्थिति होती है।
गुरु दत्तात्रेयको अवधूत कहा जाता है। दत्त सम्प्रदाय में अवधूतको सर्वश्रेष्ठ माना गया है। 'अवधूत गीता' में अवधूतों का पूर्ण विवेचन विस्तार के साथ प्राप्त होता है।
स्त्रियां भी अवधूत तुल्य अवधूती कही जाती हैं। वे विशेषतया पश्चिमोत्तर भारतीय क्षेत्र में मिलती हैं। वे संन्यासी पुरुषो तुल्य वेश धारण करती हैं। भस्म लगाती है। कण्ठ तथा बाहु में रुद्राक्ष की माला पहनती है। कतिपय अवधूतनियां अपने जूड़ा में भी रुद्राक्ष माला लपेट लेती है।
अवधूती मार्ग सुषुम्ना नाड़ी की एक संज्ञा है। उस प्राण वायु की इड़ा पिंगला नाडी के स्थान पर सुषुम्ना नाडी में धारण करने को अवधूती किंवा अवधूतिका मार्ग कहा जाता है।
अवधूतेश्वर शंकर का एक अवतार माना गया है। कथा है। एक समय इन्द्र तथा बृहस्पति भगवान् शंकर के दर्शनार्थ कैलास जा रहे थे। उनकी परीक्षा लेने का शंकर ने विचार किया। मार्ग में दिगम्बर और भयंकर रूप बनाकर बैठ गये। वह न तो मार्ग से हटते थे और न कुछ बोलते थे।
इन्द्र ने चिढ़कर वज्र निकाला। शंकर ने वज्र का स्तम्भन कर दिया। उनका तृतीय नेत्र खुल गया। उससे ज्वाला निकलने लगी। बृहस्पतिने शंकरका उग्र रूप देखकर, स्तुति की। वह अग्नि ज्वाला लवणोदधि में डाली गयी। उससे जालंधर उत्पन्न हुआ। उसका वध शंकर ने किया। (शिव० शत : ३०)
११३ (१) ज्येष्ठेश = शंकर की पूजा कश्मीर में अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित थी। उनकी तीन नामों यथा ज्येष्ठेन, ज्येष्ठेश्वर तथा ज्येष्ठ रूप से पूजा होती थी। उनके स्थान भी भिन्न थे।
प्रथम ज्येष्ठेश का स्थान हरमुकुट पर्वत के अधोभाग में नन्दिक्षेत्र किंवा नन्दीश क्षेत्र में था। इसका उल्लेख कल्हण ने राजतरंगिरणी १: ३६ में किया है। द्वितीय स्थान त्रिपुरेश्वर अर्थात वर्तमान त्रिफर के समीप था। इसका उल्लेख राजतरंगिणी में कल्हण ने ५: १२३ में किया है। तृतीय स्थान श्रीनगर के समीप था। इसका उल्लेख राजतरंगिणी १: १२४ में कल्हण ने किया है।
१६६ राजतरंगिणी इस स्थान पर कल्हण ने ज्येष्ठेश का स्थान निश्चित नन्दिक्षेत्र बता दिया है। द्वितीय ज्येष्ठेश को प्रथम ज्येष्ठेश से भिन्न मानने के लिये त्रिपुरेशाद्रिनिष्ट संज्ञा दी है। त्रिपुरेश पर्वत के अधोभाग में उनका निश्चित स्थान बताता है। तृतीय ज्येष्ठेश्वर रुद्र का स्थान डल लेक के समीप था। यहाँ महाराज हरी सिंह ने अपना राजभवन बना लिया है। वह भवन अब होटल रूप से चलता है। श्रीनगर से गुप्तकर होते हुए जो सड़क डल लेक के तट से होती चश्माशाही, शालीमार बाग की तरफ जाती है; वही पर सड़क से ऊपर राजभवन के स्थान पर यह स्थान था। नन्दिक्षेत्र के ज्येष्ठेश वही हैं जिनका वर्णन भूते- श्वर मन्दिर के सन्दर्भ में किया गया है। भूतेश्वर मन्दिर के प्राकार में अनेक मन्दिर निर्माण किये गये थे। यह प्रथा अत्यन्त प्राचीन थी। मेवाड़ में एकलिंग जी के मन्दिर के प्राकार के अन्दर एकलिंग के मुख्य मन्दिर के चारों ओर अनेक मन्दिरों का निर्माण कालान्तर में राजाओं ने भूतेश्वर मन्दिर के समान कराया था। भूतेश्वर मन्दिर के समीप जैसे सोदर तीर्थ का अति लघु सरोवर है उसी प्रकार एकलिंग मन्दिर में भी एक लघु सरोवर है। नीलमत पुराण इसे और स्पष्ट कर देता है : पूर्वोत्पन्नं च यज्ज्येष्ठाख्यं लिंगं मम द्विज । तत्रापि सन्निधानं मे नित्यं विज्ञातुमर्हसि ॥ 1110:१३११ ऋषिकोटिसहस्राणि मम भक्त्या द्विजोत्तम । तत्र संस्नापयन्ति स्म ज्येष्ठेशं तं सदैव तु ॥ १३१२ यथाभ्यहं च ज्येष्ठेशे भूतैः सह तथामया । त्वम स्वमपि मद्भिन्न मद्भक्तो मत्परायणः ॥ 1111:१३१७ भयदाम्ना च दैन्यानां सुराणामभयप्रदः । ज्येष्ठेश्वरसमीपे तु यस्मिण्डोऽपि महायशः ॥ 1119.१३२३ स्नात्वा तु मोदरे पुण्ये दृष्ट्वा भूतेश्वरं हरम् । ज्येष्ठेश्वरं नन्दिरुद्रं च गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥ 1124:१३२८ ज्येष्ठेश के स्थान निर्णय में इस प्रकार कोई विवाद नहीं रह जाता। नीलमत स्थान का निश्चय स्पष्ट करता है। नन्दिक्षेत्र तथा वसिष्ठ आश्रम अर्थात् वांगध के समीप ज्येष्ठेश का स्थान बताकर, वह भूते- श्वर स्थित ज्येष्ठेश को ही कल्हण वर्णित ज्येष्ठेश मानने के लिये बाध्य कर देता है। शिव तथा नन्दी की कथा में एक प्राचीन लिंग की बात आती है। उसे ज्येष्ठेश कहते थे। वह निःसन्देह शिव भूतेश्वर के स्थान में था। प्राचीन नन्दीक्षेत्र माहात्म्य में उल्लेख मिलता है कि ज्येष्ठेश्वर किंवा ज्येष्ठनाथ की पूजा नन्दीश तथा भूतेश्वर के अत्यन्त समीप होती थी। (श्लोक १४६) कल्हण ने राजतरंगिणी के श्लोक १:१५१ में ज्येष्ठ रुद्र का उल्लेख किया है। वहाँ पर ज्येष्ठ रुद्र वास्तव में ज्येष्ठेश है। कल्हण पुनः ४:१९० में उल्लेख करता है कि ज्येष्ठ रुद्र का एक मन्दिर भूते- श्वर में निर्माण कराया गया था। कल्हण ने अन्तिम बार इसका उल्लेख ८:२४३० में किया है। वसिष्ठा- श्रम जो वूथेसर अर्थात् भूतेश्वर के समीप था वह कह कर स्पष्ट कर देता है, कि नन्दिक्षेत्र में जो ज्येष्ठेश हैं, वही यहाँ वर्णित ज्येष्ठेश है। इस श्लोक से एक बात और स्पष्ट हो जाती है। उक्त ज्येष्ठेश का लिंग स्वयंभू था। वह अनघट था। इस प्रकार के अनगढ़ शिलाखण्ड की पूजा आज भी सारिका पर्वत, श्रीनगर तथा सुरेश्वरी स्थान में होती है। ज्येष्ठेश का मन्दिर भूतेश्वर स्थित मन्दिरों के दो समूहों में पश्चिमी मन्दिर समूह में था। स्वयंभू लिंगों की पूजा भारतवर्ष के अनेक तीर्थों में होती है। मैने राजस्थान में अनेक स्थानों पर चाहे
[Header] प्रथम तरंग १६७
[Left Column] वे नगर हों अथवा ग्राम अनगढ शिलाखण्ड की पूजा भैरव, रुद्रादि नामकरण देकर किये जाते देखा हैं। शिव लिंग के प्राप्त करने की एक पुरानी प्रथा है। उन्हें गढ़ना अच्छा नही माना जाता । शिवलिंग प्रायः नर्मदा नदी से प्राप्त किये जाते थे । उन्हें नर्मदेश्वर कहा जाता था । ब्राह्मण किंवा पुरोहित अथवा इस कार्य के लिये नियुक्त व्यक्ति स्नानादि कर शुद्ध होकर नर्मदा की धारा में डुबकी लगाते थे। नदी तल में जो लिंग मिल जाता था उसे लेकर निकलते थे। उसी लिंग की स्थापना गढ़े अर्धों में कर दी जाती थी । नर्मदा तल मे सभी पत्थर के ढोके प्राय शिव लिंग आकार के गोले तथा लम्बे आकार के होते हैं। आज कल इस प्रकार के शिव लिंग मूर्तिकार गढ़ने लगे हैं। पालिश करते हैं। तत्पश्चात् स्थापनार्थ बेचते हैं। यहाँ ज्येष्ठेश शब्द की व्याख्या में विस्तार से जाना अप्रासंगिक होगा । ज्येष्ठेश नाम क्यो दिया गया ? किसी व्यक्ति के नाम पर, ऋषि के नाम पर अथवा किसी पुरानी कथा के आधार पर यह नाम- करण किया गया । इसका सम्बन्ध धार्मिक अनुसंधान से है । ऐतिहासिक दृष्टि से इतना वर्णन अलम् प्रतीत होता हैं । रुद्र वास्तव में वैदिक देवता है। वैदिक साहित्य में नैसर्गिक एवं व्याधि जनित उत्पात निर्माण कारक देवता की संज्ञा रुद्र नाम से दी गयी है । शिव की संज्ञा उसी देवता के शमनकारी रूप को दी गई है। अतएव एक ही देवता के रौद्र एवं शान्त रूप का नाम रुद्र एवं शिव है । पाश्चात्य दैव विज्ञान में सृष्टि संचालक एवं संहारक एक ही देव को मानकर उसकी द्विविध रूप में उपासना की जाती है। भारती दैव विज्ञान संचा- लक एवं संहारक दो शक्तियों किंवा दैव को मानता है । सचालक शक्ति को विष्णु तथा सृष्टि संहारक शक्ति को रुद्र की संज्ञा दी गयी है । ऋग्वेद से गृह्यसूत्रों के काल तक रुद्र देवता विषयक कल्पनाओं की उत्क्रान्ति पर दृष्टिपात किया
[Right Column] जाय तो प्रतीत होता है। ऋग्वेद अथवा वैदिक साहित्य में रुद्र निसर्ग प्रकोप का देव था । वही रुद्र उत्तर कालीन साहित्य में पशु, वन, पर्वत, नदी, श्मशानादि समस्त सृष्टि व्यापक एक महान् शक्ति सम्पन्न देवता के रूप में मान्यता प्राप्त कर लिया है । ऋग्वेद में रुद्र के स्वरूप का वर्णन किया गया है । उनका वर्ण भूरा है। सूर्य तुल्य जाज्वल्यमान एवं सुवर्ण समान प्रदीप्त हैं। (ऋ० १:४३, २:३३ ) पूषन तुल्य जटाधारी है । संहिताओं में वैदिक रुद्र का रूप बदलता दिखाई देता हैं। उन्हें सहस्राक्ष. नील वर्ण ग्रीवा, एवं केश युक्त बताया गया है ( वा० सं०: १६; ७, अथर्ववेद. २:२२ ) उनका उदर किंवा पेट कृष्ण एवं वर्ण रक्त कहा गया है । ( अथर्व वेद १५: १ ) उन्हे चर्मधारी भी कहा गया है। (वा० सं : १६-२-४,५१) काला- न्तर में यह चर्मधारी रूप वाघाम्बर एवं मृग चर्म- धारी रूप में परिणत हो गया । महाभारत एवं पुराणों में रुद्र के स्वरूप की अनेक कल्पनाएँ की गयी हैं। पंचमुख की कल्पना विशेष प्रचलित है । पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं ऊर्ध्व दिशा वाला मुख सौम्य तथा दक्षिण दिशावर्ती मुख रौद्र दिखाया गया है । दक्षिण दिशा काल की दिशा कही गयी है । अतएव रौद्र रूप प्रदर्शित करना इसी काल किंवा संहार का प्रतीक है । (म० अनु० १४०:४६) ग्रीवा नील होने का महाभारत में ही दो वर्णन मिलता हैं । महाभारत अनुशासन पर्व (१४१:८) इन्द्र के प्रहार के कारण ग्रीवा नील होना कहता हैं। महाभारत शान्ति पर्व (३४२:१३) दूसरा कारण देता है । समुद्र मंथन से प्राप्त हलाहल विष पान करने के कारण शिव की ग्रीवा नीली हो गयी थी । नाम नीलकंठ पड़ गया था । उन्हें वही पर श्रीकंठ कहा भी गया है । पुराणो मे रुद्र को चतुर्मुख (विष्णु धर्म: ३:४४- ४८;५५:१ ) अर्धनारीश्वर, नटेश्वर (मत्स्य: २६०) एवं त्रिनेत्र कहा गया है ।
१६८ गजतरंगिणी रुद्र का निवास स्थान वैदिक साहित्य के अनुसार पर्वतों और मुख्यतया मूंजवन् पर्वत है (वा० स०: २५:२-४; ३.६१; ) महाभारत रुद्र का आद्य निवास स्थान मेरु पर्वत मानता है । रुद्र का इसलिए एक नाम मेरुधामा पड़ गया है । (म० अनु० १७:२,१) आश्वमेधिक पर्व महाभारत (८:१) वायु पुराण (४७.१९) एवं मौखिक पर्व (१७.२६) के अनुसार रुद्र का निवासस्थान मुंजवान किंवा मूजवत पर्वत है । यह पर्वत कैलास के उस पार था । महाभारत भीष्म पर्व (७.३१) में इनका निवास स्थान कैलास एवं हिमालय पर्वत बताया गया है । महाभारत अनुशासन पर्व (१६१:१७-१६) के अनुसार रुद्र का निवास स्थान काशी की श्मशान भूमि है । संवर्त को शव रूप शिव का दर्शन काशी में हुआ था । सभी का समन्वय करने पर निष्कर्ष निकलता है कि रुद्र का स्थान हिमालय के एकान्त में, तपस्या योग्य वनश्री के मध्य होना चाहिये । भूतेश्वर का स्थान इस दृष्टि से आदर्श है । यहाँ ज्येष्ठ रुद्र की स्थापना की कल्पना सराहना योग्य है । दक्ष प्रजापति ने रुद्र को नन्दिकेश्वर नामक वृषभ वाहन के लिये दिया था । उनकी ध्वजा पर वृषभ का चिह्न था । अतएव नाम वृषभध्वज पड़ गया । भूतेश्वर स्थान नन्दिक्षेत्र के अन्तर्गत है । इनका आयुध, विद्युत दार है। वेद में इनका शस्त्र धनुष बाण एवं वश कहा गया है । ऋ० २:३३:३; १०,५४२:११; १०:१२६ ६) यजुर्वेद के शतरुद्रीय अध्याय में रुद्र का स्वभाव चित्रण अधिक विस्तार के साथ दिया गया है । (तै० सं० ४:५ १, वा० सं० १६) इन्हें 'रुद्रतनु' अर्थात् रुद्ररूप और 'शिवतनु' अर्थात् शिव स्वरूप कहा गया है । या ते रुद्र शिवा तनू शिवा विश्वस्य भेषजी । शिवा रुद्रस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे ॥ अथर्ववेद में ग्यारह रुद्रों यथा (१) ईशान, (२) भव, (३) शर्व (४) पशुपति (५) उग्र (६) रुद्र एवं (७) महादेव का वर्णन है । पुराणों में अष्ट रुद्रों का उल्लेख है । यथा-(१) रुद्र (२) भव (३) शर्व (शिव) (४) पशुपति (५) भीम (६) ईशान (७) उग्र एवं (८) महादेव । महाभारत में एकादश रुद्रों का उल्लेख है । यथा (१) मृगव्याध (२) सर्व (३) निर्ऋति (४) अजैकपाद (५) अहिर्बुध्न्य, (६) पिनाकिन् (७) दहन (८) ईश्वर (६) कपालिन् (१०) स्थाणु एवं (११) भव (म० आदि ५०:१०३) स्कन्द पुराण में (१) भूतेश, (२) नील रुद्र (३) वृषवाहन (४) त्र्यंबक (५) महाकाल (६) भैरव (७) मृत्युंजय (८ गणेश एवं (९) योगेश रुद्रों का नाम दिया गया है । (स्कन्द पु० १७:१:७७) इस पुराण की मान्यता है । कृतयुग में अष्ट रुद्र थे, कलियुग में ग्यारह रुद्रों का अवतार हुआ था भागवत पुराण (२:१३:८-१०) में (१) मन्यु (२) मनु-(३) महिनस् (सोम) (४) महत् (५) शिव (६) ऋतध्वज (७) उपरेतस् (८) भव (९) काल (१०) वामदेव (११) धृतध्वज का नाम दिया गया है । स्कन्द पुराण में 'भूतेश' को एक रुद्र माना गया है । भूतेश्वर स्थान 'भूतेश' का मन्दिर था । स्थान का नाम भी भूतेश्वर था । अतएव यह निश्चित हो जाता है कि स्थान रुद्र से सम्बन्धित था । ज्येष्ठ रुद्र का नाम उत्तर मध्य तालिकाओं में शिवों में सर्वत्र मिलता । ऋग्वेद एवं ब्राह्मण ग्रन्थों में जो रुद्र था वही उपनिषदों में शिव का रूप ले लिया इस प्रकार रुद्र को परम शुद्ध आध्यात्मिक रूप प्राप्त हो गया । उनकी पूजा मद्य मांस से नहीं बल्कि फलपुष्पादि द्वारा होने लगी । उनका रूप अथर्व वेद वर्णित मातर्व रुद्र उच्च- लोक के अधिपति 'महादेव' तुल्य हो गया । इसीको महाभारत अनुशासन पर्व (१६१:३) बड़ी उत्तमता से प्रकट करता है ।