भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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[Header] प्रथम तरंग १६७

[Left Column] वे नगर हों अथवा ग्राम अनगढ शिलाखण्ड की पूजा भैरव, रुद्रादि नामकरण देकर किये जाते देखा हैं। शिव लिंग के प्राप्त करने की एक पुरानी प्रथा है। उन्हें गढ़ना अच्छा नही माना जाता । शिवलिंग प्रायः नर्मदा नदी से प्राप्त किये जाते थे । उन्हें नर्मदेश्वर कहा जाता था । ब्राह्मण किंवा पुरोहित अथवा इस कार्य के लिये नियुक्त व्यक्ति स्नानादि कर शुद्ध होकर नर्मदा की धारा में डुबकी लगाते थे। नदी तल में जो लिंग मिल जाता था उसे लेकर निकलते थे। उसी लिंग की स्थापना गढ़े अर्धों में कर दी जाती थी । नर्मदा तल मे सभी पत्थर के ढोके प्राय शिव लिंग आकार के गोले तथा लम्बे आकार के होते हैं। आज कल इस प्रकार के शिव लिंग मूर्तिकार गढ़ने लगे हैं। पालिश करते हैं। तत्पश्चात् स्थापनार्थ बेचते हैं। यहाँ ज्येष्ठेश शब्द की व्याख्या में विस्तार से जाना अप्रासंगिक होगा । ज्येष्ठेश नाम क्यो दिया गया ? किसी व्यक्ति के नाम पर, ऋषि के नाम पर अथवा किसी पुरानी कथा के आधार पर यह नाम- करण किया गया । इसका सम्बन्ध धार्मिक अनुसंधान से है । ऐतिहासिक दृष्टि से इतना वर्णन अलम् प्रतीत होता हैं । रुद्र वास्तव में वैदिक देवता है। वैदिक साहित्य में नैसर्गिक एवं व्याधि जनित उत्पात निर्माण कारक देवता की संज्ञा रुद्र नाम से दी गयी है । शिव की संज्ञा उसी देवता के शमनकारी रूप को दी गई है। अतएव एक ही देवता के रौद्र एवं शान्त रूप का नाम रुद्र एवं शिव है । पाश्चात्य दैव विज्ञान में सृष्टि संचालक एवं संहारक एक ही देव को मानकर उसकी द्विविध रूप में उपासना की जाती है। भारती दैव विज्ञान संचा- लक एवं संहारक दो शक्तियों किंवा दैव को मानता है । सचालक शक्ति को विष्णु तथा सृष्टि संहारक शक्ति को रुद्र की संज्ञा दी गयी है । ऋग्वेद से गृह्यसूत्रों के काल तक रुद्र देवता विषयक कल्पनाओं की उत्क्रान्ति पर दृष्टिपात किया

[Right Column] जाय तो प्रतीत होता है। ऋग्वेद अथवा वैदिक साहित्य में रुद्र निसर्ग प्रकोप का देव था । वही रुद्र उत्तर कालीन साहित्य में पशु, वन, पर्वत, नदी, श्मशानादि समस्त सृष्टि व्यापक एक महान् शक्ति सम्पन्न देवता के रूप में मान्यता प्राप्त कर लिया है । ऋग्वेद में रुद्र के स्वरूप का वर्णन किया गया है । उनका वर्ण भूरा है। सूर्य तुल्य जाज्वल्यमान एवं सुवर्ण समान प्रदीप्त हैं। (ऋ० १:४३, २:३३ ) पूषन तुल्य जटाधारी है । संहिताओं में वैदिक रुद्र का रूप बदलता दिखाई देता हैं। उन्हें सहस्राक्ष. नील वर्ण ग्रीवा, एवं केश युक्त बताया गया है ( वा० सं०: १६; ७, अथर्ववेद. २:२२ ) उनका उदर किंवा पेट कृष्ण एवं वर्ण रक्त कहा गया है । ( अथर्व वेद १५: १ ) उन्हे चर्मधारी भी कहा गया है। (वा० सं : १६-२-४,५१) काला- न्तर में यह चर्मधारी रूप वाघाम्बर एवं मृग चर्म- धारी रूप में परिणत हो गया । महाभारत एवं पुराणों में रुद्र के स्वरूप की अनेक कल्पनाएँ की गयी हैं। पंचमुख की कल्पना विशेष प्रचलित है । पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं ऊर्ध्व दिशा वाला मुख सौम्य तथा दक्षिण दिशावर्ती मुख रौद्र दिखाया गया है । दक्षिण दिशा काल की दिशा कही गयी है । अतएव रौद्र रूप प्रदर्शित करना इसी काल किंवा संहार का प्रतीक है । (म० अनु० १४०:४६) ग्रीवा नील होने का महाभारत में ही दो वर्णन मिलता हैं । महाभारत अनुशासन पर्व (१४१:८) इन्द्र के प्रहार के कारण ग्रीवा नील होना कहता हैं। महाभारत शान्ति पर्व (३४२:१३) दूसरा कारण देता है । समुद्र मंथन से प्राप्त हलाहल विष पान करने के कारण शिव की ग्रीवा नीली हो गयी थी । नाम नीलकंठ पड़ गया था । उन्हें वही पर श्रीकंठ कहा भी गया है । पुराणो मे रुद्र को चतुर्मुख (विष्णु धर्म: ३:४४- ४८;५५:१ ) अर्धनारीश्वर, नटेश्वर (मत्स्य: २६०) एवं त्रिनेत्र कहा गया है ।