भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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१६८ गजतरंगिणी रुद्र का निवास स्थान वैदिक साहित्य के अनुसार पर्वतों और मुख्यतया मूंजवन् पर्वत है (वा० स०: २५:२-४; ३.६१; ) महाभारत रुद्र का आद्य निवास स्थान मेरु पर्वत मानता है । रुद्र का इसलिए एक नाम मेरुधामा पड़ गया है । (म० अनु० १७:२,१) आश्वमेधिक पर्व महाभारत (८:१) वायु पुराण (४७.१९) एवं मौखिक पर्व (१७.२६) के अनुसार रुद्र का निवासस्थान मुंजवान किंवा मूजवत पर्वत है । यह पर्वत कैलास के उस पार था । महाभारत भीष्म पर्व (७.३१) में इनका निवास स्थान कैलास एवं हिमालय पर्वत बताया गया है । महाभारत अनुशासन पर्व (१६१:१७-१६) के अनुसार रुद्र का निवास स्थान काशी की श्मशान भूमि है । संवर्त को शव रूप शिव का दर्शन काशी में हुआ था । सभी का समन्वय करने पर निष्कर्ष निकलता है कि रुद्र का स्थान हिमालय के एकान्त में, तपस्या योग्य वनश्री के मध्य होना चाहिये । भूतेश्वर का स्थान इस दृष्टि से आदर्श है । यहाँ ज्येष्ठ रुद्र की स्थापना की कल्पना सराहना योग्य है । दक्ष प्रजापति ने रुद्र को नन्दिकेश्वर नामक वृषभ वाहन के लिये दिया था । उनकी ध्वजा पर वृषभ का चिह्न था । अतएव नाम वृषभध्वज पड़ गया । भूतेश्वर स्थान नन्दिक्षेत्र के अन्तर्गत है । इनका आयुध, विद्युत दार है। वेद में इनका शस्त्र धनुष बाण एवं वश कहा गया है । ऋ० २:३३:३; १०,५४२:११; १०:१२६ ६) यजुर्वेद के शतरुद्रीय अध्याय में रुद्र का स्वभाव चित्रण अधिक विस्तार के साथ दिया गया है । (तै० सं० ४:५ १, वा० सं० १६) इन्हें 'रुद्रतनु' अर्थात् रुद्ररूप और 'शिवतनु' अर्थात् शिव स्वरूप कहा गया है । या ते रुद्र शिवा तनू शिवा विश्वस्य भेषजी । शिवा रुद्रस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे ॥ अथर्ववेद में ग्यारह रुद्रों यथा (१) ईशान, (२) भव, (३) शर्व (४) पशुपति (५) उग्र (६) रुद्र एवं (७) महादेव का वर्णन है । पुराणों में अष्ट रुद्रों का उल्लेख है । यथा-(१) रुद्र (२) भव (३) शर्व (शिव) (४) पशुपति (५) भीम (६) ईशान (७) उग्र एवं (८) महादेव । महाभारत में एकादश रुद्रों का उल्लेख है । यथा (१) मृगव्याध (२) सर्व (३) निर्ऋति (४) अजैकपाद (५) अहिर्बुध्न्य, (६) पिनाकिन् (७) दहन (८) ईश्वर (६) कपालिन् (१०) स्थाणु एवं (११) भव (म० आदि ५०:१०३) स्कन्द पुराण में (१) भूतेश, (२) नील रुद्र (३) वृषवाहन (४) त्र्यंबक (५) महाकाल (६) भैरव (७) मृत्युंजय (८ गणेश एवं (९) योगेश रुद्रों का नाम दिया गया है । (स्कन्द पु० १७:१:७७) इस पुराण की मान्यता है । कृतयुग में अष्ट रुद्र थे, कलियुग में ग्यारह रुद्रों का अवतार हुआ था भागवत पुराण (२:१३:८-१०) में (१) मन्यु (२) मनु-(३) महिनस् (सोम) (४) महत् (५) शिव (६) ऋतध्वज (७) उपरेतस् (८) भव (९) काल (१०) वामदेव (११) धृतध्वज का नाम दिया गया है । स्कन्द पुराण में 'भूतेश' को एक रुद्र माना गया है । भूतेश्वर स्थान 'भूतेश' का मन्दिर था । स्थान का नाम भी भूतेश्वर था । अतएव यह निश्चित हो जाता है कि स्थान रुद्र से सम्बन्धित था । ज्येष्ठ रुद्र का नाम उत्तर मध्य तालिकाओं में शिवों में सर्वत्र मिलता । ऋग्वेद एवं ब्राह्मण ग्रन्थों में जो रुद्र था वही उपनिषदों में शिव का रूप ले लिया इस प्रकार रुद्र को परम शुद्ध आध्यात्मिक रूप प्राप्त हो गया । उनकी पूजा मद्य मांस से नहीं बल्कि फलपुष्पादि द्वारा होने लगी । उनका रूप अथर्व वेद वर्णित मातर्व रुद्र उच्च- लोक के अधिपति 'महादेव' तुल्य हो गया । इसीको महाभारत अनुशासन पर्व (१६१:३) बड़ी उत्तमता से प्रकट करता है ।