राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १६९
द्वे तनू तस्य देवस्य वेदज्ञा ब्राह्मणा विदुः । घोरान्याँ शिवामन्यां ते तनू बहुधा पुनः ॥ [ शिव की घोर एवं शिवा नामकी दो मूर्तियाँ हैं । उनमें घोरा अग्नि रूप हैं एवं शिवा परम गुह्य अद्यारम स्वरूप महेश्वर हैं ] रुद्र शिव की उपासना भारत मे अत्यन्त प्राचीन हैं । उपासना का काल विभाग दो भागों में विभक्त किया जा सकता है । प्रथम काल में शिव की प्रति- कृति की उपासना की जाती थी । द्वितीय काल में शिवलिङ्गोपासना आरम्भ हो गयी । भूतेश एवं ज्येष्ठ रुद्र इसी द्वितीय काल विभाग में आते हैं । उनमें शिवलिंग की स्थापना की गयी थी । ज्येष्ठ रुद्र का लिंग स्वयंभू था । ऋग्वेद (७.२१.५, १०।९९०३) में शिश्नदेव की उपासना का उल्लेख अनार्य लोगों के गन्दर्भ में किया गया हैं । प्राचीन वैदिक वाङ्मय में नहीं मिलता । पतंजलि के महाभाष्य (३:९९) में शिव, स्कंद, विशाख, की स्वर्णादि की मूल्यवान प्रतिकृतियों की पूजा के स्पष्ट निर्देश है । वेम कद फिसस की मुद्राओं पर शिव की त्रिशूलधारी एवं शिव के प्रतीक स्वरूप शिवलिंग नहीं अपितु नन्दिन् उत्कीर्ण किया गया है । श्वेताश्वतर उपनिषद् (४,११,५.२) में सर्व प्रथम शिवलिङ्गोपासना का निर्देश मिलता है । 'ईशान रुद्र' को समस्त योनियों का अधिपति कहा गया है । किन्तु यहाँ भी शिवलिंग को शिव का प्रतीक होने का स्पष्ट निर्देश नहीं है । महाभारत में उपमन्यु के आख्यान में सर्व प्रथम शिवलिङ्गोपासना का स्पष्ट रूप से निर्देश प्राप्त होता है । मोहे जो दडो एवं हड़प्पा के उत्खनन में शिव रूप से मिलती मूर्तियाँ प्राप्त हुई है । उनका काल ईशा के ३००० वर्ष पूर्व अर्थात् ४९६८ वर्ष है । यही काल कल्हण तथा नीलमत पुराण के अनुसार महा- भारत काल था । यहाँ के प्राप्त देवताओं की मूर्तियाँ २२ महाभारत वर्णित 'त्रिशीर्ष' 'वियम्ब्र' 'ऊर्ध्वलिंग' 'योगाध्यक्ष' स्वरूप से मिलती है । ( म. अनु.: १४: १६२, १६५, ३०८, १७.४६, ७७.९९ ) वहाँ से प्राप्त मूर्तियों के वाम हस्त में व्याघ्र एवं हस्तो हैं । दक्षिण हस्त में वृषभ एवं गण्डक हैं । वह चित्र भी महाभारत अनुशासन पर्व ( १४:३१३, १७,४८,६१,८५,९१ ) वर्णित 'पशुपति' 'शार्दूल रूप' 'व्याल रूप' 'मृग वाण रूप, 'नागवर्मोत्तरच्छद' 'व्याघ्राजिन' 'गहिग्घ्न' 'गजहा' एवं 'मण्डलिन्' से मिलता है । महाभारत में शिव को सर्वत्र वृषभवाहन कहा गया है । हिटाइट लोगों के तेशव देवता से शिव का साम्य मिलता है । बेबिलोन मे प्राप्त अनेक शिल्पो एवं अवशेषों में तेशब की प्रतिमाएँ मिली है । उनमें तेशव को वृषभवाहन एवं त्रिशूलधारी दिखाया गया है । तेशब को पत्नी का नाम माँ था । शिव भी अम्बिका जिन्हें पार्वती एवं दुर्गा कहा गया है उनके पति हैं । तेशब की पत्नी सिंहारूढ है । दुर्गा भी सिंह- वाहिनी है । सुगा में प्राप्त तेशब की पत्नी का चित्रण मधु- मक्षिका के साथ किया गया है। यह मार्कण्डेय पुराण वर्णित भ्रामरी देवी से साम्य रखता है । कल्हण ने भ्रामरी वासिनी देवी का वर्णन राजतरं- गिणी में ( ३:३९४, ४२३ ) किया है । तेशव के समान रुद्र के हाथ में विद्युत, धनुष, त्रिशूल, दण्ड, परशु, पट्टिश आदि शस्त्र दिखाये गये हैं । ( ऋ. २: ३३; ३; म. अनु १४: २८८ २८९, १७:४३, ४४:९९ ) 'शत्रुजय सूक्त' शुक्लयजुर्वेद मे रुद्र को लक्ष्य कर लिखा गया है । उसका विचार सुमेरियन देवता 'नेर्गल' से मिलता है । मत है कि भारतीय रुद्र शिव का सम्बन्ध किंवा साम्य अनादोलिया, मोसोपेटा- मिया, एवं सिन्धुघाटी की सभ्यता से अवश्य रखता है । ( राय चौधरी: स्टडीज इन इण्डियन एण्टि- क्विटीज पृष्ठ २००-२०४) निःसन्देह रुद्र सर्व प्रथम वैदिक देवता थे । कालान्तर मे वे व्रात्य, निषाद, वन्यादि एवं अनार्य