भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 984 में से

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पृष्ठ 255

१७० राजतरंगिणी ग्रामे ग्रामे स्थितैरश्वैर्धावनं प्रतिषिद्धवान् । स्वेनावहत् सततं नागः कोऽपि सुहृत्तया ॥ ११४ ॥ ११४. एक सदय हृदय नाग ग्राम ग्राम१ पड़ावों पर प रवर्तनाथं स्थित अश्वों की लम्बी कष्टप्रद यात्रा२ से राजा को विरत कर स्वयं उन्हें ज्येष्ठेश से विजयेश्वर निरंतर पहुँचा दिया करता था। स रुद्धवसुधान्म्लेच्छान्निर्व्वास्याखर्वविक्रमः । जिगाय जैत्रयात्राभिर्महीमर्णवमेखलाम् ॥ ११५ ॥ ११५. उस विक्रमशाली राजा ने म्लेच्छों१ से आक्रांत वसुधा का उद्धार कर अपनी विजय यात्राओं द्वारा समुद्र मेखला धारिणी मही का जय किया। लोगों के देवता बन गये । प्राचीन वैदिक आर्यों द्वारा प्रस्थापित कल्पनाएँ लुप्त हो गयी । अन्तर पड़ता गया । रुद्र भूतपति, किंवा भूतेश, सर्पधारी, स्मशान- निवासी देव में परिणत हो गये । प्रतिकृति की पुरा- तन उपासना की परंपरा नष्ट हो गयी । उसका स्थान शिव लिंग की उपासना करने वाली नवीन परम्पराओं ने ले लिया । ज्येष्ठेश किंवा ज्येष्ठ रुद्र नामकरण इसलिये किया गया कि सप्त, अष्ट, एकादश रुद्रों में सबसे ज्येष्ठ रुद्र की उपासना ग्राह्य की गयी । अतएव भूतेश रुद्र के समान ज्येष्ठेश रुद्र नामकरण कर दिया गया । पाठभेदः श्लोक संख्यानु ११४ में 'हसं', का 'हृ' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ११४(१) ग्राम ग्राम : अश्व से यदि ज्येष्ठेश से विजयेश तक की यात्रा की जाय तो चार दिन पड़ाव डालकर पहुँचा जा सकता है । कल्हण यहाँ स्पष्ट कहता है । मार्ग में पड़ने वाले ग्रामों में अश्व नियुक्त रहते थे । एक ही अश्व द्वारा पूरी यात्रा नहीं समाप्त हो सकती थी । कुछ दूरी पर नवीन अश्व तैयार रहते थे । शिथिल अश्व को त्याग कर नवीन अश्व से यात्रा की जाती थी । पड़ाव पर अश्व रखने और बदलने की प्रथा बहुत पुरानी है । उन्नीसवी शताब्दी के प्रारम्भ तक रेल तथा मोटर के आने के पूर्व यूरोप, एशिया तथा सभ्य जगत् में यह प्रथा प्रचलित थी । राजकीय डाक तथा संवाद ले जाने के लिये पड़ाव निश्चित रहते थे । वहीं अश्व रखे जाते थे । ठहरने किंवा विश्राम का प्रबन्ध रहता था । कश्मीर में यह प्रथा आज से तेईस सौ वर्ष पूर्व ही प्रचलित प्रतीत होती है । (२) यात्रा : श्री स्टीन ने इस श्लोक की टिप्पणी में ठीक ही लिखा है । कल्हण ने यहाँ ज्येष्ठेश से विजयेश्वर तक की लम्बी कष्टप्रद यात्रा का वर्णन किया है । यह कम से कम अश्वों द्वारा चार दिन का पड़ाव कर समाप्त की जा सकती थी । शीघ्र पहुँचने की दृष्टि से और वह किस प्रकार एक ही दिन में सम्भव हो सकता था, कल्हण ने नाग की कथा जोड़ दी है । प्रतिदिन यह कार्य राजा के लिए किस प्रकार सम्भव था इसका स्पष्टीकरण नाग को राजा के वाहन रूप में प्रस्तुत कर कल्हण करता है । ज्येष्ठेश से विजयेश की दूरी पक्षी उड़ान या नभ से सीधे ४५ मिनट की होती है । यदि यह यात्रा अश्व से की जाय तो सचमुच चार दिन लग जायगा । मार्ग अत्यन्त लम्बा, पहाड़ियों का चक्कर काटता, ऊबड़- खाबड़ और कष्टप्रद था। पहाड़ियों के कारण अश्व की गति तेज भी नहीं हो सकती थी। भूतेश्वर से कनक- वाहिनी नदी की घाटी पकड़कर चलने से सिन्धु नदी पहुँचने तक मार्ग है । अतएव नाग को यहाँ पर लाया गया है कि उसपर सवारी कर राजा अविलम्ब नित्य पहुँच जाता

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