भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 256

प्रथम तरंग १७१


[बायाँ स्तम्भ]

था। अश्व की सवारी से किसी प्रकार एक दिन में येशेश से विजयेश्वर नहीं पहुँचा जा सकता। इस लए इस असंगति दोष को दूर करने के लिये कल्हण नाग का कथानक वहाँ जोड़ा है। वसिष्ठाश्रम, ारबल, चीरमोचन, तत्पश्चात् मयग्राम, दुग्धाश्रम, हेरण्यपुरा, ध्रुवेश्वरी, ईशेश्वर, भोमा देवो, गोपाद्रि होते हुए श्रीनगर आता है। यहाँ से पुराधिष्ठान, जयवन, मिहपुर, समरस्वामी, पद्मपुर, ललितपुर, गोपालपुर, अवन्तीपुर, कत्तिका, होते वितस्ता पार कर यदि चला जाय तो गम्भीरा संगम होते चक्रधर से विजयेश्वर पहुँचता है। यह मार्ग त्रिकोण बनाता भूतेश्वर से विजयेश्वर तक बड़ा लम्बा बन जाता है। श्रीनगर से विजयेश्वर २९ मिल पड़ता है। प्राचीन मार्ग का अनुसरण किया जाता तो वह लगभग भी मिल से उस समय के चक्करदार मार्ग के कारण कम न होगा। आजकल सुगम राज पथ एवं सभी स्थानों में पहुँचने के लिए सड़क बन जाने के कारण मार्ग की दूरी कम हो गयी है और पथ भी सरल हो गये हैं। ११५ (१) म्लेच्छ : यहाँ म्लेच्छ से तात्पर्य यूनानी आक्रामकों से है। म्लेच्छ शब्द की विस्तृत व्याख्या परिशिष्ट 'म्लेच्छ' में की गयी है द्रष्टव्य है। कश्मीर के सीमान्त पर अर्थात् सिन्धु के पश्चिमी तट अफगानिस्तान, तथा कश्मीर के उत्तर एवं पश्चिम यूनानियों का शासन अलकसुन्दर अर्थात् सिकन्दर के आक्रमण के पश्चात् हो गया था। सम्राट् अलकसुन्दर की मृत्यु के पश्चात् यूनानी साम्राज्य अनेक क्षत्रपों में विभाजित हो गया था। निसन्देह अशोक का प्रभाव क्षेत्र किंवा राज्य मानसेहरा, तक्षशिला, शहबाजगढ़ी, लम्पक, कन्दहार तक फैल चुका था। अन्यथा वहाँ अशोक अपने स्तम्भों का निर्माण और धर्म प्रचार कराने में समर्थ नहीं हो सकता था। ईसा पूर्व २०६ ई० में यूनानी क्षत्रप, शासक किंवा राजा अन्तियोकस तृतीय ने बल्ख पर आक्रमण किया। जीत लिया। बिखरे राज्य को पुनः संघटित करने का प्रयास किया। उसने इसी वर्ष


[दायाँ स्तम्भ]

भारत की सीमा का अतिक्रमण किया। वह काबुल उपत्यका लांघता भारत भूमि पर सेना सहित आ पहुँचा। उस समय पाटलीपुत्र में मौर्य राजा शालीशुक था। उसे सुभगसेन भी कहा जाता है। अन्तियोकस ने शालीशुक से मित्रता कर ली थी। अलकसुन्दर के आक्रमण के समय तक्षशिला एवं दर्भाभिसार के राजा आम्भी ने अपनी निष्ठा अलकसुन्दर के प्रति प्रकट की थी। कश्मीर के राजा ने भी अपने भाई के साथ चालीस हाथी अलकसुन्दर के भेंट निमित्त भेजे थे। अन्तियोकस के अभियान का उद्देश्य मालूम होता है, अलकसुन्दर द्वारा विजित भूक्षेत्र पर पुनः अधिकार किंवा प्रभाव स्थापित करना था। सम्भव है। इसी दृष्टि से कश्मीर के राजा ने भी हाथो भेज कर अपनी निष्ठा प्रकट की थी। कश्मीर में अशोक का पुत्र जलोक शासन कर रहा था। कश्मीर भी अशोक के राज्य का अंश था। एतदर्थ अन्तियोकस ने आक्रमण किया होगा। कल्हण स्पष्ट कहता है कि म्लेच्छों के संहार निमित्त तपस्या कर अशोक ने जलौक पुत्ररत्न भगवान् शंकर की कृपा से प्राप्त किया था। उसके जन्म ग्रहण का प्रयोजन म्लेच्छों का संहार करना था। कल्हण ने उसी बात को दृष्टि में रख कर म्लेच्छ संहार की बात अपनी वर्णन संगति कायम रखने के लिये की है। अशोक का अवसान ईसा पूर्व २३२ वर्ष में हुआ था। यह घटना अशोक की मृत्यु के २६ वर्ष पश्चात् की है। भारतीय इतिहास की गणनानुसार इस समय अशोक का प्रपौत्र शालीशुक पाटलीपुत्र का राजा था। अशोक का पुत्र जलौक कश्मीर का राजा था। मालूम होता है। जलौक न तो कभी पाटली- पुत्र गया और न उसका कोई वंशधर पाटलीपुत्र का राजा हुआ था। उसने अपने पिता के सिंहासन पर बैठने का भी प्रयास नहीं किया। वह कश्मीर से ही सन्तुष्ट था। जलौक का अशोक के पश्चात् २६ वर्ष तक राज्य करते जीवित रहना कोई आश्चर्य की बात नहीं मालूम पड़ती।

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