भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

१६२ राजतरंगिणी संस्तम्भ्याम्भःप्रविष्टेन तेन नागसरोऽन्तगम् । तारुण्यं फणिकन्यानां निन्ये संभोगभज्यताम् ॥ १११ ॥ १११ अपना तारुण्य फणि कन्याओं के संभोग में सफल करने के निमित्त राजा नाग- 'सरोवरों में जल स्तम्भित कर प्रवेश करता था । भारत में प्राचीनकाल से यह कथा प्रचलित चली आती है । साधु महात्मा तथा चामत्कारिक पुरुष स्वर्ण बनाने की सिद्धि प्राप्त करते हैं । मुख्यतया पारा सिद्ध कर उसके द्वारा सोना बनाया जाता है । इसी प्रकार यह कथा भी प्रचलित है । पारस पत्थर के स्पर्श कराने से धातुएँ तथा लोहा सोना बन जाता है । इस प्रकार चामत्कारिक बातें माधु महात्मा तथा महान् पुरुषों की महत्ता वृद्धि के निमित्त उनके जीवन से सम्बन्धित कर दी जाती हैं । कोटिवेधिनी रस का कल्हण ने उल्लेख यहाँ किया है । यह रस क्या था ? कैसे बनता था ? इसका प्रयोग किस प्रकार किया जाता था ? इस पर अब तक प्रकाश नही पड़ सका है । यह किसी प्रकार का रस था । जिसके सिद्ध करने से सुवर्ण तैयार हो जाता था । १११ (१) नागसरोऽन्तरम्ः यहाँ यह अर्थ करना समीचीन मालूम होता है। नाग अर्थात् झरनों, प्रपातों एवं सरोवरों का जल स्तम्भित, अर्थात् रोककर राजा नागकन्याओं के साथ भोग कर अपना यौवन सुफल करता था । जलप्रपात, स्रोत तथा सरोवर कश्मीर में नागो के स्थान माने गये हैं । वे प्रत्येक सरोवर तथा प्रपातो एवं स्रोतों में निवास करते हैं । यहाँ पर नागकन्याओ का रहना स्वाभाविक है । जलप्रपात, स्रोत तथा सरोवर को स्तम्भित करने का अर्थ जल शान्त करना है । उन्हें अपने काम प्रसग निमित्त हलचलहीन बनाना है । अत्यन्त एकान्त वातावरण उत्पन्न करना है । यहाँ पर कल्हण ने किसी सरोवर, स्रोत एवं प्रपात विशेष का उल्लेख नही किया है । उसका मन्तव्य मालूम होता है। राजा किसी नाग किंवा सर विशेष की नागकन्या के स्नेह सूत्र द्वारा ही सीमित नहीं था । वह इच्छानुसार कश्मीर के अगणित नागों तथा सरों में प्रवेश कर अनेकानेक नागकन्याओं से सम्बन्ध स्थापित करता था । वह किसी एक स्थान से बँधा नही था । कल्हण इस प्रकार राजा जलोक की ऋद्धि का वर्णन गौण रूप से कर देता है । राजा ऋद्धि सम्पन्न था । वह नागो तथा सरों के जलो को बाँध देता था । जल बाँध देने की कथा योगियो के जीवन से सम्बन्धित की जाती हैं । योगी नदी के जल को स्तम्भित किंवा बाँधकर नदी पार पैदल चला जाता है । जल बाँधकर अपना चमत्कार दिखाता है । चामत्कारिक कथानको से साहित्य भग पड़ा है । कल्हण राजा जलोक के कोटिवेधिनी रस तुल्य उसके दूसरे चमत्कार का वर्णन करता है । कल्हण एक तीसरे चमत्कार को और राजा के जीवन से सम्बन्धित करता है । राजा जल मे प्रवेश करता था । जल में डूबने अथवा रहने पर साधारण प्राणी प्राणवायु के अभाव मे मर जाता है । परन्तु राजा जलोक वहाँ नागकन्याओ के साथ विहार करता था । राजा की दिव्य शक्ति का जो उल्लेख कल्हण ने श्लोक संख्या १०९ मे किया है उन्ही का यहाँ विस्तार करता है । राजा में इतना अधिक दैवी गुण किंवा प्रभाव था कि मनुष्य होते हुए भी वह देवताओं तुल्य अद्भुत कार्य करता था । राजा का जल के अन्दर बिना प्राणवायु प्राप्त किये विहार करना स्वतः एक चमत्कार की बात थी । कल्हण ने राजा के दिव्य प्रभाव का यह तीसरा उदाहरण दिया है ।