राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १६१ यस्य दिव्यप्रभावस्य कथाः श्रुतिपथं गताः । आश्चर्याच्चपलतां यान्ति नियतं द्युपदामपि ॥ १०९ ॥ १०९. राजा के दिव्य प्रभाव की कथा जब देवताओं के कानों तक पहुँची तो वे आश्चर्य चकित स्तम्भित हो गये । कोटिवेधिनि सिद्धे हि स रसे हाटकार्पणैः । असीसुषिरतां हर्तुं हेमाण्वस्य ध्रुवं क्षमः ॥ ११० ॥ ११०. कोटिवेधिनो रस की सिद्धि द्वारा करोड़ों वस्तुओं को सुवर्ण में परिणत कर शून्य गगन मण्डल को सुवर्ण दान द्वारा भर देने में राजा सक्षम था । हाल बनाकर गरीबों और मसकीनों को बख्श दिये । शामदेव के शागिर्द से नन्दी पुराण पढ़कर नन्दीश्वर का मजहब अपने ऊपर अख्तयार कर लिया । बुद्ध मजहब फजहवन् तर्क कर दिया । राजा जलोक की कुल हुकूमत साठ साल थी ।' (पृष्ठ ३९४०) हसन ने अपने पूर्व के मुस्लिम इतिहासकार तथा कल्हण सब के द्वारा वर्णित घटनाओं का समन्वय कर लिया है । सब की बात मान ली है । उसने 'इतिहास तिमिर नाशक' का उल्लेख किया है। काशी के राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिन्द' ने भारत का एक अत्यन्त संक्षिप्त इतिहास लिखा था । मैंने उसे अपनी बाल्यावस्था में पढ़ा था। वह हिन्दी तथा शायद उर्दू दोनों भाषाओं में छपा था। हसन ने यही इतिहास पढ़ा था। इतिहास तिमिर नाशक साधारण लोगों के पढ़ने के लिये उन्नीसवीं शताब्दी में लिखा गया था। मेरे पास इसकी मूल प्रति थी । वह 'कलकतिया नागरी' मोटे टाइप में धार्ट कागज पर छपा था । उन दिनों उसका मूल्य था । क्योंकि कोई और इतिहास भाषा में उपलब्ध नहीं था । राजा शिवप्रसाद नागरी और हिन्दी भाषा के महान् पक्षपातियों एवं उन आन्दोलकों में थे जिन्होंने हिन्दी को उर्दू से भारत में बचाया था। उन दिनों हिन्दी के स्थान पर उर्दू चलाने का प्रचार तेजी पर था। काशी की नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना तथा तत्कालीन हिन्दी आन्दोलन की यही पीठिका थी । हसन का ऐतिहासिक ज्ञान कितना सीमित था यह इसी एक बात से प्रमाणित होता है कि उसने अपने मत की पुष्टि इतिहास तिमिर नाशक का उद्धरण देकर करना चाहा है; जिसका ऐतिहासिक महत्त्व साधारण है। जलोक सम्बन्धी हसन के मत को मैं उसी प्रकार मान्यता देने में अपने को असमर्थ पा रहा हूँ जैसे अबुल फजल, आजम तथा हैदुद्दीन को । जलोक का वर्णन कल्हण ने कवि श्री छविलाकर के आधार पर किया है। श्री छविलाकर ने जैसा वर्णन किया होगा उसे ही कल्हण ने अपनी पुस्तक राजतरंगिणी में स्थान दिया है। इस सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक वर्णन परिशिष्ट 'जलोक' में द्रष्टव्य है । पाठभेद : श्लोक संख्या १०९ में 'आश्चर्याच्च' का 'आश्चर्याश्च' और 'नियतं' का 'निश्चयं' और 'द्युपदां' का 'द्युसदां' पाठभेद मिलता है । श्लोक संख्या ११० में 'वेधिनि' का 'वेदिनि'; 'सुषिरताम्' का 'सुस्वितताम्' और 'हर्तुं' का 'कर्तु' और 'हेमाण्वस्य' का 'हेमांगस्य' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ११० (१) कोटिवेधिनि रस : कल्हण ने धातुओं से सुवर्ण बनाने का उल्लेख राजा ललितादित्य (रा० त० ४ : २४६ तथा ३६३) और सिकन्दर बुतशि- कन के वर्णन प्रसंग में; जोनराज ने अपनी राज- तरंगिणी (श्लोक संख्या ५७८) में किया है। २१