राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १६३ तत्कालप्रबलप्रौढबौद्धादिसमूहजित् । अवधूतोऽभवत्सिद्धस्तस्य ज्ञानोपदेशकत् ॥ ११२ ॥ ११२. राजा का ज्ञानोपदेशक एक तेजस्वी दार्शनिक अवधूत था, जिसने कश्मीर मण्डल में सफलता से फूल कर प्रबल हो उठे बौद्ध 'समूह को शास्त्रार्थ में परास्त किया था। ११२ (१) बौद्ध : अशोक के कारण बौद्धधर्म का प्रचार प्रबल हो उठा था। संघ का भी संगठन सुदृढ़ हो गया था। अशोक ने कश्मीर सीमान्त पर (१) मानसेहरा, (२) शहबाज गढ़ी, तथा (३) धौली में लगे शिला अभिलेख में धर्म प्रचार तथा संघ संघटन का निर्देश दिया है। धौली में कश्मीर के सीमान्त स्थान तक्षशिला का भी उल्लेख किया गया है। अशोक ने धर्म प्रचारार्थ पंच वर्षीय योजना बनायी थी। शहबाज गढ़ी तृतीय अभिलेख में उसने स्पष्ट लिखा है—वदष षषभिषितेन... अणपितं । सवत्रमअ विजिते युत रजिको प्रदोशक पंचषु पंचषु ५ वषेपु अनुसंयनं निक्रमंतु एताम्ये वो करण इमिस धंमनुशस्तिये थ अनयेपि क्रमये।' अभिलेख के बारह वर्ष (पश्चात्) मेरे द्वारा ऐसी आज्ञा दी गयी। सर्वत्र मेरे राज्य में, युक्त, रज्जुक, प्रादेशिक पाँच-पाँच (५) वर्ष पर इस कार्य के लिये, इस धर्मानुष्ठान के लिये तथा, अन्य कार्य के लिए दौरे पर जाँय।' मानसेहरा तृतीय अभिलेख में पुनः लिखा गया है ' देवनं प्रिये प्रियदशि रज एथ अह (१) दुवड शवष भिपितेन में इयं अणपयिते (२) सवत्र विजि तसि .......तरनु प्रदेशिके पंचसु ५ वषेषु ' अनुसंयनं निक्रमन्तु एतये अ अध्रये इमये धमनु शस्तिये यथ अग्रये पि क्रमणे (३) सधुमत पितृप्य मित्र संस्तुत............ 'अतिकिनं च श्रमण भ्रममणं सधुदने प्रणन अनरंभे सधु अपव्यत अपभडत मधु (४) परिप वि थ युतनि गणनसि अण पयि शति हेतुने च । वियंज न ते च । देवानां प्रिय, प्रियदर्शी राजा ने ऐसा कहा द्वादश वर्षाभिषिक्त मुझने ऐसा आज्ञा हुआ। राज्य में सर्वत्र मेरे युक्त, रज्जुक, प्रादेशिक (नामक राज्य कर्मचारी) पाँच-पाँच (५) वर्षों में दौरे पर निकलें। इस प्रयोजन के लिए इस धर्मानुशासन के लिए तथा अन्य भी कार्य के लिए। ... परिषद् युक्तों को हेतु (कारण) और व्यञ्जन (अक्षरशः अर्थ) के साथ (इन नियमों की) गणना करने के लिए आज्ञा देंगी। उक्त दोनों स्थानों के पंचम अभिलेखों में धर्म महामात्र की नियुक्ति के साथ अपने पुत्र, प्रपौत्र आदि के लिये अभिषेक के तेरहवें वर्ष में अशोक ने आदेश दिया। '११. देवनं प्रियो प्रियदसि रय एवं अहति कलणं दुकरं यो आदि करो कलणस सो दुकरं करोति सो मय बहुकलं किटुं तं मअ पुत्र च नतरो च तंन ये मे अपचं वक्षन्ति अवकप॑ तथ ये अनु वटिशन्ति ते सुकटं कर्पति यो चु अ तो ... ...कं प हये शदि सो दुक्टं कवति पयं हि सुकरं स अति क्रतं अतर नो भुत पुव धंम महमत्र नम सो तोदश वषभिसितेन १२ मम धम महमत्र किट ते सत्र प्रपंड़ेषु वषट धमं धिध नये व धम वडिय हिद सुखये च धमयुतसं.........।' [ देवानां प्रिय प्रियदर्शी राजा ने ऐसा कहा। जो कल्याण का प्रारम्भ करता है वह दुष्कर कार्य करता है किन्तु मुझसे बहुत कल्याण किया गया। यदि मेरे पुत्र, नाती और उनके परे मेरे अपत्य कल्प के अन्त तक (इसका) अनुसरण करेंगे ये कुछ सुकृत करेंगे। जो यहाँ (इस देश में) इसका एक अंश भी नष्ट करेगा वह दुष्कृत करेगा। पाप सुकर है। बहुत समय बीता। भूतकाल में धर्म महामात्र नाम (का अधिकारी) नही थे। किन्तु राज्याभिषेक के तेरह वर्ष पश्चात् मेरे द्वारा धर्म महामात्र (नियुक्त) किये गये।