भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 249

१६४ राजतरंगिणी धर्म की स्थापना, धर्मवृद्धि और धर्मयुक्तों के हित सुख के लिये वे पाषण्डों (धार्मिक सम्प्रदायों) मे व्याप्त हैं ।'] मानसेहरा में भी यही अभिलेख है । कश्मीर की सीमा पर प्राप्त दोनों अभिलेखों के पश्चात् 'धौली के प्रथम पृथक् अभिलेख में अपने राजनैतिक आदर्श में धर्म प्रचार का आदर्श भी रखा । उसने महामात्रों के साथ ही साथ कुमार अर्थात् राज्यपालों के लिये त्रिवर्षीय योजना प्रस्तुत की । यहाँ तक्षशिला के नाम का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है जो कश्मीर की सीमा और कभी कश्मीर राज्य के अन्त- र्गत था । २१. 'अकस्मा पलिकिलेसे वनो सियाति (२३) एताये च अठाये हथ्यं मते पंचसु पंचसु वसे । २२ सुनिस्ग मयि खामि ए अक्रकसे अचंडे सखिनालंभे होयति एतं अठं जानितु ... तथा २३ कलंति अथ मम अनुसथीति (२४) उजेनि तेपि खु कुमाले एताए य अठायं निखा मयिस .... २४. हे दिसमेव वग नो च अति कामयिसति तिनि वसानि (२५) हेमेव तखसिलाते पि (२६) अद्वा अ ... २५. ते महामाता निखमिसंति अनुसयानं तदा अहा पयितु अतने कंमं एतं पि जानिसंति २६. तं पि तथा कलंति अथ लाजि ने अनु साथीति (२७) [ बिना किसी कारण के परिक्लेश (शारीरिक कष्ट) का दण्ड न मिले । इस प्रयोजनके लिए मैं महामात्रों को पाँच-पाँच वर्षों के अन्तर से दौरे पर भेजूँगा । जो अकर्मश, अचण्ड, श्लक्ष्णारम्भ (सर- निकलेंगे तब वे अपने कर्तव्यों की अवहेलना न करते हुए मेरे इस आदेश को जानेंगे (२६) और ऐसा कार्य भी करेंगे जैसा राजाका अनुशासन है । ] अशोक ने सामाजिक जीवन में भी आमूल परि- वर्तन करनेका विचार किया जैसे उसने 'विहार यात्राके स्थानपर' 'धर्म यात्रा' का प्रचलन किया । (जौगढ अष्टम अभिलेख) उसने स्वयं स्थान स्थान पर २५६ से अधिक पड़ाव डाला था । (गुर्जरा तथा सहसराम अभिलेख) । राजाश्रय, प्रचारादिके कारण बौद्ध धर्मको विशेष बल मिला । चीनी यात्रियोको अशोक निर्मित कम-से-कम चार स्तूप कश्मीर उपत्यका से मिले थे । पाँच सौ चैत्यों का निर्माण हुआ था । कल्हण इस दशा की ओर संकेत करता है । बौद्ध धर्मानुयायी प्रबल हो गये थे । वे धर्म प्रचारके उत्साहसे भर गये थे । उनका अपने धर्मके समर्थन निमित्त शास्त्रार्थ करना व्यावहारिक बात मालूम होतो है । पुराने सनातन धर्मके पक्षपाती अवधूतने उन्हें शास्त्रार्थमें पराजित किया था । कल्हण वहाँ गौण रूपसे संकेत करता है । जनता तथा जलोक राजा पुराने धर्मकी ओर पुनः मुड़े थे । यद्यपि उसने बौद्ध धर्मका विरोध नही किया था । (२) अवधूत : 'महानिर्वाण तत्र' के अनुसार अवधूतों का वर्गीकरण किया गया है । अवधूत शैव तथा वैष्णव दोनो सम्प्रदाय के होते थे । अवधूतका शाब्दिक अर्थ त्यागी किंवा संन्यासी होता है । उनका वर्गीकरण 'महानिर्वाण तन्त्र' के अनु- सार (१) ब्रह्मावधूत (२) शैवावधूत (३) वीरा- नया (४) कुलावधूत होते हैं ।