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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 250

प्रथम तरंग १६५ विजयेश्वरनन्दीशक्षेत्रज्येष्ठेशपूजने । तस्य सत्यगिरो राज्ञः प्रतिज्ञा सर्वदाऽभवत् ॥ ११३ ॥ ११३. उस सत्यवादी राजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि नन्दिक्षेत्र स्थित ज्येष्ठेश्वर१ तथा विजयेश्वर की सदा पूजा किया करेगा।

गुह्यांग ढकने मात्र के लिये कौपीन होता है। शरीर भस्म किंवा रक्त चन्दन से पुता रहता है। हाथो में काष्ठ दण्ड, परशु एवं डमरू और मृगचर्म रहता है। कुलावधूत उसे कहते है जो कुलाचार में अभिषिक्त होकर भी गृहस्थाश्रम में रहता है।

वैष्णव सम्प्रदाय में रामानन्द की शिष्य परम्परा में अवधूत होते हैं। वैष्णव अवधूत के सर के केश लम्बे होते हैं। कण्ठ में स्फटिक की माला रहती है। शरीर पर कंथा रहता है। हाथ में दरियाई नारि- यल का खप्पर होता है। इस सम्प्रदाय के बंगाल में पृथक् पृथक् अखाड़े होते हैं। सभी जाति के लोग इसमें सम्मिलित हो सकते हैं। ये गृहस्थों के द्वार पर वीर अवधूत नामका स्मरण कर एकतारा किंवा अन्य कोई वाद्य यंत्र बजाकर गाते हैं। इनके निवास की शैली अव्यवस्थित रहती है। इन्हें बंगाल में कुछ लोग बाउल गायक कहते हैं। परन्तु वह अवधूतो का एक भेद मात्र है।

नाथ सम्प्रदाय में अवधूतों का स्थान बहुत ऊंचा माना गया है। वे प्रकृति विकारों से दूर रहते हैं। कैवल्य की प्राप्ति निमित्त आत्मचिन्तन तथा अभ्यास में निरन्तर रत रहते हैं। 'सगुण एवं निर्गुण' ब्रह्म दोनों से पर की उनकी स्थिति होती है।

गुरु दत्तात्रेयको अवधूत कहा जाता है। दत्त सम्प्रदाय में अवधूतको सर्वश्रेष्ठ माना गया है। 'अवधूत गीता' में अवधूतों का पूर्ण विवेचन विस्तार के साथ प्राप्त होता है।

स्त्रियां भी अवधूत तुल्य अवधूती कही जाती हैं। वे विशेषतया पश्चिमोत्तर भारतीय क्षेत्र में मिलती हैं। वे संन्यासी पुरुषो तुल्य वेश धारण करती हैं। भस्म लगाती है। कण्ठ तथा बाहु में रुद्राक्ष की माला पहनती है। कतिपय अवधूतनियां अपने जूड़ा में भी रुद्राक्ष माला लपेट लेती है।

अवधूती मार्ग सुषुम्ना नाड़ी की एक संज्ञा है। उस प्राण वायु की इड़ा पिंगला नाडी के स्थान पर सुषुम्ना नाडी में धारण करने को अवधूती किंवा अवधूतिका मार्ग कहा जाता है।

अवधूतेश्वर शंकर का एक अवतार माना गया है। कथा है। एक समय इन्द्र तथा बृहस्पति भगवान् शंकर के दर्शनार्थ कैलास जा रहे थे। उनकी परीक्षा लेने का शंकर ने विचार किया। मार्ग में दिगम्बर और भयंकर रूप बनाकर बैठ गये। वह न तो मार्ग से हटते थे और न कुछ बोलते थे।

इन्द्र ने चिढ़कर वज्र निकाला। शंकर ने वज्र का स्तम्भन कर दिया। उनका तृतीय नेत्र खुल गया। उससे ज्वाला निकलने लगी। बृहस्पतिने शंकरका उग्र रूप देखकर, स्तुति की। वह अग्नि ज्वाला लवणोदधि में डाली गयी। उससे जालंधर उत्पन्न हुआ। उसका वध शंकर ने किया। (शिव० शत : ३०)

११३ (१) ज्येष्ठेश = शंकर की पूजा कश्मीर में अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित थी। उनकी तीन नामों यथा ज्येष्ठेन, ज्येष्ठेश्वर तथा ज्येष्ठ रूप से पूजा होती थी। उनके स्थान भी भिन्न थे।

प्रथम ज्येष्ठेश का स्थान हरमुकुट पर्वत के अधोभाग में नन्दिक्षेत्र किंवा नन्दीश क्षेत्र में था। इसका उल्लेख कल्हण ने राजतरंगिरणी १: ३६ में किया है। द्वितीय स्थान त्रिपुरेश्वर अर्थात वर्तमान त्रिफर के समीप था। इसका उल्लेख राजतरंगिणी में कल्हण ने ५: १२३ में किया है। तृतीय स्थान श्रीनगर के समीप था। इसका उल्लेख राजतरंगिणी १: १२४ में कल्हण ने किया है।