राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १५९ हरिमुकुट यात्रा से लौटते समय भूतेश मन्दिर का स्थान मार्ग पर पड़ता है। परन्तु इस पर विशेष ध्यान कभी नहीं दिया गया था। मालूम होता है मन्दिर के नष्ट भ्रष्ट हो जाने के कारण इसका महत्त्व लोग भूल गये थे। पाठभेद : श्लोक संख्या १०८ में 'साध्य' का पाठभेद 'मोधो' तथा 'ज्वलोको' का 'उजलोको' तथा 'गुधया' का 'श्रद्धया' मिलता है। १०८ (१) जलोक : आइने अकबरी में नाम ज्यूलोक दिया है। अबुल फजल के अनुसार—'राजा ने समुद्र तक विजय प्राप्त किया था। विजय यात्रा से लौटते समय वह कन्नौज गया था। उस समय कन्नौज (कान्यकुब्ज) हिन्दुस्तान की राजधानी थी। जलोक कन्नौज से अनेक गुणी तथा विद्वानों को कश्मीर लाया। उनमें सात को चुनकर विभिन्न विभागों का मुख्याधिकारी नियुक्त किया। उनमें एक ज्योतिष विभाग था। 'उसके आदेश पर सर्पों का एक बहुत बड़ा समूह चलता था। उन्हीं पर आरूढ होकर राजा लम्बी जल यात्रा करता था। राजा किसी समय युवा और किसी समय वृद्ध बन जाता था। उसके सम्बन्ध में अनेक चमत्कारिक बातें कही जाती है। इस राजा के समय बुद्ध धर्म मानने वालों के साथ सहिष्णुता का व्यवहार किया जाता था।' अबुल फजल ने राजतरंगिणी के फारसी अनुवाद तथा प्रचलित जनश्रुति पर राजा जलोक का उल्लेख किया है। जलोक के समय कन्नौज भारतवर्ष की राजधानी नहीं था। पाटलीपुत्र राजधानी था। यहाँ सर्पों का तात्पर्य नागो से अबुल फजल का मालूम होता है। इतिहासकार आज़म ने लिखा है :—कश्मीर पर एक नया धर्म लादा गया। उश्ट्रि टिम्ब से अशोक के पुत्र जलोक ने म्लेच्छों को निकाल बाहर किया। राजा देश-विजय हेतु निकला। उसने उत्तरी ईरान जीत लिया। उत्तरी ईरान जीतने का कोई साधिकार प्रमाण नहीं मिलता। विदेश यात्रा का अर्थ आज़म ने उत्तरी ईरान लगाया है। आज़म ने यह तथ्य कहाँ से पाया कोई प्रमाण नहीं देता। बैदुद्दीन इतिहासकार लिखता है :—'ईरान का राजा इस समय 'दोराव' था। ईरान के विजय के पश्चात् उसने कन्नौज जीता था।' आज़म तथा बैदुद्दीन की बातें यदि मान ली जाँय तो नवीन धर्म पारसियों की अग्नि पूजा हो सकती है। कश्मीर में बुद्ध तथा सनातन धर्म दोनों उस समय प्रचलित थे। दोनों में विरोध नहीं था। ईरान से सम्पर्क में आने पर इसी की सम्भावना हो सकती है। अग्नि पूजक पंजाब के उत्तर तथा पश्चिमी भाग में एक समय आबाद थे। किन्तु कश्मीर में अग्नि पूजा पारसियों की शैली की कभी प्रचलित नहीं थी। हवन, यज्ञ, पञ्चाग्नि, अग्निहोत्र आदि सनातन धर्म के अंग थे। आर्य धर्म में परम्परा से यज्ञ होता आया है। वह यज्ञ वेदी तक सीमित था। महात्मा जरदस्तू द्वारा प्रसारित तथा प्रचलित अग्नि पूजा का चिह्न कश्मीर में अभी तक मिल नहीं सका है। किसी अग्निकुण्ड, अग्निमन्दिर किंवा अग्नि वेदी का उल्लेख नीलमत पुराण एवं राजतरंगिणी में नहीं मिलता। जलोक ने ईरान विजय के पश्चात् एक नवीन धर्म कश्मीर पर लादा वह भ्रामक एवं तथ्यहीन है। हसन लिखता है :—'जलोक राजा अशोक का दूसरा बेटा था। कलिसंवत् १७२६ मुखालिफों का किला फतह करके सखावत और इन्साफ परवरी में