भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 24

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नाम एवं स्मरण श्रद्धा-भक्ति के साथ कल्हण ने किया है। उसने रक्त, निर्माणों को कश्मीर मण्डल में खोज- खोजकर, शिव मन्दिरों के समान लिखा है। राजाओं के अतिरिक्त यदि किसी अन्य व्यक्ति ने भी विहार, चैत्य, स्तूपादि का निर्माण कार्य किया था तो उसका भी सादर उल्लेख किया है। उनपर चढ़ाये अग्रहारों एवं दान कर्मों की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। धर्म विश्वास में कल्हण ने कट्टरता वहीं नहीं प्रदर्शित की है। उसने शैव एवं बौद्ध धर्म को परस्पर विरोधी नहीं माना है। दोनों का उपासक होने के कारण उन्हें एक दूसरे का पूरक माना है। सहायक माना है। बुद्ध को अन्य अवतारों के समान अवतार मान कर वन्दना की है। बौद्धों के प्राबल्य को रोककर जलौक ने शैव धर्म के पुनर्स्थापन के लिए प्रयास करते हुए विहारों तथा बौद्ध धर्म-स्थानों को क्षति पहुँचाने का प्रयास किया तो जलौक का विचार नाटकीय ढंग से कल्हण बदल देता है। उसने शिव के साथ बोधि- सत्व के प्रति भी रुचि राजा में उत्पन्न होने की कथा कही है। जलौक से विहार-निर्माण भी करा देता है। धार्मिक रुचि कल्हण की इससे प्रकट होती है कि वह मेघवाहन को आदर्श किंवा अनुकरणीय राजा मानता है। मेघवाहन विश्वविजय द्वारा अहिंसा का प्रचार करना चाहता था। उसने धुर दक्षिण भारत तक विजय कर राजाओं से अहिंसक होने की प्रतिज्ञा करायी थी। दिग्विजय के स्थान पर मेघवाहन धर्म- विजय किया था। मेघवाहन पशुबलि के स्थान पर, पशु की रक्षा के लिए स्वयं अपनी बलि चढ़ाने के लिए वारंवार उद्यत हो गया था। कल्हण ने अहिंसा व्रत का ओजमयी भाषा में वर्णन किया है। कल्हण प्रतीत होता है, शाकाहारी था। उसने प्याज तथा लहसुन भोजी ब्राह्मणों की निन्दा की है। अहिंसा व्रत एवं अहिंसक भावना का अवसर मिलते ही सबल भाषा में उल्लेख करता है। भगवान् बुद्ध की प्रतिमा राजा हर्ष जिस समय परिहासपुर में खण्डित करना चाहता था तो उसके चाचा कनक ने राजा को इस अनुचित कार्य से विरत किया था। बौद्धमतानुयायी दूसरों का मारा मांस निःसंकोच खा लेते हैं। परन्तु कल्हण इसको उचित नहीं मानता। वह एक शुद्ध ब्राह्मण के समान शाकाहारी था। यद्यपि काश्मीर में आमिष भोजियों की संख्या सर्वाधिक सर्वदा से रही है। कल्हण ने बौद्ध धर्म सम्बन्धी अनेक पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया है। इससे प्रकट होता है कि उसने त्रिपिटकों का अध्ययन किया था। कल्हण ने बौद्ध दर्शन, परम्परा, शासन तथा उसकी पद्धतियों का पूर्णतया अध्ययन किया था। अन्यथा वह साधिकार विश्वास के साथ लिखने में सफल न होता। समकालीन व्यक्ति : कल्हण ने तत्कालीन समाज तथा व्यक्तियों का वर्णन बड़ी निष्ठा के साथ किया है। रिल्हण राजा जयसिंह का अमात्य था। (रा० ८ : २४०३) वह राजा सुस्सल का भी विश्वासपात्र था। कल्हण राजा जयसिंह को विद्या का संरक्षक कहता है। रिल्हण, उसके भ्राता, उसकी पत्नी के दान तथा स्थान-स्थान पर उसके सैन्य चातुर्य और वीरता का वर्णन किया है। (रा० ८ : २४०५-२४१८) सुरेश्वरी क्षेत्र में रिल्हण ने अनेक पुण्य-कार्य किये थे। कल्हण उसका विशद वर्णन करता है। उसकी प्रशस्ति सरल भाषा में किया है। प्रतीत होता है कल्हण का उससे व्यक्तिगत स्नेह था। (रा० ८ : ३३६४-७०)। दूसरा प्रमुख व्यक्ति अलंकार था। वह राजा जयसिंह के उत्तरार्ध राज्य काल में गंजाधिप था (रा० ८ : २४२३)। उसका भी कल्हण ने आदर के साथ उल्लेख किया है। कवि मंख का वर्णन कल्हण ने एक काव्यकार की दृष्टि से नहीं बल्कि राजा जयसिंह के सन्धि-विग्रहक के रूप में किया है। (रा० ८ : ३३५४)