राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ८ ]
गंजाधिप अलंकार का मंख भ्राता था। मंख ने अपने काव्य में अपने भाई को विद्वानों तथा कलाविदों का संरक्षक कहा है। मंख का केवल एक बार उल्लेख कल्हण ने किया है। यह भी श्रीकण्ठचरित काव्य के रचनाकार के रूप में । ( रा० ८: ३३५४ ) कल्हण ने द्वारपति उदय का भी उल्लेख किया है। किन्तु उसके प्रति विशेष आदर प्रकट नही करता। एक व्यक्ति का नाम उसने और आदर के साथ लिया है। उसका नाम है, राज वदन । ( ग० ८ : २६९८ ) राज वदन ने राजा जयसिंह के विरुद्ध विद्रोह किया था। अन्य नामों का भी उसने उल्लेख किया है, परन्तु उनका विशेष महत्व नही है। कल्हण और मंख : तत्कालीन लेखकों में कल्हण का उल्लेख केवल मंख ने कल्याण नाम से किया है। जबकि कल्हण ने 'मंख' शुद्ध और प्रचलित नाम लिखा है। यह एक विचित्र बात है। लेखकों, कवियों तथा विद्वानों का उनके जीवन-काल में कम आदर-सत्कार देखा गया है। कल्हण इसका अपवाद नहीं था। डाक्टर व्हूलर के अनुसार मंख ने श्रीकण्ठचरित महाकाव्य की रचना सन् ११२८-११४४ ई० के मध्यवर्ती काल में किया था। सन् ११४४ ई० के दो प्रमाणों से निश्चित हो जाता है। अलंकार के निवास- स्थान पर एक सभा हुई थी। अतिथियों में कन्नौज के राजा गोविन्द चन्द्र का दूत सुहले भी उपस्थित था। राजा गोविन्द चन्द्र का काल सन् ११२०-११४४ ई० है। कल्हण ने अलंकार का उल्लेख दो स्थानों पर राज स्थानीय पदाधिकारी के रूप में किया है। ( रा० ८ : २५५७, २६१८ ) उसने अलंकार का उल्लेख पुनः बृहद्गंज के रूप में किया है। (रा० ८ : २४२३ ) मंख ने भ्राता अलंकार को राज्य का सन्धि-विग्राहक लिखा है। इससे कोई उलझन नही पैदा होती। मंख ने स्वयं लिखा है। राजा सुस्सल ने अलंकार को सन्धि विग्राहक पद पर रखा था। उसका द्वितीय पद 'स्थानीय' तथा 'बृहद् गंज' राजा जयसिंह के काल का हो सकता है। कल्हण स्वयं लिखता है। मंख ने अपने भाई अलंकार के सन्धि विग्राहक पद को प्राप्त किया था। ( रा० : ८ : ३३५४ ) मंख ने जयसिंह को अपना राजा स्वीकार किया है। मंख ने कोंकन के राजा अपरादित्य का उल्लेख किया है। वह सन् ११८६ ई० तक राज्य करता रहा। इससे इस बात की पुष्टि होती है। काश्मीर के लेखकों को तत्कालीन भारतीय राजाओ एवं देश-काल का ज्ञान था। कल्हण का घटना-क्रम वर्णन एवं नामों का उल्लेख मंख के श्रीकण्ठचरित से मिलता है। वह कल्हण की सत्यता प्रमाणित करता है। यदि सन् ११४४ ई० श्रीकण्ठचरित की रचना का काल मान लिया जाय तो राजतरंगिणी की रचना के पूर्व मंख अपना महाकाव्य समाप्त कर चुका था। श्रीकण्ठचरित में मुख्यतः पच्चीसवाँ अध्याय उच्चकोटि की काव्य रचना है। मंख अपने भाई अलंकार के निवास-स्थान पर हुई सभा का उल्लेख करता है। उस सभा में उसने अपने काव्य को विद्वानों के सम्मुख उपस्थित किया था। उपस्थित व्यक्तियों तथा विद्वानों का परिचय उनके पदो के साथ दिया है। उसमें ३० कवियों एवं विद्वानों का उल्लेख है। इस तालिका में कल्हण का नाम नही है। यद्यपि कल्हण ने अलंकार एवं मंख दोनों का नाम सादर लिया है। मंख ने कल्याण के सन्दर्भ में तीन पद लिखे हैं। उसमें उल्लेख किया गया है कि अलक दत्त ने कवि के रूप में कल्याण को चुना था। वह उसके मनोवाञ्छित कार्य को पूरा कर सकता था। उसने पुनः लिखा है कल्याण की कविता महाकवि विल्हण की प्रतिबिम्ब प्रतीत होती है। राजतरंगिणी सन् ११४६-११५० ई० में समाप्त हुई थी। श्रीकण्ठ- चरित सन् ११४४ ई० में समाप्त हुआ था। अतएव श्रीकण्ठचरित में राजतरंगिणी का उल्लेख नहीं हो सकता। मंख के श्रीकण्ठचरित का इसलिए उल्लेख राजतरंगिणी में है कि वह उस समय लिखी जा चुकी थी। उपलब्ध थी।