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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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गंजाधिप अलंकार का मंख भ्राता था। मंख ने अपने काव्य में अपने भाई को विद्वानों तथा कलाविदों का संरक्षक कहा है। मंख का केवल एक बार उल्लेख कल्हण ने किया है। यह भी श्रीकण्ठचरित काव्य के रचनाकार के रूप में । ( रा० ८: ३३५४ ) कल्हण ने द्वारपति उदय का भी उल्लेख किया है। किन्तु उसके प्रति विशेष आदर प्रकट नही करता। एक व्यक्ति का नाम उसने और आदर के साथ लिया है। उसका नाम है, राज वदन । ( ग० ८ : २६९८ ) राज वदन ने राजा जयसिंह के विरुद्ध विद्रोह किया था। अन्य नामों का भी उसने उल्लेख किया है, परन्तु उनका विशेष महत्व नही है। कल्हण और मंख : तत्कालीन लेखकों में कल्हण का उल्लेख केवल मंख ने कल्याण नाम से किया है। जबकि कल्हण ने 'मंख' शुद्ध और प्रचलित नाम लिखा है। यह एक विचित्र बात है। लेखकों, कवियों तथा विद्वानों का उनके जीवन-काल में कम आदर-सत्कार देखा गया है। कल्हण इसका अपवाद नहीं था। डाक्टर व्हूलर के अनुसार मंख ने श्रीकण्ठचरित महाकाव्य की रचना सन् ११२८-११४४ ई० के मध्यवर्ती काल में किया था। सन् ११४४ ई० के दो प्रमाणों से निश्चित हो जाता है। अलंकार के निवास- स्थान पर एक सभा हुई थी। अतिथियों में कन्नौज के राजा गोविन्द चन्द्र का दूत सुहले भी उपस्थित था। राजा गोविन्द चन्द्र का काल सन् ११२०-११४४ ई० है। कल्हण ने अलंकार का उल्लेख दो स्थानों पर राज स्थानीय पदाधिकारी के रूप में किया है। ( रा० ८ : २५५७, २६१८ ) उसने अलंकार का उल्लेख पुनः बृहद्गंज के रूप में किया है। (रा० ८ : २४२३ ) मंख ने भ्राता अलंकार को राज्य का सन्धि-विग्राहक लिखा है। इससे कोई उलझन नही पैदा होती। मंख ने स्वयं लिखा है। राजा सुस्सल ने अलंकार को सन्धि विग्राहक पद पर रखा था। उसका द्वितीय पद 'स्थानीय' तथा 'बृहद् गंज' राजा जयसिंह के काल का हो सकता है। कल्हण स्वयं लिखता है। मंख ने अपने भाई अलंकार के सन्धि विग्राहक पद को प्राप्त किया था। ( रा० : ८ : ३३५४ ) मंख ने जयसिंह को अपना राजा स्वीकार किया है। मंख ने कोंकन के राजा अपरादित्य का उल्लेख किया है। वह सन् ११८६ ई० तक राज्य करता रहा। इससे इस बात की पुष्टि होती है। काश्मीर के लेखकों को तत्कालीन भारतीय राजाओ एवं देश-काल का ज्ञान था। कल्हण का घटना-क्रम वर्णन एवं नामों का उल्लेख मंख के श्रीकण्ठचरित से मिलता है। वह कल्हण की सत्यता प्रमाणित करता है। यदि सन् ११४४ ई० श्रीकण्ठचरित की रचना का काल मान लिया जाय तो राजतरंगिणी की रचना के पूर्व मंख अपना महाकाव्य समाप्त कर चुका था। श्रीकण्ठचरित में मुख्यतः पच्चीसवाँ अध्याय उच्चकोटि की काव्य रचना है। मंख अपने भाई अलंकार के निवास-स्थान पर हुई सभा का उल्लेख करता है। उस सभा में उसने अपने काव्य को विद्वानों के सम्मुख उपस्थित किया था। उपस्थित व्यक्तियों तथा विद्वानों का परिचय उनके पदो के साथ दिया है। उसमें ३० कवियों एवं विद्वानों का उल्लेख है। इस तालिका में कल्हण का नाम नही है। यद्यपि कल्हण ने अलंकार एवं मंख दोनों का नाम सादर लिया है। मंख ने कल्याण के सन्दर्भ में तीन पद लिखे हैं। उसमें उल्लेख किया गया है कि अलक दत्त ने कवि के रूप में कल्याण को चुना था। वह उसके मनोवाञ्छित कार्य को पूरा कर सकता था। उसने पुनः लिखा है कल्याण की कविता महाकवि विल्हण की प्रतिबिम्ब प्रतीत होती है। राजतरंगिणी सन् ११४६-११५० ई० में समाप्त हुई थी। श्रीकण्ठ- चरित सन् ११४४ ई० में समाप्त हुआ था। अतएव श्रीकण्ठचरित में राजतरंगिणी का उल्लेख नहीं हो सकता। मंख के श्रीकण्ठचरित का इसलिए उल्लेख राजतरंगिणी में है कि वह उस समय लिखी जा चुकी थी। उपलब्ध थी।

[ ९ ] कल्हण और कल्याण : द्वितीय राज तरंगिणी के रचनाकार जोन राज ने मंख के श्रीकण्ठ चरित पर बातिक लिखा है । उसने लिखा है अलक दत्त कल्याण का संरक्षक था । वह सन्धिविग्राहक के पद पर था । किन्तु कल्याण के विषय में जोन राज कुछ प्रकाश नहीं डालता । उसने भाष्य किंवा वातिक लिखते समय यह नहीं लिखा है कि मंख वर्णित कल्याण ही कल्हण है । जोन राज अपनी रचना में कल्हण का उल्लेख करता है । कल्हण के छोड़े कार्य को वह अपने समय तक के राजाओं एवं बादशाहों का वर्णन कर पूरा करता है । आश्चर्य है उसने मंख एवं स्वतः वर्णित कल्याण को कहीं कल्हण नहीं माना है । कल्हण ही मंख वर्णित कल्याण है ? अथवा और कोई व्यक्ति है ? इस पर विचार करना आवश्यक है । श्री स्टीन का मत है कि कल्हण शब्द प्राकृत 'कल्लाण' तथा 'संस्कृत' 'कल्याण' का अपभ्रंश है । स्टीन अपने मत की पुष्टि में जयापीड की रानी का उदाहरण उपस्थित करते हैं । जयापीड की रानी का नाम 'कल्याण' देवी था । 'कल्याण', 'कल्लणा' तथा 'कल्हणिका' एक ही शब्द किंवा नाम के भिन्न रूप हैं । 'कल्हणिका' शब्द संस्कृत 'कल्याणिका' है । राजवंश एवं अभिजात कुल की महिलाओं के लिये नाटकों तथा उपाख्यानों में इस शब्द का प्रयोग किया गया है । राजवंश की स्त्रियां राजा कलश तथा जयसिंह के समय तक इसी सम्बोधन से सम्बोधित की जाती थीं । संस्कृत नाटकों तथा काव्यों में सम्भ्रान्त महिलाओं तथा रानियों के लिये 'कल्याणी' शब्द का प्रयोग सम्बोधन के लिये किया जाता रहा है । ( रा० ४:४६१, ४६७, ७:२६३, ८:१६४८, ३०६९ ) कल्हण ने स्वयं राज तरंगिणी में सहदेव के राजपुत्र कल्हण का उल्लेख किया है । ( रा० ८ : ६२६ ) इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कल्हण नाम उस समय प्रचलित था । लोगों का नाम कल्हण रखा जाता था । सल्हण, रल्हण, विल्हण, मल्हण आदि नाम तुल्य ध्वनि करते हैं । प्रश्न है । मंख ने प्रचलित नाम कल्हण न देकर उसका शुद्ध संस्कृत अप्रचलित नाम 'कल्याण' क्यों दिया ? कल्हण ने स्वतः कहीं भी अपने कल्याण नाम की ओर गौण रूप से भी संकेत नहीं किया है । मंख ने राजतरंगिणी में वर्णित अनेक नामों को अक्षरशः रूप अपने काव्य में दिया है । क्या कारण है कि कल्हण का नाम ही बदलकर उसने कल्याण क्यों लिख दिया ? आदर के लिये कल्हण का शुद्ध संस्कृत नाम कल्याण मंख ने दिया है । यह एक तर्क उपस्थित किया जाता है । कल्हण ने राजतरंगिणी में सर्वथा प्रचलित नाम दिया है । शुद्ध संस्कृत रूप में नाम देने का प्रयास नहीं किया है । कल्हण ने प्रचलित नाम 'गग्ग' 'गर्ग' के स्थान पर 'गगन चन्द्र' देने का प्रयास नहीं किया है । उसने व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप को परिवर्तित करने का प्रयास नहीं किया है । ( रा० ८ : ३३, ३८, ४३, १८४, १९६, ३४८, ३७६, ३८०, ३९०, ४१५, ४३०, ५०२, ५१५, ५८१, ५६५, ६०५, ६१५, ३४४४ ) दूसरा उदाहरण 'लोठन' नाम है । कल्हण ने 'लोठन', 'लोठक' आदि प्रचलित अपभ्रंश शब्दों का प्रयोग किया है । उसने शुद्ध 'लोष्ठक' शब्द नहीं दिया है । 'लोष्ठक' शब्द का प्रयोग एक स्थान पर किया है । ( रा० ८ : २०२ ) मंख का वर्णित कल्याण ही कल्हण है इस पर और अनुसन्धान की आवश्यकता है । श्री जोनराज का कल्याण शब्द के साथ कल्हण न लिखना, शान्त रह जाना, जबकि वह स्वयं कल्हण के छोड़े कार्य को पूर्ण कर रहा था विषय को सन्देहास्पद बना देता है । सम्भव है । मंख के समय कल्याण नाम का ही कोई कवि रहा हो जिसका ग्रन्थ लुप्त हो गया है । क्योकि जिस समय मंख ने अपना काव्य लिखकर समाप्त किया उसके ४ वर्ष पश्चात् कल्हण ने लिखना और ६ वर्ष पश्चात् रचना समाप्त किया २

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गंजाधिप अलंकार का मंख भ्राता था। मंख ने अपने काव्य में अपने भाई को विद्वानों तथा कलाविदों का संरक्षक कहा है। मंख का केवल एक बार उल्लेख कल्हण ने किया है। यह भी श्रीकण्ठचरित काव्य के रचनाकार के रूप मे। (रा० ८: ३३५४) कल्हण ने द्वारपति उदय का भी उल्लेख किया है। किन्तु उसके प्रति विशेष आदर प्रकट नही करता। एक व्यक्ति का नाम उसने और आदर के साथ लिया है। उसका नाम है, राज बदन। (रा० ८ : २६९८) राज बदन ने राजा जयसिंह के विरुद्ध विद्रोह किया था। अन्य नामों का भी उसने उल्लेख किया है, परन्तु उनका विशेष महत्व नही है। कल्हण और मंख : तत्कालीन लेखको में कल्हण का उल्लेख केवल मंख ने कल्याण नाम से किया है। जबकि कल्हण ने 'मंख' शुद्ध और प्रचलित नाम लिखा है। यह एक विचित्र बात है। लेखकों, कवियों तथा विद्वानो का उनके जीवन-काल में कम आदर-सत्कार देखा गया है। कल्हण इसका अपवाद नही था। डाक्टर बूह्लर के अनुसार मंख ने श्रीकण्ठचरित महाकाव्य की रचना सन् ११२८-११४४ ई० के मध्यवर्ती काल में किया था। सन् ११४४ ई० के दो प्रमाणो से निश्चित हो जाता है। अलंकार के निवास- स्थान पर एक सभा हुई थी। अतिथियों में कन्नौज के राजा गोविन्द चन्द्र का दूत सुहले भी उपस्थित था। राजा गोविन्द चन्द्र का काल सन् ११२०-११४४ ई० है। कल्हण ने अलंकार का उल्लेख दो स्थानों पर राज स्थानीय पदाधिकारी के रूप में किया है। (रा० ८ : २५५७, २६१८) उसने अलंकार का उल्लेख पुनः वृहदगंज के रूप में किया है। (रा० ८ : २४२३) मंख ने भ्राता अलंकार को राज्य का सन्धि-विग्राहक लिखा है। इससे कोई उलझन नहीं पैदा होती। मंख ने स्वयं लिखा है। राजा सुस्सल ने अलंकार को सन्धि विग्राहक पद पर रखा था। उसका द्वितीय पद 'स्थानीय' तथा 'बृहद् गंज' राजा जयसिंह के काल का हो सकता है। कल्हण स्वयं लिखता है। मंख ने अपने भाई अलंकार के सन्धि विग्राहक पद को प्राप्त किया था। (रा० : ८ : ३३५४) मंख ने जयसिंह को अपना राजा स्वीकार किया है। मंख ने कोंकन के राजा अपरादित्य का उल्लेख किया है। यह सन् ११८४ ई० तक राज्य करता रहा। इससे इस बात की पुष्टि होती है। काश्मीर के लेखकों को तत्कालीन भारतीय राजाओं एवं देश-काल का ज्ञान था। कल्हण का घटना-क्रम वर्णन एवं नामों का उल्लेख मंख के श्रीकण्ठचरित से मिलता है। यह कल्हण की सत्यता प्रमाणित करता है। यदि सन् ११४४ ई० श्रीकण्ठचरित की रचना का काल मान लिया जाय तो राजतरंगिणी की रचना के पूर्व मंख अपना महाकाव्य समाप्त कर चुका था। श्रीकण्ठचरित में मुख्यतः पच्चीसवाँ अध्याय उच्चकोटि की काव्य रचना है। मंख अपने भाई अलंकार के निवास-स्थान पर हुई सभा का उल्लेख करता है। उस सभा में उसने अपने काव्य को विद्वानों के सम्मुख उपस्थित किया था। उपस्थित व्यक्तियों तथा विद्वानों का परिचय उनके पदों के साथ दिया है। उसमें ३० कवियों एवं विद्वानो का उल्लेख है। इस तालिका में कल्हण का नाम नहीं है। यद्यपि कल्हण ने अलंकार एवं मंख दोनों का नाम सादर लिया है। मंख ने कल्याण के सन्दर्भ में तीन पद लिखे हैं। उसमें उल्लेख किया गया है कि अलक दत्त ने कवि के रूप में कल्याण को चुना था। वह उसके मनोवाञ्छित कार्य को पूरा कर सकता था। उसने पुनः लिखा है कल्याण की कविता महाकवि विह्लण की प्रतिबिम्ब प्रतीत होती है। राजतरंगिणी सन् ११४६-११५० ई० में समाप्त हुई थी। श्रीकण्ठ- चरित सन् ११४४ ई० में समाप्त हुआ था। अतएव श्रीकण्ठचरित में राजतरंगिणी का उल्लेख नहीं हो सकता। मंख के श्रीकण्ठचरित का इसलिए उल्लेख राजतरंगिणी में है कि वह उस समय लिखी जा चुकी थी। उपलब्ध थी।

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कल्हण और कल्याण : द्वितीय राज तरंगिणी के रचनाकार जोन राज ने मंख के श्रीकण्ठ चरित पर वार्तिक लिखा है । उसने लिखा है अलक दत्त कल्याण का संरक्षक था । वह सन्धि विग्राहक के पद पर था । किन्तु कल्याण के विषय में जोन राज कुछ प्रकाश नहीं डालता । उसने भाष्य किंवा वार्तिक लिखते समय यह नहीं लिखा है कि मंख वर्णित कल्याण ही कल्हण है । जोन राज अपनी रचना में कल्हण का उल्लेख करता है । कल्हण के छोड़े कार्य को वह अपने समय तक के राजाओं एवं बादशाहों का वर्णन कर पूरा करता है । आश्चर्य है उसने मंख एवं स्वतः वर्णित कल्याण को कहीं कल्हण नहीं माना है । कल्हण ही मंख वर्णित कल्याण है ? अथवा और कोई व्यक्ति है ? इस पर विचार करना आवश्यक है । श्री स्टीन का मत है कि कल्हण शब्द प्राकृत 'कल्लाण' तथा 'संस्कृत' 'कल्याण' का अपभ्रंश है । स्टीन अपने मत की पुष्टि में जयापीड की रानी का उदाहरण उपस्थित करते हैं । जयापीड की रानी का नाम 'कल्याण' देवी था । 'कल्याण', 'कल्लणा' तथा 'कल्हणिका' एक ही शब्द किंवा नाम के भिन्न रूप हैं । 'कल्हणिका' शब्द संस्कृत 'कल्याणिका' है । राजवंश एवं अभिजात कुल की महिलाओं के लिये नाटकों तथा उपाख्यानों में इस शब्द का प्रयोग किया गया है । राजवंश की स्त्रियाँ राजा कलश तथा जयसिंह के समय तक इसी सम्बोधन से सम्बोधित की जाती थीं । संस्कृत नाटकों तथा काव्यों में सम्भ्रान्त महिलाओं तथा रानियों के लिये 'कल्याणी' शब्द का प्रयोग सम्बोधन के लिये किया जाता रहा है । (रा० ४:४६१, ४६७, ७:२६३, ८:१६४८, ३०६९) कल्हण ने स्वयं राज तरंगिणी में सहदेव के राजपुत्र कल्हण का उल्लेख किया है । (रा० ८ : ६२६) इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कल्हण नाम उस समय प्रचलित था । लोगों का नाम कल्हण रखा जाता था । सल्हण, रल्हण, विल्हण, मल्हण आदि नाम तुल्य ध्वनि करते हैं । प्रश्न है । मंख ने प्रचलित नाम कल्हण न देकर उसका शुद्ध संस्कृत अप्रचलित नाम 'कल्याण' क्यों दिया ? कल्हण ने स्वतः कहीं भी अपने कल्याण नाम की ओर गौण रूप से भी संकेत नहीं किया है । मंख ने राजतरंगिणी में वर्णित अनेक नामों को अक्षरशः रूप अपने काव्य में दिया है । क्या कारण है कि कल्हण का नाम ही बदलकर उसने कल्याण क्यों लिख दिया ? आदर के लिये कल्हण का शुद्ध संस्कृत नाम कल्याण मंख ने दिया है। यह एक तर्क उपस्थित किया जाता है । कल्हण ने राजतरंगिणी में सर्वदा प्रचलित नाम दिया है । शुद्ध संस्कृत रूप में नाम देने का प्रयास नहीं किया है । कल्हण ने प्रचलित नाम 'गग' 'गर्ग' के स्थान पर 'गगन चन्द्र' देने का प्रयास नहीं किया है । उसने व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप को परिवर्तित करने का प्रयास नहीं किया है । (रा० ८ : ३३, ३८, ४३, १८२, १९६, ३४८, ३७६, ३८०, ३९०, ४१५, ४३०, ५०२, ५१५, ५८१, ५६४, ६०५, ६१५, १४४४) दूसरा उदाहरण 'लोठन' नाम है । कल्हण ने 'लोठन', 'लोठक' आदि प्रचलित अपभ्रंश शब्दों का प्रयोग किया है । उसने शुद्ध 'लोष्टक' शब्द नहीं दिया है । 'लोष्टक' शब्द का प्रयोग एक स्थान पर किया है । (रा० ८ : २०२) मंख का वर्णित कल्याण ही कल्हण है इस पर और अनुसन्धान की आवश्यकता है । श्री जोनराज का कल्याण शब्द के साथ कल्हण न लिखना, शान्त रह जाना, जबकि वह स्वयं कल्हण के छोड़े कार्य को पूर्ण कर रहा था विषय को सन्देहास्पद बना देता है । सम्भव है । मंख के समय कल्याण नाम का ही कोई कवि रहा हो जिसका ग्रन्थ लुप्त हो गया है । क्योंकि जिस समय मंख ने अपना काव्य लिखकर समाप्त किया उसके ४ वर्ष पश्चात् कल्हण ने लिखना और ६ वर्ष पश्चात् रचना समाप्त किया २

था। कल्याण चाहे कल्हण हो या नहीं कल्हण की ऐतिहासिकता जोनराज, श्रीवर, शुक आदि राजतरंगिणी- कारों के कारण प्रमाणित है। यह ऐतिहासिक व्यक्ति है। कल्हण वंशज : कल्हण की ख्याति राजतरंगिणी लेखक के रूप में दिन पर दिन बढ़ती गयी। काश्मीर में दूसरे इतिहास के अभाव में कल्हण का एकमात्र इतिहास शेष रह गया था। अतएव हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ने कल्हण के इतिहास का अध्ययन किया। इस अध्ययन के कारण उसकी ख्याति बढ़ती गयी। उसके वंशजों का नाम 'काल्हण' तथा 'कल्हणेय' पड़ गया। जोनराज ने उसके वंशजों को 'कल्हण नन्दन' लिखा है। (जो० रा० ९४)। जोनराज ने उसके वंशजों को पुनः 'काल्हणीन' लिखा है। (जो० रा० ६६)। इसका पाठभेद 'काल्हणान' तथा 'कल्हणीन' भो मिलता है। (जो० रा० १०१)। जोनराज ने 'काल्हण' तथा 'कल्हणात्मजे' शब्द का प्रयोग उसके वंशजों के लिए किया है। (जो० रा० १०२) श्रीवर ने 'कल्हण' शब्द का प्रयोग किया है। (जैन० राज : २ : १४९) अन्य स्थानों पर कल्हण के सम्बन्ध में और उल्लेख नहीं मिल सका है। अध्ययन : कल्हण पुरातन शैली का विद्वान् था। उसका पठन-पाठन अभिजात कुलीन ब्राह्मण बालक के समान हुआ था। उसने महाभारत और रामायण की घटनाओं का अत्यधिक उल्लेख किया है। दोनों ग्रन्थों के कथानकों का प्रचुर वर्णन राजतरंगिणी में मिलता है। उनकी घटनाओं की तुलना राज- तरंगिणी की घटनाओं से किया है। कल्हण ने पुराण विशेषकर नन्दी और नीलमत पुराण का अध्ययन किया था। उसने कालिदास के रघुवंश, मेघदूत, बाण के हर्ष चरित, तथा वराह मिहिर के बृहद् संहिता का अध्ययन किया था। वेद, योग वाशिष्ठ रामायण और विष्णु धर्मोत्तर पुराण भी पढ़ा था। पुरानी शैली के पण्डित किंवा ब्राह्मण ज्योतिष, वेद, पुराण, इतिहास, व्याकरण, साहित्य, अर्थशास्त्र, स्मृति, आयुर्वेद का एक साथ अध्ययन करते थे। कल्हण ने स्मर शास्त्र, कामशास्त्र, कुट्टनीमतम् तथा भरत के नाट्य शास्त्र का अध्ययन किया था। उसने विज्ञान का भी अध्ययन किया था। उसने सूर्य ज्योति (रा० ३ : ४९२) तथा जल (रा० ३ : २०२) का वर्णन एक वैज्ञानिक की तरह किया है। कल्हण सर्वतन्त्र स्वतन्त्र विद्वान् था। इस प्रकार के विद्वानों को यह उपाधि दी जाने लगी थी। ज्योतिष का उसने ज्ञान प्रकट किया है। उसने हर्ष की कुण्डली भी राजतरंगिणी में दे दिया है। उसके ग्रहों की तुलना धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन से करता है। उसके लेख से प्रकट होता है उसने पतंजलि के महाभाष्य का विशद अध्ययन किया था। चान्द्र व्याकरण भी उसने पढ़ा था। रस, छंद, अलंकार आदि के समस्त अंगो में पारंगत था। (रा० २ : ८९, ३ : ४४०) बाण के हर्ष चरित का उसने अध्ययन ही नही किया था बल्कि उसके २६ श्लोकों का उद्धरण राजतरंगिणी में दिया है। राजतरंगिणी लेखन में वह बाण के हर्षचरित तथा विल्हण के दशकुमार चरित से अत्यधिक प्रभावित था। कल्हण ने लौकिक रीति-रिवाज, संस्कार, कुसंस्कार, अन्धविश्वास, जनश्रुतियों, परम्परा, शुभ- अशुभ, शकुन-अपशकुन, आदि का उल्लेख प्रसंग आते ही किया है। उसकी प्रतिभा सर्वतोमुखी थी। उसने शुभाशुभ लक्षणों से, शकुन-अपशकुन से भविष्य की घटनाओं की ओर संकेत किया है। इस प्रकार प्रकट होता है, उसे फलित ज्योतिष का गहन अध्ययन था। दैव विद् तुल्य उसकी लेखनी चली है। (रा० २ : १४९; १ : ५५; ७ : १७२०; ८ : ७१५; ३ : ४३३ तथा ३ : ४४०)। कल्हण ने भवभूति एवं वाक्पति राज का उल्लेख आदर के साथ किया है। (रा० ४ : १४४) उसने इसी सन्दर्भ में यशो वर्मा का उल्लेख किया है जहाँ कवियों का आदर एवं सत्कार होता था।

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कल्हण का समय : कल्हण तथा राजतरंगिणी के समझने के लिए कल्हणकालीन परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक है । वह काल भारतीय तथा कश्मीर राजनीति में उथल-पथल का समय रहा है । लेखक पर उसकी परिस्थितियों, वातावरणों एवं घटना-क्रमो का जाने-अनजाने प्रभाव पड़ता रहता है । वह प्रभाव उसकी रचना में परिलक्षित होता है । राजतरंगिणी के रचना-काल से ४३६ वर्ष पूर्व सन् ७१२ ई० में सिन्ध पर प्रथम मुसलिम आक्रमण हो चुका था । मुहम्मदबिन कासिम मुलतान तक पहुँच गया था । सन् १००० ई० अर्थात् राजतरंगिणी के रचना-काल से १४८ वर्ष पूर्व महमूद गजनो का भारत पर आक्रमण हो चुका था । महमूद गजनी ने सन् १०१५ ई में कश्मीर पर आक्रमण किया था । सन् १०२६ ई० तक सोमनाथ पहुँच गया था । सन् १०३० ई० में अलबेरूनी स्पष्ट लिखता है 'मुसलिम आक्रमणों के कारण हिन्दू काश्मीर चले गए । उन दिनों वाराणसी तथा काश्मीर हिन्दू विद्या के सर्वश्रेष्ठ स्थान थे ।' ( पृष्ठ १७६-१७७ ) काश्मीर में विद्वानों का भाग कर आने का एक कारण और था । काशी अलप्तगीन के आक्रमण से लूटी जा चुकी थी । जीवन भयापन्न हो गया था । मन्दिर टूट चुके थे । विद्वानों ने काशी को सुरक्षित नही समझा, किन्तु काश्मीर में महमूद गजनी दो बार हार चुका था । काश्मीर में मुसलमानो का प्रवेश नही हो सका था । काश्मीर की उत्तरी एवं पश्चिमी सीमा पर मुसलिम राज्य स्थापित हो चुके थे । प्रबल हो गए थे । धर्म-प्रचार का उन्माद व्याप्त था । इसलाम की ताकत के सम्मुख जनता इसलाम कबूल कर अपने पुरातन बौद्ध तथा हिन्दू धर्म को परित्याग कर चुकी थी । तथापि अभी तक भारत पर मुसलिम राज नहीं स्थापित हो सका था । सन् १११४ ई० में कन्नौज में गहड़वाल राजाओं का राज था । सन् ११४८ ई० तक सोलंकी राजा कुमार पाल शक्तिशाली था । महमूद गजनी एक आँधी की तरह आया और चला गया । सन् ११६२ ई० में अर्थात् राजतरंगिणी की रचना के ४४ वर्ष पश्चात् मुहम्मद गोरी ने भारत पर आक्रमण कर मुसलिम राज स्थापित किया । कल्हण के काल में भारत पर मुसलिम राज्य स्थापित नही हुआ था । परन्तु कल्हण ने तरंग ६ से ८ तक गौण रूप से मुसलिम प्रभाव का उल्लेख किया है । काश्मीर पर मुसलिम संस्कृति का प्रभाव पड़ने लगा था ( रा० ७ : ११४९ ) । भारत पर मुसलिम आक्रमण का परिणाम भयावह हुआ । धर्म तथा जीवन की रक्षा के लिए ब्राह्मण तथा विद्वान, नैपाल, काश्मीर तथा दक्षिण भारत भागने लगे । काश्मीर में उत्तर-पश्चिम भारत से पण्डितो का समूह पहुँच गया । वे अपने साथ ग्रन्थों का भण्डार लेते आये । उस समय काश्मीर मण्डल विद्वानों से भर गया था । मुसलिम आक्रमण की एक और प्रतिक्रिया हुई । गुरुकुल टूटने लगे । आश्रमों का लोप हो गया । वेद पूर्व काल में लिपिबद्ध नही थे । गुरुकुल तथा आश्रमों में वे स्मरण रखे जाते थे । उनको लुप्त होने से बचाने के लिए सर्वप्रथम काश्मीर में वे लिपिबद्ध किए गए । अलबेरूनी के अनुसार वे बारहवी शताब्दी में लिपिबद्ध किए गए थे । काश्मीरी ब्राह्मण तथा शुक ने लिखने तथा व्याख्या का कार्य किया था । ( पृष्ठ १०७ ; १ : १२६-१२७ ) बारहवी शताब्दी का पूर्वार्ध काश्मीर मे वंशानुगत संघर्षों, विद्रोहों, षड्यन्त्रों, क्रान्तियो एवं रक्त- रंजित घटनाओ का काल था । उनके कारण काश्मीर मंडल की प्रगति अवरुद्ध हो गयी थी । काश्मीर

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दुर्बल हो गया था। राजा हर्ष (सन् १०८९-११०१ ई०) के जीवन, उसके दुःखद अन्त, विश्वासघात, नैतिक पतन का जो चित्रण कल्हण ने किया है, उसे पढ़कर रोमाञ्च हो जाता है। जमीन्दार तथा जागीर- दारों के समान काश्मीर में कुलीन डामरो का एक वर्ग विशेष अस्तित्व में आ गया था। उनके रक्तरंजित कार्यों से भविष्य की चार शताब्दियाँ त्रस्त रही हैं। उच्चल तथा सुस्सल के नेतृत्व में डामरो ने राजा हर्ष को त्रस्त करना आरम्भ किया। हर्ष ने उनके कारण राज त्याग दिया। फिर भी उसकी क्रूरतापूर्वक हत्या की गई। उच्चल और सुस्सल ने काश्मीर राज्य को संघर्ष से बचाने के लिए परस्पर बाँट लिया। ज्येष्ठ भ्राता उच्चल काश्मीर तथा सुस्सल ने लोहर का राज लिया। उच्चल डामरो को परस्पर लड़ाता उनकी शक्ति क्षीण करने लगा। कुछ समय तक गर्गचन्द्र, जो लहर का सरदार था राजसूत्र हाथ में रखने में सफल रहा। उसका राज्यकाल (सन् ११०१- ११११ ई०) सर्वदा हर्ष के उत्तराधिकारी राज लोलुपो तथा भाई सुस्सल के भय के कारण संघर्ष मय रहता था। अन्ततोगत्वा अपने पदाधिकारियों के षड्यन्त्र का शिकार बन कर मार डाला गया। तत्पश्चात् रड्ड एक दिन के लिए राजा बन बैठा। (सन् ८-१२-११११ ई०) गर्ग चन्द्र विद्रोहियों को दबाकर शक्तिशाली हो गया। वह राजाओं को बनाने और बिगाड़ने वाला बन गया। (रा० ८: ४२५) सल्हण गर्ग चन्द्र की सहायता से राजा बन गया। इसके पश्चात् काश्मीर के अत्यन्त दुःखान्त रक्तपात पूर्ण इतिहास का अध्याय खुलता है। सुस्सल का भिक्षाचर आदि के साथ गृह युद्ध सन् १११२ से ११२८ ई०) तक चलता रहा। अन्त मे राजा जयसिंह सन् ११२८ ई० में राजा बनकर काश्मीर में शान्ति स्थापित करने में सफल हुआ। चम्पक, कनक तथा कल्हण का काल इन भयंकर परिस्थितियों में व्यतीत हुआ था। क्रान्तियों, रक्तपातों, अराजकताओ, गृह-कलहो, संघर्षों, राज विप्लवों मे काश्मीर भस्म हो रहा था। उसका सामा- जिक ढाँचा बिगड़ रहा था। वैदिक, सनातन, पौराणिक, बौद्ध धर्मों के स्थान पर तन्त्रो का प्राबल्य हो रहा था। काश्मीर मण्डल स्वतः विघटित हो रहा था। इन सबका प्रभाव कल्हण पर पड़ना स्वाभाविक था। राज्य प्रासादीय षड्यन्त्र, अकाल, जलप्लावन, अग्निदाह, जनपीड़ा, मूर्तियों-मन्दिरों, विहारों का नाश करना आदि दुःखद घटनायें कल्हण को दुःखित कर रही थी। वह स्वयं कुछ कर नही सकता था। परिस्थितियाँ उसे एकाकी बना दी थी। वह अपने देश की भयावह परिस्थितियो से दुःखी था। उसने अपना समय काटने, कुछ करने, अपने देशवासियों के चरित्र को उठाने तथा राजाओ को शिक्षा देने लिए काव्य को साधन बनाया। उसी साधन का फल राजतरंगिणी है। उसमें उस काल की झलक मिलती है। कवि कल्हण की मानसिक वेदनाओं का उसके पदो में दर्शन मिलता है। राजतरंगिणी तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्थितियों का सजीव चित्रण है। यह चित्रण सप्रमाण है। सत्य है। विषम परिस्थितियों, मानवीय दुर्बलताओ, घृणास्पद कर्मों को देखकर कल्हण की भाषा उपदेशात्मक हो गयी। परिस्थितियो ने उसमें नैराश्य एव विराग उत्पन्न कर दिया था। जयसिंह के काल में स्थिति अधिक सुधरी नही। द्वेष बीज अंकुरित होता गया। वह अंकुर ही कालान्तर में वृद्धि करता महान पादप बना। उस पादप का फल राजतरंगिणी की रचना है। हर्ष के पतन के कारण कल्हण का कुल प्रभावित हुआ था। राजा हर्ष के प्रिय पात्र उसके पिता तथा चाचा थे। हर्ष के विश्वासपात्र होने के कारण हर्ष के पश्चात् हुए अन्य राजाओ के प्रिय पात्र कल्हण,

उसके कुल के लोग नहीं हो सके । कुल का जीवन एकाकी हो गया था । कल्हण तथा उसके कुल का कोई व्यक्ति राज अनुग्रह प्राप्त दिखायी नहीं पड़ता । कल्हण के पूर्व तथा परकालीन वंशजों का आठवें तरंग में उल्लेख बिल्कुल नहीं मिलता । राजा जयसिंह के सुझाव पर कल्हण की लेखनी उठी थी, इसकी झलक कहीं नहीं मिलती । समुद्र-ज्ञान : कल्हण ने काश्मीर मण्डल तथा समीपवर्ती स्थानों का भ्रमण किया था। वह काश्मीर के कण-कण से परिचित था । उसका भौगोलिक ज्ञान अद्भुत है । जिस प्रकार उसने भूगोल उपस्थित किया है, उससे प्रतीत होता है कि उसने भारत का भ्रमण किया था। समुद्र तट तक पहुँचा था। उसने समुद्र का जो वर्णन उपस्थित किया है, उसे बिना समुद्र देखे, कोई कवि केवल पुस्तक-ज्ञान से नहीं लिख सकता । ताल वृन्त, नारियल वृक्ष की छाया, डाभ, आदि का पान, अनेक बातें ऐसी हैं, जिनसे प्रकट होता है कि इतिहास लिखने के पूर्व उसने इतिहास-सामग्री एकत्रित करने के लिए भारत-भ्रमण किया था । आधुनिक वैज्ञानिकों के समान कल्हण पृथ्वी को समुद्र मेखला धारिणी लिखता है । पृथ्वी समुद्र से वेष्टित है। यह निर्विवाद है। कल्हण समुद्र की मर्यादा का उल्लेख करता है । यह बात समुद्र तटवर्ती निवासी या वहाँ गया पर्यटक ही समझ सकता है । (रा० १ : १५३, १ : २६६ ) कल्हण दक्षिण समुद्र, पश्चिम समुद्र, पूर्व समुद्र आदि (रा० ३ : ४७९, ४८०) तथा लवण समुद्र का उल्लेख करता है । भारत के. दक्षिण में भारतीय सागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिम में अरब सागर है । काश्मीर समुद्र से सहस्त्रों मील दूर पर्वत-मालाओं से वेष्टित है । कल्हण ऐसा सप्रमाण ऐतिहासिक ग्रन्थ विना भारत-भ्रमण, काश्मीर के राजाओं के दिग्विजय-मार्ग तथा उनके द्वारा विजित प्रदेशों को देखे नहीं लिख सकता था । मेघवाहन की सेना दक्षिण भारतीय समुद्र तट पर विश्राम कर रही थी । उस पार द्वीप था । (रा० ३ : ३०) यह स्थान रामेश्वरम् तथा धनुष्कोटि है । चारो धाम की यात्रा करना पुनीत कर्म माना गया है । पुरी, रामेश्वरम् तथा द्वारिका समुद्र तट पर है। कल्हण ने उत्कल किंवा कलिग, कर्नाट एवं सौराष्ट्र का उल्लेख किया है । वहाँ का वर्णन भी किया है। उसने या तो यात्रा अथवा ज्ञानार्जन के लिए भारत-भ्रमण किया था । वह काश्मीर से कन्नौज, काशी, गया होते पुरी, वहाँ से रामेश्वरम् और लौटते समय गोकर्ण, द्वारका सौराष्ट्र होता अवन्ति से उत्तरापथ में प्रवेश कर, काश्मीर लौटा होगा । कल्हण ने चार समुद्रो का उल्लेख किया है (रा० ४ : ३१०) सप्त-सिन्धु की पुरानी धारणा है। कल्हण ने उसे न मानकर शिव की चार भुजाओं की उपमा चार समुद्रो से दी है । आजकल पाँच महा समुद्रो की गणना की जाती है । प्राचीन काल में भी चार ही महा समुद्र की गणना की जाती थी । भारतीय सागर वाद का दिया गया नाम है । भारतीय सागर प्रशान्त तथा अटलांतिक के मध्य तथा अण्टार्कटिक के उत्तर में पड़ता है । यदि भारतीय समुद्र को उन समुद्रो का मध्यवर्ती स्थान मान ले तो कल्हण का वर्णन ठीक बैठता है । भारत महा- सागर को उसने दक्षिण सागर कहा है जो दक्षिण ध्रुव तक चला गया है । (रा० ३ : १२६) रघुवंश में कालिदास ने भी चार समुद्रों का ही उल्लेख किया है । राजा रणादित्य के सन्दर्भ में कल्हण ने चोल राजा रतिसेन को समुद्र की पूजा करते हुए चित्रित किया है । चोल राज्य सुदूर दक्षिण में पूर्वोय तथा मौराष्ट्र पश्चिमी समुद्रतट पर था । कल्हण का यह वर्णन सत्य है । (रा० ३ : १२६) भारत पर्यटन : काशी, कन्नौज, अवन्ति, मथुरा के अतिरिक्त और जिन स्थानों का कल्हण

[ १४ ] उल्लेख करता है, वे ठीक अपने स्थानों पर मिल जाते हैं। इनमें गलती नहीं हो सकी है। उसके वर्णनों से उनका ठीक पता लग जाता है । कल्हण का महत्वपूर्ण योगदान पुरातन भूपरिचय वर्णन है । पुराण, महाभारत, रामायण एवं कल्हण की वर्णन-शैली में अन्तर है । पुराण केवल नामों का उल्लेख कर छोड़ देते हैं । उनका भौगोलिक परिचय नहीं देते । महाभारत तथा रामायण कहीं-कहीं दिशाओ का भी संकेत करते हैं । यह संकेत रामा- यण में मुख्यतः सुग्रीव के सम्वाद और महाभारत में रण अभियान एवं दिग्विजयो के सन्दर्भ में मिलता है। परन्तु कल्हण पता एक भौगोलिक की तरह देता है। भारतीय पुराकालीन लेखकों में कल्हण सबसे अधिक सच्चा भौगोलिक स्थिति का वर्णन करता है। भारत के क्षेत्रों का इस प्रकार सर्वांगीण ज्ञान किसी रचना- कार ने उपस्थित नहीं किया है। उसने सिन्धु तट, कालिन्दी पुलिन (रा० १ : ६०) का वास्तविक रूप प्रस्तुत किया है । कल्हण ने देशों का भी वर्णन किया है। जिन देशों तथा नगरों का उसने उल्लेख किया है, उनको सम्भवतः उसने यात्रा भी की थी। काश्मीर के अतिरिक्त शेष भारतवर्ष को उसने आर्य देश की संज्ञा दी है । गान्धार देश, त्रिगर्त देश (रा० ३ : १००) दर्वाभिसार (रा० १ : १८०) चोल, कर्णाट, लाट सीमान्त, दरद देश, भोट्ट, आदि का उल्लेख किया है। उसने सिंहल (रा : १ : २९४) लंका (रा : १ : २६८) प्राग् ज्योतिष (रा० २ . १५२) गौड़ बंगाल आदि का भी उल्लेख किया है। राजाओं में उसने कन्नौज नरेश यशोवर्मन्, सिंहल नरेश विभीषण, अवन्ति नरेश विक्रमादित्य, एवं प्राग ज्योतिषेन्द्र का वर्णन किया है। उसने चन्द्रभागा, गंगा, यमुना, नर्मदा का दर्शन तथा उनमें स्नान अवश्य किया था। इसी प्रकार उत्तर मानस की यात्रा की भी ध्वनि उसके लेख से निकलती है। ईक्षुरस तथा इक्षु में फल न होना वही जान सकता है, जिसने काश्मीर के बाहर जाकर उसका रसास्वादन किया होगा। (रा० : २ : ५८) दिग्विजय-स्थान निरूपण : कल्हण ने राजा जलोक मिहिर कुल, मेघ वाहन, प्रवरसेन, ललिता- दित्य के दिग्विजय का विस्तृत वर्णन किया है। जलोक ने कान्यकुब्ज अर्थात् कन्नोज विजय किया था । काश्मीर के बाहर श्रीकृष्ण के मथुरा तथा गान्धार में हुए संघर्षों के लगभग ग्यारह सौ वर्षों के पश्चात् प्रथम बार काश्मीरी सेना काश्मीर के बाहर निकली थी (रा १ : ११७, ३३६) । दूसरी बार काश्मीर से मिहिर कुल के नेतृत्व में दक्षिण समुद्र तक पहुँची थी । समुद्र तट से लौटते हुए उसने चोल, कर्णाट, लाट आदि देशो का अतिक्रमण किया था । तीसरे दिग्विजय का अभियान मेघवाहन ने किया था। मिहिर कुल के समान यह भी श्रीलंका समुद्र-तट तक पहुँचा था (रा : २७, ७२) । चौथों दिग्विजय प्रवर सेन ने किया था । अवन्ति में प्रवेश कर राजा विक्रमादित्य द्वारा अपहृत काश्मीर का राज सिंहासन पुनः लौटा लाया था । पाँचवी दिग्विजय ललितादित्य ने किया था। उसने वाक्पति राजा एवं भवभूति सेवित कन्नौजपति यशोवर्मन् को जीता था। कन्नौज के दक्षिण में प्रवाहित एवं गंगा से मिलने वाली कालिका नदी और यमुना के मध्यवर्ती भूखण्ड को घर के प्रांगण सदृश बना लिया था। (रा० ४ . १४४, १४६) यह भौगोलिक वर्णन सत्य है । अनन्तर वह कलिंग, गौड, कर्नाटक पहुँचता है। इस स्थल पर कल्हण ने 'दक्षिणापथ' शब्द का उल्लेख किया है। पुरातन काल से दक्षिणापथ से जिन क्षेत्रों का सम्बोधन होता था, उन्हें ही कल्हण ने लिखा है । ललितादित्य ने मलय पर्वत, कोकण, द्वारिका, अवन्ति के पश्चात उत्तरा पथ में प्रवेश किया था ।

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उत्तरा पथ का अर्थ उत्तरीय भारत प्राचीनकाल से लगाया जाता था। उत्तरा पथ के पश्चात् कम्बोज, तुखार, उत्तरकुरु, जालन्धर, लोहर आदि मार्गों का जो भौगोलिक वर्णन कल्हण उपस्थित करता है, वह प्रायः ठीक मिलता है। (रा० ४ : १३३-१८०) ललितादित्य के पश्चात् भारतीय राजाओं के लिये दिग्विजय के आदर्श का पालन संभव नही रहा। कारण स्पष्ट है। इसके काल के पश्चात् मुस्लिम शक्ति प्रबल होने लगी थी। भारत की सीमा पर उनके राज्य स्थापित हो गये थे। उन्हीं का भारत पर आक्रमण होने लगा था। इसके पश्चात् काश्मीर ही नही समस्त भारत की राजनीति का लक्ष्य प्रमुखतः रक्षात्मक हो जाता है। कल्हण ने राजाओ के दिग्विजय मार्ग एवं यात्राओ के जो उल्लेख किये हैं वे वर्तमान भौगोलिक वर्णनो से साधारणतया मिलते हैं। यह इसलिये भी महत्त्व की बात है कि उन दिनों मानचित्र वर्तमान काल की तरह उपलब्ध नहीं थे। देश का सर्वेक्षण नही किया गया था। केवल जनश्रुति तथा परम्परा के आधार पर कार्य किया जाता था। इसका समर्थन अल्बेरूनी के लेखों से भी मिलता है। उसने कल्हण के रचना काल से ११८ वर्ष पूर्व काश्मीर के मार्गों का वर्णन किया है। उससे प्रकट होता है कि काश्मीर का सम्बन्ध समस्त भारत से था। अल्बेरूनी के अनुसार एक मार्ग कन्नोज से काश्मीर जाता था। दूसरा मार्ग कन्नोज से पानीपत, अटक काबुल होता, गजनी पहुँचता था। तीसरा मार्ग बब्बहान से अधिष्ठान (पुराधिष्ठान) काश्मीर पहुँचता था। चौथा मार्ग कन्नोज, शिरशारह, दहमाल (जालन्धर की राजधानी) बल्लावर होता लद्द अर्थात् लिदर घाटी काश्मीर पहुँचता था। काश्मीर का उन दिनों इतना महत्त्व था कि उसका सम्बन्ध समस्त भारत से था। अतएव इस अनुमान में तथ्य है कि कल्हण ने भारत-भ्रमण तथा समुद्र-तट की यात्रा की थी। अन्यथा इस प्रकार का वर्णन करना केवल ग्रन्थो के आधार पर सम्भव नही था। काश्मीर का भौगोलिक वर्णन : कल्हण ने काश्मीर का स्थान निरूपण किया है। भूपरिचय दिया है, पर्वतो, नदियों, स्रोतस्विनियो, कुल्याओं, भागों, सरों, वनो, क्षेत्रों, तीर्थ-स्थानों का वर्णन सच्चाई के साथ किया है। पर्वतों में, अन्तर्गृही, बहिर्गिरी, हिमालय ओर लोका लोक का उल्लेख किया है। (रा० १ : १३७) उसने काश्मीर की जलवायु (रा० १ : ४०-४२) तीर्थों में भेदा देवी, पाप सूदन, स्वयंभू, (रा० १ : १३६) सन्ध्या देवी, शारदा, सोदर (रा० १ : १३४) चीर मोचन (रा० १ : १४९) नन्द शिला (रा० ३ : ४६७) तथा अरिष्टो सादन (रा० ३ : ४८२) का उल्लेख कर उनके स्थानों का निश्चित पता दिया है। क्षेत्रो में नन्दि क्षेत्र, (रा० १ : ११३), विजय क्षेत्र (रा० १ : २७५) तथा इष्टिका पथ (रा० ३ : ४६७) तथा सुरेश्वरी क्षेत्र (रा० ५ : ४५४) का वर्णन किया है। यात्राओं में अमरेश्वर यात्रा (अमरनाथ) (रा० १ : २६७) नन्दि क्षेत्र यात्रा (रा० १ : ११३) तथा तक्षक नाग यात्रा (रा० १ : २२०-२२ १) का उल्लेख किया है। अटवी में रमण्याटवी, (रा० १-२६५) तथा वाक् पुष्टाटवी (रा० २ : ५७) का वर्णन किया है। सुश्रवा सरोवर (रा० १ : २०३) शेषनाग (रा० १ : २६१) जामातृसर (रा० १ : २६९) उल्लोल सर (रा० ४ : ५९३) उत्तरमानस (रा० ३ : ४) एवं सुरेश्वरी सर अर्थात् डललेक का उल्लेख किया है। नगरों में नरपुर (रा० १ : २४४) पुराधिष्ठान (रा० ३ : ६६) स्कन्दपुर (रा० १ : ३४०) पद्मपुर (रा० ४ : ६६५) । मन्दिरो में शत कपालेश, (रा० १ : ३३५) भूतेश, विजयेश,

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वर्धमानेश ( रा० २ : १२३ ) एवं ज्येष्ठेश आदि का उल्लेख करता है । ( रा० १ : १२४ ) अग्रहार : उसने अनेक अग्रहारों, विहारों, चैत्यो, शालाओ एवं स्तूपों का उल्लेख किया है । उनमें अधिकांश का पता लगाया जा चुका है । कल्हण उनके स्थानों का ठीक पता देता है । इससे पता चलता है कि कल्हण ने स्थानों की खोजकर उनकी तालिका बनायी थी । वे समस्त काश्मीर मण्डल में फैले थे । कल्हण ने तीन अग्रहारों का वर्गीकरण किया है । राजकीय अग्रहार ( रा० ३ : १०० ) द्विज परिषद् अग्रहार ( रा० १ : १८७ ) तथा व्यक्तिगत पुण्य कार्य के लिये किये गये अग्रहार । कुछ अग्रहार गान्धार देशीय तथा कुछ काश्मोरी ब्राह्मणो को दिये गये थे । राजा कनिष्क ने समस्त काश्मीर का दान कर दिया था । ( रा० १ : २५७ ) मिहिरकुल जैसे क्रूर राजा ने भी एक सहस्र अग्रहारों का दान किया था । ( रा० १ : ३१४ ) कल्हण ने तरंग १-३ में राजाओं द्वारा दिये गये अग्रहारों का उल्लेख किया है । राजा लव ने लेवार ( रा० १ : ८७ ), कुरु ने कुरुहार ( रा० १ : ८८ ), सुरेन्द्र ने सोनमृग, खागी ( रा० १ : ९० ) गोधर ने गोधर, हस्तिशाला, जालोर ( रा० १ : ९६ ) शचीनर ने समांगासा तथा सनार ( रा० १ : १०० ) जलोक ने वारवल ( रा० १ : १२१ ) अभिमन्यु ने कष्टकोत्स ( रा० १ : १७४ ) गोपादित्य ने खोल, रागिका, स्कन्दपुर समाजस ( रा० १ : ३४० ), तथा गोप ( रा० १ : ३४१ ) वश्चिक ( रा० १ : ३४३ ) रानी वाक्पुष्टा ने कनीमृग, रामुष ( रा० २ : ५५ ) तथा मेघवाहन ने मेघवन ( रा० ३ : ८ ) अग्रहार का दान किया था । विहार : राजाओं ने जितने अग्रहारो का दान इस काल में किया था, उससे कम विहारों की स्थापना नहीं की थी । इस काल मे सनातन धर्म तथा बौद्ध धर्म दोनों की मान्यतायें प्रायः समान थी । लोग दोनों धर्मों की बातें मानते थे । राजा सुरेन्द्र ने नरेन्द्र भवन विहार ( रा० १ : ९३ ) सौरस विहार ( रा० १ : ९४ ), जनक ने जालोर ( रा० १ : ९८ ), अशोक ने धर्मारण्य, ( रा० १ : १०३ ), जलोक ने कृत्योधम ( रा० १ : १०७ ), जुष्क ने जुष्कपुर ( रा० १ : १६९ ), अमृतप्रभा ने अमृत भवन विहार ( रा० ३ : ९ ), खादना रानी ने खादना .विहार ( रा० ३ : १४ ), सम्मा रानी ने सम्मा विहार ( रा० ३ : १४ ), रानी बिम्बा ने बिम्बा विहार ( रा० ३ : ४६४ ), गलून ने रत्नावली विहार ( रा० ३ : ४७६ ) निर्माण कराया था । इनके अतिरिक्त सहस्रों विहार काश्मीर में थे । इसी काल में अनेक राजाओं ने चैत्य एवं स्तूपों का भी निर्माण कराया था । अशोक ने शुष्कलेत्र तथा वितस्ताव में स्तूप निर्माण कराया था । ( रा० १ : १०२ ), रानी अमृत प्रभा ने स्तोन्पा स्तूप ( रा० ३ : १० ) तथा इन्द्र देवी ने इन्द्रभवन स्तूप का निर्माण कराया था । ( रा० ३ : १३ ) अशोक तथा कनिष्क ने स्तूपों तथा चैत्यों की श्रृंखलाओं से काश्मीर मण्डल को आच्छादित कर दिया था । चतुर्थ बौद्ध परिषद : सम्राट कनिष्क के समय में चतुर्थ होने का उल्लेख बौद्ध पर्यटकों तथा ग्रन्थों द्वारा मिलता है । थी । सम्पूर्ण त्रिपिटक को ताम्र-पत्रों पर लिपिबद्ध कर, माह हरवान के प्रसंग में करता है । परन्तु उसने इस ऐतिहा- है कि बौद्ध धर्म की मान्यता शनैः शनैः क्षीण होती .. । हाक्षादि भूल गये थे ।

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शाला, जनाश्रय, विद्यावेश्म : कल्हण ने आरोग्यशाला ( रा० ३ : ४६१ ) तथा जनाश्रय ( रा० ३ : ४८० ) का उल्लेख किया है । प्रथम वर्त्तमान काल के अस्पतालों तथा द्वितीय धर्मशालाओं के सदृश थे । चतुःशाला ( रा० ३ : १३ ) का भी उल्लेख किया गया है । उसका निर्माण बौद्ध संघ तथा भिक्षुओं के निवास हेतु किया गया था । बौद्ध उपासकों के लिए भी विहार बने थे । विद्यावेश्म आजकल के छात्रावास सहित विद्यालयों के समान थे । वहाँ विद्वानों, विद्यार्थियों के निवास के साथ पढ़ने तथा भोजनादि का प्रबन्ध था । मठ, अक्षयिणी, प्रतिष्ठान, सत्र : कल्हण ने मठों का उल्लेख बहुत किया है । साधु-सन्तों के लिए मठ-निर्माण किया जाता था । शुष्कलेत्र क्षेत्र में मठ ( रा० १ : १७० ), चतुःशाला मठ ( रा० १ : १९१ ) पाशुपत मठ ( रा० ३ : ४६० ) ब्रह्ममठ ( रा० ३ : ४७६ ) मध्यमठ ( रा० १ : ३०० ) सेरी मठ ( रा० १ : ३०० ) खेडा, भीया मठ ( रा० २ : १३५ ) मेध मठ ( रा० ३ : ४६० ) राजाओं द्वारा स्थापित किये गये थे । कालान्तर में मठ बनाने का प्रचलन बहुत हो गया था । दिद्दा मठ आदि अपने समय के प्रसिद्ध मठ थे । मठों के निर्माण का सम्बन्ध तृतीय तरंग तक केवल शैव सम्प्रदाय से था । कल्हण ब्रह्म मण्डप का रानी रण रम्भा द्वारा स्थापित होने का उल्लेख करता है । ( रा० ३ : ४५९ ) यह ब्रह्मविदों के लिए निर्माण किया गया था । राजा तथा धनी जन आप अक्षयिणी ( रा० १ : ३४७ ) प्रतिष्ठान ( रा० १ : ३४७ ) तथा सत्र ( रा० २ : ५८ ) पथिकों, यात्रियों तथा भूखों के लिए स्थापित कराते थे । जीर्णो- द्वार कराने का भी उल्लेख मिलता है । सम्राट् अशोक ने विजयेश्वर के नवीन पाषाण प्राकार का निर्माण कराया था । ( रा० १ : १०५ ), कल्हण ने यागोत्सव ( रा० १ : ३३१ ) तथा लिंग अर्चनोत्सव ( रा० २ : १३५ ) का उल्लेख किया है । नगर निर्माणानि : कल्हण काश्मीर के नगरों तथा ग्रामों का वर्णन कर उनके स्थानों का ठीक पता देता है । तरंग प्रथम से तीन तक कम-से-कम १७ नगर निर्माणों का उल्लेख किया गया है । राजा लव ने लोलोर ( रा० १ : ८६ ) सुरेन्द्र ने सोरक पत्तन, ( रा० १ : ९३ ) अशोक ने श्रीनगर ( रा० १ : १०४ ) जलोक ने उज्जट डिम्ब ( रा० १ : ११६ ) हुष्क ने हुष्कपुर, जुष्क ने जुष्कपुर, जय स्वामीपुर, ( रा० १ : १६९ ), सम्राट कनिष्क ने कनिष्कपुर ( रा० १ : १६८ ), अभिमन्यु ने अभिमन्युपुर, वितस्ता पुलिन में नगर ( रा० १ : १७५-२०२ ), हिरण्याक्ष ने हिरण्याक्षपुर ( रा० १ : २८७ ), मिहिर कुल ने हिरण्यपुर, मिहिरेश्वर ( रा० १ : ३०६ ), बक ने लवणोत्स ( रा० १ : ३२९ ), तुंजीन ने कतिका पत्तन, ( रा० २ : १४ ) विजय ने विजयेश्वर को नगर से घिरवाया था । ( रा० २ : ६२ ) । नगरों के लिए पुर तथा पत्तन शब्द समानार्थक हैं । तीनों शब्दों का प्रयोग कल्हण ने किया है । ग्रामों का भी उल्लेख किया गया है । उनके स्थानों का पता कल्हण के वर्णनों से मिल जाता है । राजा अक्ष ने अक्षबल ( रा० १ : ३३८ ) मेघ वाहन ने मयुष्ट ग्राम ( रा० ३ : ८ ) तथा भेडर ग्राम ( रा० ३ : ४८१ ) का दान किया था । मन्दिरों से काश्मीर मण्डल मण्डित था । प्रत्येक ग्राम तथा जनस्थान में मन्दिर थे । राजा अशोक ने अशोकेश्वर ( रा० १ : १०५ ), जलोक ने ज्येष्ठेश्वर भूतेश ( रा० १ : ४८), अभिमन्यु ने शशांक शेखर, ( रा० १ : १७५ ) मिहिर कुल ने मिहिरेश्वर ( रा० १ : ३०६ ), बक ने वकेश ( रा० १ : ३२६ ), गोपादित्य ने गोपाद्रि पर ज्येष्ठेश्वर, ( रा० १ : ३४१ ) गोकर्ण ने गोकर्णेश्वर ( रा० १ : ३४६ ), उग्र ने उग्रेश ( रा० १ : ३४८ ), तुंग ने तुंगेश्वर ( रा० २ : १४ ), सन्धिमति ने सन्धेश्वर, इष्टेश्वर ३

(रा० २ : १३४), रणादित्य ने माहेश्वर रणेश्वर (रा० : ३ : ४३९-३५४) रानी रणा रम्भा ने रणा स्वा (रा० ३ : ४५४), रानी अमृत प्रभा ने अमृतेश्वर (रा० ४६३) विक्रमादित्य ने विक्रमेडवर (रा० ३ ४७४) एवं उसकी रानी बिम्बा ने बिम्बेश्वर (रा० ३ : ४८२) का निर्माण कराया था। निर्माणकर्त्ताओं ने अपना नाम चिरस्थायी करने के लिए अपने नामों पर मन्दिरों का नाम रखा था। कुछ मन्दिरों के ध्वं सावशेष आज भी दिखायी पड़ते हैं। उनका यथास्थान वर्णन किया गया है। विष्णु मन्दिर : प्रथम तथा द्वितीय तरंग में किसी विष्णु मन्दिर के निर्माण का उल्लेख नहीं मिलता महाभारत काल किंवा लौकिक सम्वत् ६२८ से रणादित्य के काल लौकिक सम्वत् ३२९९ अर्थात् २६७ वर्षों तक विष्णु मन्दिर बनने अथवा पूजा का उल्लेख सार्वजनिक रूप में नहीं मिलता। तृतीय तरंग के अन्ति चरण में रानी रणारम्भा द्वारा विष्णु मन्दिर निर्माण का प्रथम उल्लेख मिलता है। विष्णु प्रतिमा का भी प्रथम बार उल्लेख यहीं किया गया है। (रा० ३ : ४४६) यह विष्णुपूजा एवं विष्णु मन्दिरों के निर्माण के इतिहास की ज्ञात बातों से सर्वथा सम्मत है। रानी रणा रम्भा दक्षिण समुद्र तट से काश्मीर में आयी थी। समुद्र तट पर गम के सेतुबन्ध, लंका विजय तथा रामायण की गाथायें अत्यधिक प्रचलित थी और आज भी हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया तक रामायण पहुँच चुकी थी। उसकी गाथायें लोकप्रिय हो गयी थीं। दक्षिण से सम्बन्धित होने के कारण ही रानी रणारम्भा विष्णुपूजा से प्रभावित थी। काश्मीर में विष्णु मन्दिर बना कर उसने अपनी रुचि तथा मत का परिचय दिया। शिवलिंग : कल्हण ने शिव मन्दिरों के साथ ही साथ शिव लिंगों की स्थापना का वर्णन किया है (रा० २ : १२८-१३२)। शिव लिंग के अतिरिक्त प्रतिमा लिंग की भी चर्चा कल्हण करता है। षेडा भेदा, (रा० २ : १३५) हिर्मालग (रा० २ : १३७) शैललिंग (रा० ३ : ४१९) रत्नलिंग (रा० ३ : ४४६) तथा प्रजापति पूजित लिंग (रा० ३ : ४४६) अर्चना का विस्तृत उल्लेख करता है। जातियों का ज्ञान : भारत भ्रमण काल, सीमावर्ती ज्ञान तथा भारत पर मुसलिम आक्रमण होने के कारण अनेक जातियों के काश्मीर में आ जाने के कारण उसमें कल्हण को जातियों के रीति-रिवाज, कर्म आदि का पर्याप्त ज्ञान हो गया था। जो जातियाँ महाभारत पुराण, रामायण में अलौकिक मालूम होती हैं वे वास्तव में मानव जातियाँ थीं। भारत निवासी थी। कल्हण ने इसे अपने उल्लेखों तथा उनके कर्मों से सिद्ध किया है। उनका चित्रण अलौकिक मानव की अपेक्षा चलते-फिरते साधारण जनों के समान दिया है। यक्ष, गन्धर्व, विद्यार, सिद्ध, गुह्यक, शबर किरात, राक्षस को पुरातन ग्रन्थकारों ने जाति लोकोत्तर मान लिया था। महाभारत ने अपने काल तक की ज्ञात जातियों का कल्हण ने उल्लेख किया है। (द्रष्टव्यः परिशिष्ट) दक्षिणा पथ के चोल, कर्णाट, कोंकण, लाट, सौराष्ट्र, जातियों का भी वर्णन किया है। (रा० १ : ३००, ३ : ४३२) कल्हण ने विशेष उल्लेख जमुना से गान्धार प्रदेश तथा काश्मीर की सीमान्त जातियों का दिया है। श्रीकृष्ण-गोनन्द युद्ध के सन्दर्भ में वृष्णि तथा यादवों का उल्लेख किया गया है। काश्मीर की उत्तर दिशा में गुह्यक, यक्ष तथा दरद थे। (रा० १५६, १५६, ३१२) दक्षिण दिशा में गान्धार, गदा एवं दूर्व थे। (रा० १ ६६, ३१७) पूर्व-उत्तर दिशा में भोट्ट थे। (रा० १ ३१२) पूर्व-दक्षिण दिशा में किन्नर थे। (रा० १ १९९) पश्चिम दिशा में यवन, म्लेच्छ एवं आयों के अतिरिक्त अन्य जातियाँ थीं। आर्य का अर्थ कल्हण ने हिन्दुओं से लगाया है। म्लेच्छों में मुसलमानों के साथ ही साथ अफगान, ईरान तथा तुर्किस्तान की जातियाँ थीं। (रा० १ : ३१२) किरात पर्वतीय जंगलों में रहने वाली जाति

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थे। (रा० ३ : ३९) राक्षस लंका निवासी थे। (रा० ३ : ७४) वे मनुष्यों जैसे थे। स्थापत्य एवं निर्माण कार्यों में चतुर थे। शबर (रा० ३ : ३३) तथा निशाचर (रा० ३ : ३९) जंगली थे। वे पौराणिक जातियाँ थीं। उनके स्थान तथा क्षेत्र विस्मृति-सागर में डूब गए हैं। पिशाच तथा नाग जातियाँ काश्मीर की मूल निवासी थीं। इसी प्रकार सिद्ध गणों (रा० ३ : ४५६) की भी एक जाति थी। खेचर (रा० ३ : ४५०) जाति का भी मालूम होता है पुराणों के आधार पर कल्हण ने वर्णन किया है। (रा० १ : ६३, ६६, ६७, १५३, १५९, १९९, २९८, ३००, ३१२, ३१७, २ : १६५) कल्हण ने बेकाल जाति का भी उल्लेख किया है। (रा० १ : ४८०) एक मत हैं। बंकाल शब्द बंगाल का अपभ्रंश है। धर्म : कल्हण कट्टरपंथी नहीं था। वह उदार था। सहिष्णु था। भारत के अन्य भागों के समान काश्मीर में भी सम्प्रदाय, मत-मतान्तरों तथा पूजा-पाठ की पूर्ण स्वतन्त्रता थी। भारत में बौद्धधर्म का लोप हो चुका था। परन्तु काश्मीर में उसकी मान्यता थी। शैव, वैष्णव, तान्त्रिक सभी बुद्ध को अवतार मानकर पूजा करते थे। बौद्धधर्म काश्मीर में तेरहवीं शताब्दी तक रहा। आज भी काश्मीर के एक सूबा लद्दाख का वह धर्म है। कवि क्षेमेन्द्र ने कल्हण के एक शताब्दी पूर्व बुद्ध को अवतार मानकर वन्दना किया था। काश्मीर की जनता शुद्ध वैदिक धर्म के स्थान पर मत-मतान्तरों-तन्त्रों के चक्कर में पड़ गयी थी। काश्मीर में शैव मत की प्रधानता थी। वह प्रधानता आज भी हिन्दू काश्मीरियों में सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है। कल्हण इन सबका अपवाद नहीं था। वह शिव एवं बुद्ध दोनों की वन्दना करता है। महाकवि होते हुए भी कल्हण पुरानी परम्परा का अनुकरण कर मंगलाचरणों में गणेश एवं सर- स्वती की वन्दना नहीं करता। तत्कालीन संस्कृत लेखकों की परम्परा को तोड़कर उसने अपनी मानसिक स्वतंत्रता के साथ प्रगतिशीलता का परिचय दिया है। शिव के उस रूप की वन्दना की है जो एकांगी नहीं है। केवल पुरुष या नारी मात्र नहीं है। केवल पुरुष एवं प्रकृति मात्र दार्शनिक शब्दों में नहीं है। वह पुरुष, प्रकृति, नर-नारी, पिता-माता दोनों का समन्वय है। अतएव वह अर्धनारीश्वर रूप है। अर्धनारीश्वर की कल्पना अद्भुत है। उसका दार्शनिक स्वरूप अत्यन्त भावोत्पादक है। आकर्षक है। सहृदयमय है। जो पुरुष एवं प्रकृति के रूप में जगत को चलाता है, सृजन का जो मूल स्रोत है, जहाँ संहार एवं लय होता है, साथ ही जो माता स्वरूप पार्वती है, पिता स्वरूप शिव हैं, जहाँ शिव का योग है, जहाँ देवी पार्वती का स्नेह है, जहाँ शिव त्रिभुवन गुरु हैं, पार्वती माता है; जहाँ वह शिवभक्ति का वर्णन करता है वहाँ उसकी आन्तरिक भावना, उसकी अटूट श्रद्धा अपनी पूर्ण गरिमा में निखर आती है। (रा० २ : १२१-१७१) तन्त्र : कल्हण प्रत्यभिज्ञा दर्शन का अनुयायी था। वह शैव था। तन्त्र-मन्त्र में विश्वास करता था। किन्तु उसने तत्कालीन तान्त्रिकों की दुष्ट प्रवृत्तियों की आलोचना की है। तन्त्र साहित्य का अध्ययन किया था। सर्व प्रथम उसने मातृ चक्र का उल्लेख जलोक की पत्नी ईशान देवी के सन्दर्भ में किया है। इससे ध्वनित होता है कि कल्हण के अनुसार अशोक के समय में बौद्धधर्म काश्मीर में प्रवेश कर वृद्धि प्राप्त किया और उसके पुत्र के समय में तन्त्रों का भी प्रचार हुआ। इस प्रकार बौद्धधर्म तथा तन्त्र एक साथ काश्मीर में जड़ जमाने लगे। किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से यह दोषपूर्ण है। तंत्र का आरम्भ यद्यपि आधुनिक शोधों की सहायता से बहुत पहले ले जाया गया है किन्तु उसे अशोक के काल से संबंधित करना उचित नहीं लगता। कदाचित् समकालीन बौद्धधर्म में तंत्रों के व्यापक प्रसार के कारण ही कल्हण की ऐसी

[ २० ] धारणा बनी हो । बौद्धधर्म एवं तंत्र दोनो पोदहवीं शताब्दी तक कश्मीर में थे । निःसन्देह तन्त्र का प्रचार बौद्धधर्म की अपेक्षा अधिक हो गया था और हिन्दू राज्य की समाप्ति के साथ दोनों का लोप भी कश्मीर में हो गया । कल्हण ने मातृचक्र का पुनः उल्लेख प्रवरसेन के प्रसंग में पुराधिष्ठान के सन्दर्भ में किया है । ( रा० २ : ९९ ) कृत्या उपासना का भी वह उल्लेख ( रा० १ : १३७, १४७; ३ : ३३ ) करता है । यहाँ यह निर्देश कर देना आवश्यक है कि तन्त्र तथा तन्त्री दो विभिन्न वर्ग थे । तन्त्री काश्मीर का एक सामाजिक वर्ग डामरों के समान था । तान्त्रिक लोग तन्त्र-क्रिया करते थे । तन्त्र की अत्यधिक दुरूह पद्धति मत्स्यायूप याग कल्हण के समय तक प्रचलित था । उसका वर्णन कर तन्त्र ज्ञान का कल्हण परिचय देता है । ( रा० ६ : ११ ) इसी प्रकार वह गुरुदीक्षा प्रथा का उल्लेख करता है : ( रा० ६ : १३ ) राघवानन्द ने पद्धति रत्नमाला में काश्मीरी तान्त्रिकों के इस संस्कार क्रिया पद्धति का उल्लेख किया है । काश्मीर में महिलायें भी तान्त्रिक गुरु होती थी कल्हण ने मत्स्य यज्ञ, अपूप याग विधि के प्रचारकों तथा पोषकों के लिए 'मूर्ख गुरु' शब्द का निन्दनीय प्रयोग किया है । वे आगम ग्रन्थों का कपोल कल्पित अर्थ, भाष्य एवं टिप्पणी करते थे । राजा कलश के गुरु प्रमदकण्ठ ने धार्मिकता की आड लेकर रति सुख की ओर प्रेरित कर उसे कामी बना दिया था । कल्हण ने उसकी खुलकर निन्दा की है । ( रा० ७ : २७८ ) अपने गुरु के साथ तान्त्रिक क्रियाओं में, अर्ध रात्रि में सम्पन्न की जाने वाली 'महासमय रात्रि' में राजा मदपान करता था । ( रा० ७ : ५२३ ) राजा कलश से उसके तान्त्रिक गुरु ने अनुचित कार्य कराया था । ( रा० ७ : ७१- ) कल्हण ने इन तान्त्रिको का उपहास करते हुए उन पर व्यंग किया है । कल्हण अभिचार क्रिया में विश्वास करता था । अभिचार के कारण राजा का देव मोहित होना लिखा है । वह लोगो के अन्ध-विश्वास तथा भूत-प्रेत विश्वास का समर्थक नही था । मन्त्र शक्ति देवी पूजा : तन्त्र के अतिरिक्त देवी एवं शक्ति पूजा का भी प्रचार कल्हण के समय में था । सिंह वाहिनी देवी ( रा० ३ : ४ १२ ) भ्रमर वासिनी देवी ( रा० १ : ४१६ दुर्गा, रा० : ८६- ९३ ) योगिनी ( रा० २ : १०० ) और महायोगिनी ( रा० १ : १३१ ) का उल्लेख कल्हण ने किया है । अशोक ने म्लेच्छों के नाश हेतु तपस्या किया था । तपस्या किया था। तपस्या की शक्ति से उसे जलोक पुत्र प्राप्त हुआ था । ( रा० १ : १०७ ) मन्त्र सिद्धि में कल्हण विश्वास करता था । तारकेश्वर मन्त्र तथा वशी मन्त्र का प्रभाव वर्णन किया गया है । ( रा० ३ : ४६५, ४६६ ) बलि प्रथा : बलि प्रथा काश्मीर में प्रचलित थी । देवी के सम्मुख बलि दी जाती थी । नर बलि भी होती थी । मैं काश्मीर के ग्रामों में घूम रहा था । एक स्थान की ओर संकेत किया गया । बताया गया कि वहाँ नर बलि दी जाती थी । उस गाँव के निवासी सभी मुसलमान थे । पुरातन जनश्रुति लोगों को स्मरण थी । राजा मेघवाहन के सन्दर्भ में नरबलि की बात कही गयी है । ( रा० ३ : : ) चण्डिकापतन में देवी के सम्मुख बलि दी जाती थी । ( रा० ३ : ३३ ) योगेश्वरी भट्टा द्वारा राजा वक तथा उसका समस्त कुटुम्ब देवी चक्र पर उपहार स्वरूप चढ़ा दिया गया था । ( रा० १ . ३३१ ) कल्हण ने उपहार एवं बलि दोनों शब्दो का प्रयोग किया है । दोनों के अर्थों में भेद है । धार्मिक क्रान्तियाँ : राजतरंगिणी काश्मीर में समय-समय पर हुए धार्मिक विकास, परिवर्तन एव

[ २१ ] क्रान्तियों का इतिहास प्रस्तुत करती है। यदि महाभारत काल से बारहवीं शताब्दी तक के काश्मीर राजाओं की राजकथा कल्हण ने लिपिबद्ध की थी तो उसने इसी काल के धार्मिक उथलपुथल तथा उनके जनता, समाज और राज्य पर पड़ते हुए प्रभावों का भी वर्णन किया है। इस दृष्टि से विश्व के किसी भी इतिहास- कार ने इतिहास नही लिखा है। कल्हण ने इतिहास को राजाओं किंवा राज्य के तिथिवार घटना-क्रम का संकलन नही माना है। उसने इतिहास में जनता के मानसिक विचारों, उनके विकास, वृद्धि एव ह्रास की क्रमबद्ध घटनाओ को लिखा है। उनका देश की राजनीति एवं समाज पर क्या प्रभाव पड़ा है और पड़ सकता है, इसका विशद वर्णन किया है। अस्तु राजतरंगिणी का महत्व राजनैतिक इतिहास के साथ-ही- साथ धर्म एवं विचारों के विकास के इतिहास के लिये भी है। विश्व के पुरा कालीन इतिहासकारों ने राजनीति के साथ देश की मनःस्थिति पर कम प्रकाश डाला है। इस दृष्टि से पुरानी शैली के इतिहास- कारों के सम्मुख कल्हण ने नवीन शैली उपस्थित की है जिसमें प्रेरणा है, तथ्य है, स्फूति है। प्रथम धार्मिक क्रान्ति : काश्मीर म चार धार्मिक क्रान्तियाँ हुई है। ये शान्तिपूर्ण थी, अहिंसक थीं, पश्चिम के रक्तमय उन्माद की कहानी उनमे नही मिलेगी। उनका साधन शक्ति नही था। वह वर्ष की ऋतुओं के सदृश आयी और चली गयी। उन्होंने विघटनात्मक, द्वेषात्मक एवं उन्मादात्मक प्रचारात्मक प्रवृ- त्तियों एवं इतिहासों का सृजन नही किया। कल्हण ने इन क्रान्तियो का प्रारम्भ यक्ष विप्लव, भिक्षु विप्लव आदि नामों से अभिहित किया है। उसने क्रान्ति के स्थान पर विप्लव शब्द का प्रयोग किया है। काश्मीर में सर्व प्रथम नील मुनि द्वारा प्रचारित नाग पूजा प्रचलित थी। नील मत पुराण द्वारा प्रतिपादित धर्म काश्मीर का धर्म था, पूजा पद्धति थी। सम्राट अशोक के समय में सर्वप्रथम बौद्ध धर्म का जोर काश्मीर में हुआ। राजाश्रय प्राप्त कर वह वृद्धि कर गया। अशोक ने विहारो, चैत्यो, स्तूपों से काश्मीर- मण्डल को भर दिया था। बौद्ध शासन का प्राबल्य हो गया। काश्मीर का पुरातन सनातन धर्म पीछे पड़ गया। प्रथम क्रान्ति का प्रणेता अशोक का पुत्र जलोक था। उसने भिक्षु विप्लव को रोका। इसका पहला साधन शास्त्रार्थ था। राजा जलोक का गुरु एक अवधूत था। गुरु अवधूत ने बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। (रा० १ : ११२) राजा जलोक अपने पुण्य-कार्यों एवं पुरातन धर्म की पुनर्स्थापना एवं बौद्धो के दलन के कारण नन्दीश्वर का अवतार काश्मीर में मान लिया गया। (रा० १ : १३०) उस समय काश्मीर मण्डल में बौद्धो का प्राबल्य था। बौद्ध धर्म की मान्यता थी। (रा० १ : १४) कल्हण ने भगवान बुद्ध को उनके मूल वंशीय नाम महाशाक्य से सम्बोधित किया है। (रा० १ : १४१) राजा जलोक के समय मे भी बौद्ध धर्म के दलन की झलक मिलती है। विहारों का निसन्देह दलन किया गया था। (रा० १ : १४०-१४४) राजा जलोक स्वतः अहिंसक था। कृत्या के मांस माँगने पर उसने अपना मास काट कर देना उचित समझा था। उसने बोधिसत्व के शासन एवं कर्मों को स्वयं जिज्ञासा कर शान्ति पूर्वक सुना था। तथापि उसने सहिष्णुता का परिचय दिया था। उसे बोधिसत्व स्वरूप ही मान लिया गया था। ज्येष्ठेश की पूजा के समय नृत्य-गीत कुशल एकसौ अन्त:पुर की महिलाओं को मन्दिर में नृत्य, गान एवं सेवा के लिये नियुक्त किया था। काश्मीर के इतिहास में यह प्रथम अवसर था जब मन्दिरों में नृत्य गान- शील महिलाओं का देव सेविका के रूप में प्रवेश हुआ था। वह प्रथा कालान्तर में देवदासी की कुप्रथा में परिणत हो गयी।

[ २२ ] द्वितीय धार्मिक क्रान्ति : राजा अभिमन्यु के समय में द्वितीय क्रान्ति हुई थी । इस समय भी बौद्ध अत्यन्त प्रवल हो गये थे । ( रा० १ : १७१ ) भिक्षु विप्लव से काश्मीर त्रस्त था। ( रा० १ : १७२- १८१ ) प्रसिद्ध दार्शनिक प्रचारक नागार्जुन इस समय काश्मीर मण्डल में वर्तमान था । उसकी तुलना बोधिसत्त्व से की जाती थी ( रा० १७३-१७७ ) नीलमत विहित कर्मकाण्ड, नाग यात्रा, नाग-पूजा, यज्ञादि जो प्राचीन काल से होते चले आते थे बन्द हो गये । संस्कृत भाषा भी पालि के सम्मुख दब गयी थी । पाली मुसलमानों की अरबी की समान बौद्धो की धार्मिक भाषा थी । बौद्ध वेद द्वेषी थे । उन्होंने शास्त्रार्थ में पण्डितो को परास्त कर नील मत विहित मत का उच्छेद कर दिया था । आतंकित राजा छ मास तक काश्मीर मण्डल त्याग कर, दर्वाभिसार में समय व्यतीत करता था । पुरातन धर्म की रक्षा हेतु काश्यप गोत्रीय चन्द्रदेव ब्राह्मण ने तपस्या की । नील नाग उसकी तपस्या से प्रसन्न हो गये । ( रा १ १८४ ) पुरातन काल में आद्य चन्द्रदेव विद्वान ने यक्ष विप्लव शान्त किया था । दूसरे चन्द्र देव ने बौद्ध विप्लव शान्त किया । ( रा० १ : १८५-१८६ ) तृतीय धार्मिक क्रान्ति : तृतीय क्रान्ति बौद्ध प्राबल्य को पुनः रोकने के लिये राजा किन्नर, सिद्ध, गोपादित्य, सन्धि मति के काल में हुई थी । बौद्ध विहारों को भस्म करने का भी उल्लेख इस समय मिलता है । ( रा० १ : २०० ) राजा सिद्ध ने शैव मत को पुनःस्थापित किया था । ( रा० १ : २७६ ) गोपादित्य ने वर्णाश्रम धर्म परिपालन हेतु ठोस कदम उठाया था । तथापि अहिंसा व्रत का त्याग नहीं किया गया । बलिप्रथा का सक्रिय विरोध होता रहा । ( रा० १ : ३४४ ) सन्धिमत के समय शैव भक्ति का पूर्णरूपेण काश्मीर मण्डल मे प्रचार हो गया । ( रा० २ : १३२ ) कल्हण ने विष्णु का सर्वप्रथम उल्लेख प्राग्ज्योतिष के सन्दर्भ तथा राजा मेघवाहन के विवाह-सम्बन्ध में किया है । ( रा० २ : १४७ ) विष्णु पूजा का प्रवेश बाहरी प्रभाव के कारण काश्मीर में हो सका था । मेघवाहन की रानी अमृतप्रभा थी । बंगाल तथा आसाम में वैष्णव मत का प्रभाव था । एतदर्थ विष्णु का प्रवेश काश्मीर में रानी अमृत प्रभा तथा रानी रणा रम्भा के कारण हुआ । परन्तु वह शिवपूजा तथा उपासना के समान सर्वमान्य नहीं हो सका । चतुर्थ धार्मिक क्रान्ति : चतुर्थ धार्मिक क्रान्ति राजा मेघवाहन के समय में हुई थी । इस काल में बौद्ध मत का प्रचार पुनः हुआ । परन्तु शैव मत का विरोध इस बार नहीं हो सका । शैव तथा बौद्ध मता- वलम्बी समझ गये थे । दोनों को एक साथ काश्मीर में रहना था । अतएव दोनों मत बहुत समीप आने लगे । मेघवाहन ने शैव उपासना का विरोध नहीं किया । उसका एकमात्र उद्देश्य था जगत में भगवान् बुद्ध के आदेशानुसार जीव हिंसा बन्द करना । मेघवाहन अपने उत्तम आचरण तथा कर्मों से बोधिसत्वों के कार्यों से भी आगे बढ़ गया था । उसने भिक्षुओं तथा उपासकों के लिये मद वन विहार स्थापित किया । भगवान् बुद्ध जेतवन, आम्रवन, तथा वेणु वन आदि विहारों में निवास करते थे । प्रतीत होता है उसी का अनुकरण कर मेघवाहन ने नदवन विहार स्थापित किया था । ( रा० ३ : १२ ) उसके समय में अहिंसा मर्यादा का पटह घोष किया गया था । उसकी रानी अमृत प्रभा के पिता का गुरु स्तुन्या था । वह लोट अर्थात् लद्दाख दिशा से आया था । उसने लो स्तुन्या स्तूप स्थापित किया । ( रा० ३ . १० ) राजा ने विश्व के इतिहास का एक अभिनव अभियान आरम्भ किया । उसने दिग्विजय कर विश्व

[ २३ ] में प्राणि हिंसा निषेध करने का निश्चय किया। (रा० ३ : २७) दक्षिण समुद्र तट पर मेघवाहन का शिविर पड़ा था। एक शबर चण्डिकायतन में नरबलि करने के लिये सन्नद्ध था। उस समय राजा ने स्वयं अपना शरीर अर्पित कर हिंसा से शबर को विरत किया था (रा० ३ : ५७) उसने ब्राह्मण बालक की रक्षा के लिये स्वयं अपना शरीर बलि के लिए अर्पित कर प्राणि रक्षा का स्तुत्य प्रयास किया था। (रा : ३ : ८८) राजा ने राक्षसों से भी अहिंसा बल लेकर उन्हें हिंसा कर्म से विरत किया था। (रा० ३ : ७८-७९) राजा ने अपने राज्य तथा भारत वर्ष में महाघोष कराया कि कोई भी प्राणी क्यो न हो वे सब अवध्य हैं। (रा० ३ : ८८) मेघवाहन ने सर्व प्रथम काश्मीर में बुद्ध प्रतिमा अपनी पत्नी भिन्नों के विहार में स्थापित किया था। (रा० ३ : ४६४) मेघवाहन का जन्म गान्धार में हुआ था। गान्धार प्रदेश में महायान सम्प्रदाय का प्राबल्य था। कनिष्क के कारण अफगानिस्तान, तुर्किस्तान तक बौद्ध धर्म पहुँच गया था। गान्धार शैली का स्थापत्य विकसित हो चुका था। मेघवाहन गान्धार में रहने के कारण उनसे प्रभावित था, अतएव मेघवाहन ने भगवान् बुद्ध की प्रतिमा काश्मीर में स्थापित की। इस प्रकार उसने प्रतिमा स्थापन की परम्परा चलायी। वह सम्राट् अशोक तथा कनिष्क के पश्चात् तीसरी महान् भारतीय आत्मा था जिसने बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु सक्रिय पग उठाया था। उसने प्रचार के लिए राजशक्ति का आश्रय लिया था। कल्हण ने विस्तार के साथ इस काल के क्रान्तिकारी धार्मिक परिवर्तनों का उल्लेख किया है। बौद्ध धर्म के मूल सिद्धान्तों को भी संक्षेप में देने का प्रयास किया है। कल्हण के इस व्यापक ज्ञान से प्रतीत होता है कि उसने तत्कालीन मत-मतान्तरों एवं सम्प्रदायों का गहन अध्ययन किया था। उसने तन्त्र, योग, धर्म, मतादि के विषय में जहाँ भी लिखा है, साधिकार लिखा है। उसने चार हजार वर्षों के धार्मिक इतिहास को भी राजनीतिक इतिहास के साथ लिपिबद्ध किया है। निरपेक्ष चिन्त विद् - कल्हण रूढ़वादी नहीं था। मौलिकता उसके छन्दों में, उसके विचारों में परिलक्षित होती है। वह लकीर का फकीर नहीं था। वह रचना के लिये रचना नहीं कर रहा था। वह जगत को कुछ नवीन स्फूर्तिदायक, सजीव विचार देना चाहता था। इसमें वह सफल हुआ है। कल्हण ने मंगलाचरणों में अन्य कवियों के समान प्रार्थना किंवा याचना नहीं किया है। उसका मंगलाचरण उसके मौलिक विचारों एवं मनोभावनाओं का परिचायक है। वह कर्म पर विश्वास करना चाहता है। पाठकों को कर्मशील बनाकर उन्हें यशस्वी देखना चाहता है। प्रथम तरंग के मंगलाचरण में वह पाठकों के 'यश' की कामना करता है। द्वितीय तरंग के मंगलाचरण में अर्धनारीश्वर के शरीर निर्माण की 'जय' करता है। तृतीय तरंग में पाठकों की 'रक्षा' की कामना करता है। चौथे तरंग में वह 'कल्याण' की कामना करता है। पंचम तथा षष्ठ तरंग में पुनः पाठकों की 'रक्षा' की कामना करता है। सप्तम तरंग में जगत की 'प्रसन्नता' और अष्टम तरंग में 'पापों के नष्ट' करने की कामना करता है। मंगलाचरणों में उसने अपने लिये कुछ याचना नहीं किया है। वह पाठकों के 'यश', 'जय', 'रक्षा' 'कल्याण', 'प्रसन्नता' एवं 'पापक्षय' की कामना करता है। वह कर्म पर विश्वास करना चाहता है। परन्तु- घटना-क्रमों ने, उसके अनहोनेपन ने, उसे दैववादी बना दिया। वह दैवी शक्ति में, भाग्य में, विश्व के तत्का लीन लेखकों के समान विश्वास करने लगा था। (रा० १ : ३२४, २ : ७६, ७७, ७८, ९२, ९३, ३ : १९६, १९७, ४८७, ४९१, ४९३)

[ २४ ] विधाता के विधान के औचित्य की उसने खुलकर आलोचना की है। वह क्षण मात्र के लिये भी भयभीत नहीं हुआ था कि वह उसी की आलोचना कर रहा था । उसे अप्रसन्न कर रहा था, जो उसका भी विधाता था । विधाता क्यों अन्याय होने देता है ? पुण्यात्मा क्यों कष्ट पाता है ? निर्दोष प्राणी क्यों दुःखों, यातनाओं का पात्र बना दिया जाता है ? मानव क्यों मानव पर क्रूरता करता है ? पाशविक वृत्ति का क्यों आश्रय लेता है ? आदि प्रसंगों को उठाकर भगवान की कटु आलोचना करने में वह संकोच नहीं करता । ( रा० ५ : ५४५; ६ : २७५, २७७, १३२९, १४३९; ८ : १६७, २३७, १२७५, १७९० ) विधाता की आलोचना करते-करते कल्हण की लेखनी उपदेशात्मक हो जाती है। जब वह किसी घटना के औचित्य का कोई कारण नहीं दे सकता है तो यह कह कर छुट्टी ले लेता है कि सब विधाता की इच्छा से होता है । ( रा० २ : ९२; ३ : ४९२; ७ : ९१६, १०७०, १७३९, १६२९; ८ : २२०, ६०७, १०३६, १२७४ ) इन स्थानों पर पुराणों एवं महाभारत में माधोपुर की नाग कन्या, परीक्षित, कच, तार्थ्य, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, आदि का उदाहरण उपस्थित कर, विधाता के विधान की पुष्टि कर देता है । अलौकिक एवं विचित्र घटनाओं के घटना का स्पष्टीकरण शब्द प्रमाण से देता है । भाग्यवादी किन्तु कर्म में विश्वास : कल्हण कर्मवाद का समर्थन करते-करते अन्त में भाग्य- वादी बन जाता है। उसने शुभा-शुभ कर्मों और तदनुसार उनके परिणामों में दृढ़ विश्वास प्रकट किया है। वह कहता है—'प्राणी अपने भाग्य की गति बदलने के लिये जिन साधनों का आश्रय लेता है ये ही उसकी भाग्य गति के साधन हो जाते हैं।' इसका उदाहरण उसने जयसिंह, सन्धियमति, कलश, मिहिर कुल तथा उम्मत वन्ती से दिया है । ( रा० ८ : ३४०५, २ : ७७; २ : ६५; ७ : ५०६, १ : ३२५; ५ : ४४८; ७ : ९५९, १२८८, १३७२ ) कल्हण जिस प्रकार प्राणियों को उनके विपत्तियों का कारण प्राक्तन एवं इस जन्म का किया पाप मानता है, उसी प्रकार देश किंवा जनता पर विपत्ति आने का कारण जनता का पाप कर्म मानता है । ( रा० १ . ८७ ४ ३९ ) तथापि जयापीड का उदाहरण देकर वह यह मत उपस्थित करता है कि पुरुषार्थ एवं आत्मविश्वास द्वारा भाग्य पर, दैव पर विजय प्राप्त किया जा सकता है। ( रा० ४ : ४१३ ) वह इस मत का भी प्रतिपादन करता है 'बली अपने बल पर, विश्वास करता है और उसे करना चाहिये । ( रा० ७ • १२८८ ) कर्म तथा पुनर्जन्म में कल्हण विश्वास करता है। मनुष्य के शरीर का तिल जिस प्रकार उसका साथ शरीर भस्म होने तक नहीं त्यागता उसी प्रकार संस्कार एवं कर्म मानव का साथ नहीं त्यागते । मानव अपने पूर्व जन्म के पाप, पुण्य एवं कृते का फल भोगता है। वह अपने पूर्व कर्म का परिणाम ही है। कर्म के कारण, वासना के कारण मानव पुनर्जन्म ग्रहण करता है । ( रा० ३ : १३१, ४२४, ४३० ) भाग्य, कर्म, पुरुषार्थ, आत्म विश्वास सबका निष्कर्ष निकालकर, कल्हण सन्देश देता है—'चाहे कोई भी भाग्य कैसा क्यों न हो, विधाता ने चाहे जो लिख रखा हो केवल आत्म विश्वासी एवं सबल राजा काश्मीर की रक्षा कर सकता है।' धर्म भीरुता : कल्हण की धार्मिक प्रवृत्ति थी। उसने जहाँ भी वही देव स्थान, पूजा, उपासना, वन्दना, देव शृंगार, अर्चना का वर्णन किया है, वहा उसकी भाषा पवित्र प्रभावोत्पादक तथा साफ सुथरी निखरी है । कल्हण गुरु परम्परा में विश्वास करता है । परन्तु अपने गुरु का नाम नहीं देता । हिन्दू परम्परा

[ २५ ] के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को गुरुमुख, गुरुमन्त्र किंवा गुरु दीक्षा के लिये गुरु चयन कर लेना चाहिए। गुरु- पूर्णिमा का पर्व ही गुरु पूजा के लिये अभिहित है। कल्हण अपने किसी शिक्षक का भी नाम नही देता । किन्तु गुरु शब्द का जहाँ भी कही उसने प्रयोग किया है अत्यन्त श्रद्धा के साथ किया है। बुद्ध, वर्ण, त्रिभु- वन, उग्र, आदि के लिये गुरु का प्रयोग कर अपनी श्रद्धा का परिचय दिया है। कल्हण धर्म भीरु था। परिहासपुर के पवित्र वातावरण, विशाल मन्दिरों की श्रृंखला, परिहास, केशव, बुद्ध मन्दिरों आदि मे होते पूजा-पाठ, राग-भोग, सेवा-शुश्रूषा, संगीत, नृत्य, वन्दना, प्रवचन, कथा, नाटक, उत्सवो एव यात्राओ का उस पर बाल्यावस्था से ही प्रभाव पडता आया था। धार्मिक वातावरण में रहने के कारण उसका संस्कार धार्मिक हो गया था। वह हिन्दू तथा बौद्ध दोनों विद्वानों के सम्पर्क में आया था। साधु-संत, योगियो, भिक्षुओं आदि के सान्निध्य के कारण उसमें जगत के प्रति विराग की भावना परि- लक्षित होती है। वह सर्वदा संसार की निस्सारता की ओर पाठको का ध्यान आकर्षित करता है। कल्हण ने राजाओं को उनके पाप के कारण दण्डित होने का क्रमबद्ध उदाहरण उपस्थित किया है। दण्ड देनेवाले राजा को भी दण्ड देने वाली अव्यक्त शक्ति है, इसका उसने उत्तमता के साथ प्रतिपादन किया है। अधर्म द्वारा अर्जित सम्पत्ति पुण्य कार्यों में व्यय करने पर अधर्म का निवारण होता है, कल्हण ने इसका ध्यान सर्वदा राजा तथा जनता को दिलाया है। (४:७०१) क्षण-भंगुरता : कल्हण के वर्णन में जगत की क्षण-भंगुरता की भावना पद-पद पर परिलक्षित होती है। (रा० १:२३) वह जगत की क्षण भंगुरता के कारण भाग्यवादी बन जाता है। तत्कालीन समाज में सुधार तथा गिरते चरित्र को उठता न देखकर वह निराश हो जाता है। भविष्य की घटनाओं पर नियन्त्रण न होने के कारण ने उसे भाग्यवादी बना दिया था। राजनीतिक उथल-पुथल, उलट-फेर, पद- प्राप्ति एवं पदच्युत होना, सांसारिक वैभवों की असारता ने उसे क्षण भंगुरता के सिद्धान्त की ओर आकृष्ट कर दिया था। राज सुख की अनिश्चितता, लक्ष्मी की चंचलता, मानवों की पराश्रयता, पद लोलुपता, विश्वासघात, कृतघ्नता, अकारण क्रूरता, नैतिक नियमों का किंचित् स्वार्थ के लिये उल्लंघन, स्वार्थसिद्धि हेतु उत्पीड़न, घटनाओं का अनजाने घटना, होनी का अनहोनी होना आदि के उदाहरणों के कारण वह क्षणभंगुरता की ओर खिंचता गया है। जीवन का ठिकाना न होना, अल्पायु, अकाल मृत्यु, स्वस्थ का अकस्मात रोग के कारण कालकवलित होना, सभी वस्तुओ का नाश, उनका क्षण-क्षण परिवर्तन, परिस्थितियों से बाधित समस्याओ का विचित्र रूप से खड़े हो जाना आदि का प्रभाव उसके सरल मस्तिष्क पर उसकी शैली में दिखायी देता है। (रा० ५:७) जगत की क्षणभंगुरता का रहस्य अवसर आते ही पाठक पर प्रकट करता है। भगवान बुद्ध का उपदेश—जिसका जन्म हुआ है उसका अन्त होगा और जिसका यन्त होगा उसका पुनः जन्म होगा, जिसका उदय होता है उसका अस्त होगा और सभी धर्मों का कारण कोई हेतु होता है, गर्भ का बालक, युवा होगा, प्रौढ़ होगा। वृद्ध होगा, जन्म जरा, व्याधि एवं अवसान से कोई बच न सकेगा—उसे विराग के साथ ही साथ क्षण भंगुरता की ओर उन्मुख कर दिया है। क्षण भंगुरता का यह दर्शन कल्हण के तात्कालिक जीवन कठोर जीवन के अनुभवों को बताता है। देश-प्रेम : कल्हण की आत्मा काश्मीर के कण-कण मे व्याप्त थी। उसने जहाँ भी कही कश्मीर का उल्लेख किया है वहाँ देश के प्रति श्रद्धा एवं भक्ति अपनी पूर्ण गरिमा में प्रकट हुई है। जहाँ भी कही उसने सम्राट कनिष्कादि से काश्मीर भूमि को प्रणाम कराया है वह स्थल संस्कृत साहित्य में भाव-व्यंजना की दृष्टि ४