राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २३ ] में प्राणि हिंसा निषेध करने का निश्चय किया। (रा० ३ : २७) दक्षिण समुद्र तट पर मेघवाहन का शिविर पड़ा था। एक शबर चण्डिकायतन में नरबलि करने के लिये सन्नद्ध था। उस समय राजा ने स्वयं अपना शरीर अर्पित कर हिंसा से शबर को विरत किया था (रा० ३ : ५७) उसने ब्राह्मण बालक की रक्षा के लिये स्वयं अपना शरीर बलि के लिए अर्पित कर प्राणि रक्षा का स्तुत्य प्रयास किया था। (रा : ३ : ८८) राजा ने राक्षसों से भी अहिंसा बल लेकर उन्हें हिंसा कर्म से विरत किया था। (रा० ३ : ७८-७९) राजा ने अपने राज्य तथा भारत वर्ष में महाघोष कराया कि कोई भी प्राणी क्यो न हो वे सब अवध्य हैं। (रा० ३ : ८८) मेघवाहन ने सर्व प्रथम काश्मीर में बुद्ध प्रतिमा अपनी पत्नी भिन्नों के विहार में स्थापित किया था। (रा० ३ : ४६४) मेघवाहन का जन्म गान्धार में हुआ था। गान्धार प्रदेश में महायान सम्प्रदाय का प्राबल्य था। कनिष्क के कारण अफगानिस्तान, तुर्किस्तान तक बौद्ध धर्म पहुँच गया था। गान्धार शैली का स्थापत्य विकसित हो चुका था। मेघवाहन गान्धार में रहने के कारण उनसे प्रभावित था, अतएव मेघवाहन ने भगवान् बुद्ध की प्रतिमा काश्मीर में स्थापित की। इस प्रकार उसने प्रतिमा स्थापन की परम्परा चलायी। वह सम्राट् अशोक तथा कनिष्क के पश्चात् तीसरी महान् भारतीय आत्मा था जिसने बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु सक्रिय पग उठाया था। उसने प्रचार के लिए राजशक्ति का आश्रय लिया था। कल्हण ने विस्तार के साथ इस काल के क्रान्तिकारी धार्मिक परिवर्तनों का उल्लेख किया है। बौद्ध धर्म के मूल सिद्धान्तों को भी संक्षेप में देने का प्रयास किया है। कल्हण के इस व्यापक ज्ञान से प्रतीत होता है कि उसने तत्कालीन मत-मतान्तरों एवं सम्प्रदायों का गहन अध्ययन किया था। उसने तन्त्र, योग, धर्म, मतादि के विषय में जहाँ भी लिखा है, साधिकार लिखा है। उसने चार हजार वर्षों के धार्मिक इतिहास को भी राजनीतिक इतिहास के साथ लिपिबद्ध किया है। निरपेक्ष चिन्त विद् - कल्हण रूढ़वादी नहीं था। मौलिकता उसके छन्दों में, उसके विचारों में परिलक्षित होती है। वह लकीर का फकीर नहीं था। वह रचना के लिये रचना नहीं कर रहा था। वह जगत को कुछ नवीन स्फूर्तिदायक, सजीव विचार देना चाहता था। इसमें वह सफल हुआ है। कल्हण ने मंगलाचरणों में अन्य कवियों के समान प्रार्थना किंवा याचना नहीं किया है। उसका मंगलाचरण उसके मौलिक विचारों एवं मनोभावनाओं का परिचायक है। वह कर्म पर विश्वास करना चाहता है। पाठकों को कर्मशील बनाकर उन्हें यशस्वी देखना चाहता है। प्रथम तरंग के मंगलाचरण में वह पाठकों के 'यश' की कामना करता है। द्वितीय तरंग के मंगलाचरण में अर्धनारीश्वर के शरीर निर्माण की 'जय' करता है। तृतीय तरंग में पाठकों की 'रक्षा' की कामना करता है। चौथे तरंग में वह 'कल्याण' की कामना करता है। पंचम तथा षष्ठ तरंग में पुनः पाठकों की 'रक्षा' की कामना करता है। सप्तम तरंग में जगत की 'प्रसन्नता' और अष्टम तरंग में 'पापों के नष्ट' करने की कामना करता है। मंगलाचरणों में उसने अपने लिये कुछ याचना नहीं किया है। वह पाठकों के 'यश', 'जय', 'रक्षा' 'कल्याण', 'प्रसन्नता' एवं 'पापक्षय' की कामना करता है। वह कर्म पर विश्वास करना चाहता है। परन्तु- घटना-क्रमों ने, उसके अनहोनेपन ने, उसे दैववादी बना दिया। वह दैवी शक्ति में, भाग्य में, विश्व के तत्का लीन लेखकों के समान विश्वास करने लगा था। (रा० १ : ३२४, २ : ७६, ७७, ७८, ९२, ९३, ३ : १९६, १९७, ४८७, ४९१, ४९३)