राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २४ ] विधाता के विधान के औचित्य की उसने खुलकर आलोचना की है। वह क्षण मात्र के लिये भी भयभीत नहीं हुआ था कि वह उसी की आलोचना कर रहा था । उसे अप्रसन्न कर रहा था, जो उसका भी विधाता था । विधाता क्यों अन्याय होने देता है ? पुण्यात्मा क्यों कष्ट पाता है ? निर्दोष प्राणी क्यों दुःखों, यातनाओं का पात्र बना दिया जाता है ? मानव क्यों मानव पर क्रूरता करता है ? पाशविक वृत्ति का क्यों आश्रय लेता है ? आदि प्रसंगों को उठाकर भगवान की कटु आलोचना करने में वह संकोच नहीं करता । ( रा० ५ : ५४५; ६ : २७५, २७७, १३२९, १४३९; ८ : १६७, २३७, १२७५, १७९० ) विधाता की आलोचना करते-करते कल्हण की लेखनी उपदेशात्मक हो जाती है। जब वह किसी घटना के औचित्य का कोई कारण नहीं दे सकता है तो यह कह कर छुट्टी ले लेता है कि सब विधाता की इच्छा से होता है । ( रा० २ : ९२; ३ : ४९२; ७ : ९१६, १०७०, १७३९, १६२९; ८ : २२०, ६०७, १०३६, १२७४ ) इन स्थानों पर पुराणों एवं महाभारत में माधोपुर की नाग कन्या, परीक्षित, कच, तार्थ्य, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, आदि का उदाहरण उपस्थित कर, विधाता के विधान की पुष्टि कर देता है । अलौकिक एवं विचित्र घटनाओं के घटना का स्पष्टीकरण शब्द प्रमाण से देता है । भाग्यवादी किन्तु कर्म में विश्वास : कल्हण कर्मवाद का समर्थन करते-करते अन्त में भाग्य- वादी बन जाता है। उसने शुभा-शुभ कर्मों और तदनुसार उनके परिणामों में दृढ़ विश्वास प्रकट किया है। वह कहता है—'प्राणी अपने भाग्य की गति बदलने के लिये जिन साधनों का आश्रय लेता है ये ही उसकी भाग्य गति के साधन हो जाते हैं।' इसका उदाहरण उसने जयसिंह, सन्धियमति, कलश, मिहिर कुल तथा उम्मत वन्ती से दिया है । ( रा० ८ : ३४०५, २ : ७७; २ : ६५; ७ : ५०६, १ : ३२५; ५ : ४४८; ७ : ९५९, १२८८, १३७२ ) कल्हण जिस प्रकार प्राणियों को उनके विपत्तियों का कारण प्राक्तन एवं इस जन्म का किया पाप मानता है, उसी प्रकार देश किंवा जनता पर विपत्ति आने का कारण जनता का पाप कर्म मानता है । ( रा० १ . ८७ ४ ३९ ) तथापि जयापीड का उदाहरण देकर वह यह मत उपस्थित करता है कि पुरुषार्थ एवं आत्मविश्वास द्वारा भाग्य पर, दैव पर विजय प्राप्त किया जा सकता है। ( रा० ४ : ४१३ ) वह इस मत का भी प्रतिपादन करता है 'बली अपने बल पर, विश्वास करता है और उसे करना चाहिये । ( रा० ७ • १२८८ ) कर्म तथा पुनर्जन्म में कल्हण विश्वास करता है। मनुष्य के शरीर का तिल जिस प्रकार उसका साथ शरीर भस्म होने तक नहीं त्यागता उसी प्रकार संस्कार एवं कर्म मानव का साथ नहीं त्यागते । मानव अपने पूर्व जन्म के पाप, पुण्य एवं कृते का फल भोगता है। वह अपने पूर्व कर्म का परिणाम ही है। कर्म के कारण, वासना के कारण मानव पुनर्जन्म ग्रहण करता है । ( रा० ३ : १३१, ४२४, ४३० ) भाग्य, कर्म, पुरुषार्थ, आत्म विश्वास सबका निष्कर्ष निकालकर, कल्हण सन्देश देता है—'चाहे कोई भी भाग्य कैसा क्यों न हो, विधाता ने चाहे जो लिख रखा हो केवल आत्म विश्वासी एवं सबल राजा काश्मीर की रक्षा कर सकता है।' धर्म भीरुता : कल्हण की धार्मिक प्रवृत्ति थी। उसने जहाँ भी वही देव स्थान, पूजा, उपासना, वन्दना, देव शृंगार, अर्चना का वर्णन किया है, वहा उसकी भाषा पवित्र प्रभावोत्पादक तथा साफ सुथरी निखरी है । कल्हण गुरु परम्परा में विश्वास करता है । परन्तु अपने गुरु का नाम नहीं देता । हिन्दू परम्परा