भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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[ २५ ] के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को गुरुमुख, गुरुमन्त्र किंवा गुरु दीक्षा के लिये गुरु चयन कर लेना चाहिए। गुरु- पूर्णिमा का पर्व ही गुरु पूजा के लिये अभिहित है। कल्हण अपने किसी शिक्षक का भी नाम नही देता । किन्तु गुरु शब्द का जहाँ भी कही उसने प्रयोग किया है अत्यन्त श्रद्धा के साथ किया है। बुद्ध, वर्ण, त्रिभु- वन, उग्र, आदि के लिये गुरु का प्रयोग कर अपनी श्रद्धा का परिचय दिया है। कल्हण धर्म भीरु था। परिहासपुर के पवित्र वातावरण, विशाल मन्दिरों की श्रृंखला, परिहास, केशव, बुद्ध मन्दिरों आदि मे होते पूजा-पाठ, राग-भोग, सेवा-शुश्रूषा, संगीत, नृत्य, वन्दना, प्रवचन, कथा, नाटक, उत्सवो एव यात्राओ का उस पर बाल्यावस्था से ही प्रभाव पडता आया था। धार्मिक वातावरण में रहने के कारण उसका संस्कार धार्मिक हो गया था। वह हिन्दू तथा बौद्ध दोनों विद्वानों के सम्पर्क में आया था। साधु-संत, योगियो, भिक्षुओं आदि के सान्निध्य के कारण उसमें जगत के प्रति विराग की भावना परि- लक्षित होती है। वह सर्वदा संसार की निस्सारता की ओर पाठको का ध्यान आकर्षित करता है। कल्हण ने राजाओं को उनके पाप के कारण दण्डित होने का क्रमबद्ध उदाहरण उपस्थित किया है। दण्ड देनेवाले राजा को भी दण्ड देने वाली अव्यक्त शक्ति है, इसका उसने उत्तमता के साथ प्रतिपादन किया है। अधर्म द्वारा अर्जित सम्पत्ति पुण्य कार्यों में व्यय करने पर अधर्म का निवारण होता है, कल्हण ने इसका ध्यान सर्वदा राजा तथा जनता को दिलाया है। (४:७०१) क्षण-भंगुरता : कल्हण के वर्णन में जगत की क्षण-भंगुरता की भावना पद-पद पर परिलक्षित होती है। (रा० १:२३) वह जगत की क्षण भंगुरता के कारण भाग्यवादी बन जाता है। तत्कालीन समाज में सुधार तथा गिरते चरित्र को उठता न देखकर वह निराश हो जाता है। भविष्य की घटनाओं पर नियन्त्रण न होने के कारण ने उसे भाग्यवादी बना दिया था। राजनीतिक उथल-पुथल, उलट-फेर, पद- प्राप्ति एवं पदच्युत होना, सांसारिक वैभवों की असारता ने उसे क्षण भंगुरता के सिद्धान्त की ओर आकृष्ट कर दिया था। राज सुख की अनिश्चितता, लक्ष्मी की चंचलता, मानवों की पराश्रयता, पद लोलुपता, विश्वासघात, कृतघ्नता, अकारण क्रूरता, नैतिक नियमों का किंचित् स्वार्थ के लिये उल्लंघन, स्वार्थसिद्धि हेतु उत्पीड़न, घटनाओं का अनजाने घटना, होनी का अनहोनी होना आदि के उदाहरणों के कारण वह क्षणभंगुरता की ओर खिंचता गया है। जीवन का ठिकाना न होना, अल्पायु, अकाल मृत्यु, स्वस्थ का अकस्मात रोग के कारण कालकवलित होना, सभी वस्तुओ का नाश, उनका क्षण-क्षण परिवर्तन, परिस्थितियों से बाधित समस्याओ का विचित्र रूप से खड़े हो जाना आदि का प्रभाव उसके सरल मस्तिष्क पर उसकी शैली में दिखायी देता है। (रा० ५:७) जगत की क्षणभंगुरता का रहस्य अवसर आते ही पाठक पर प्रकट करता है। भगवान बुद्ध का उपदेश—जिसका जन्म हुआ है उसका अन्त होगा और जिसका यन्त होगा उसका पुनः जन्म होगा, जिसका उदय होता है उसका अस्त होगा और सभी धर्मों का कारण कोई हेतु होता है, गर्भ का बालक, युवा होगा, प्रौढ़ होगा। वृद्ध होगा, जन्म जरा, व्याधि एवं अवसान से कोई बच न सकेगा—उसे विराग के साथ ही साथ क्षण भंगुरता की ओर उन्मुख कर दिया है। क्षण भंगुरता का यह दर्शन कल्हण के तात्कालिक जीवन कठोर जीवन के अनुभवों को बताता है। देश-प्रेम : कल्हण की आत्मा काश्मीर के कण-कण मे व्याप्त थी। उसने जहाँ भी कही कश्मीर का उल्लेख किया है वहाँ देश के प्रति श्रद्धा एवं भक्ति अपनी पूर्ण गरिमा में प्रकट हुई है। जहाँ भी कही उसने सम्राट कनिष्कादि से काश्मीर भूमि को प्रणाम कराया है वह स्थल संस्कृत साहित्य में भाव-व्यंजना की दृष्टि ४