भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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[ २२ ] द्वितीय धार्मिक क्रान्ति : राजा अभिमन्यु के समय में द्वितीय क्रान्ति हुई थी । इस समय भी बौद्ध अत्यन्त प्रवल हो गये थे । ( रा० १ : १७१ ) भिक्षु विप्लव से काश्मीर त्रस्त था। ( रा० १ : १७२- १८१ ) प्रसिद्ध दार्शनिक प्रचारक नागार्जुन इस समय काश्मीर मण्डल में वर्तमान था । उसकी तुलना बोधिसत्त्व से की जाती थी ( रा० १७३-१७७ ) नीलमत विहित कर्मकाण्ड, नाग यात्रा, नाग-पूजा, यज्ञादि जो प्राचीन काल से होते चले आते थे बन्द हो गये । संस्कृत भाषा भी पालि के सम्मुख दब गयी थी । पाली मुसलमानों की अरबी की समान बौद्धो की धार्मिक भाषा थी । बौद्ध वेद द्वेषी थे । उन्होंने शास्त्रार्थ में पण्डितो को परास्त कर नील मत विहित मत का उच्छेद कर दिया था । आतंकित राजा छ मास तक काश्मीर मण्डल त्याग कर, दर्वाभिसार में समय व्यतीत करता था । पुरातन धर्म की रक्षा हेतु काश्यप गोत्रीय चन्द्रदेव ब्राह्मण ने तपस्या की । नील नाग उसकी तपस्या से प्रसन्न हो गये । ( रा १ १८४ ) पुरातन काल में आद्य चन्द्रदेव विद्वान ने यक्ष विप्लव शान्त किया था । दूसरे चन्द्र देव ने बौद्ध विप्लव शान्त किया । ( रा० १ : १८५-१८६ ) तृतीय धार्मिक क्रान्ति : तृतीय क्रान्ति बौद्ध प्राबल्य को पुनः रोकने के लिये राजा किन्नर, सिद्ध, गोपादित्य, सन्धि मति के काल में हुई थी । बौद्ध विहारों को भस्म करने का भी उल्लेख इस समय मिलता है । ( रा० १ : २०० ) राजा सिद्ध ने शैव मत को पुनःस्थापित किया था । ( रा० १ : २७६ ) गोपादित्य ने वर्णाश्रम धर्म परिपालन हेतु ठोस कदम उठाया था । तथापि अहिंसा व्रत का त्याग नहीं किया गया । बलिप्रथा का सक्रिय विरोध होता रहा । ( रा० १ : ३४४ ) सन्धिमत के समय शैव भक्ति का पूर्णरूपेण काश्मीर मण्डल मे प्रचार हो गया । ( रा० २ : १३२ ) कल्हण ने विष्णु का सर्वप्रथम उल्लेख प्राग्ज्योतिष के सन्दर्भ तथा राजा मेघवाहन के विवाह-सम्बन्ध में किया है । ( रा० २ : १४७ ) विष्णु पूजा का प्रवेश बाहरी प्रभाव के कारण काश्मीर में हो सका था । मेघवाहन की रानी अमृतप्रभा थी । बंगाल तथा आसाम में वैष्णव मत का प्रभाव था । एतदर्थ विष्णु का प्रवेश काश्मीर में रानी अमृत प्रभा तथा रानी रणा रम्भा के कारण हुआ । परन्तु वह शिवपूजा तथा उपासना के समान सर्वमान्य नहीं हो सका । चतुर्थ धार्मिक क्रान्ति : चतुर्थ धार्मिक क्रान्ति राजा मेघवाहन के समय में हुई थी । इस काल में बौद्ध मत का प्रचार पुनः हुआ । परन्तु शैव मत का विरोध इस बार नहीं हो सका । शैव तथा बौद्ध मता- वलम्बी समझ गये थे । दोनों को एक साथ काश्मीर में रहना था । अतएव दोनों मत बहुत समीप आने लगे । मेघवाहन ने शैव उपासना का विरोध नहीं किया । उसका एकमात्र उद्देश्य था जगत में भगवान् बुद्ध के आदेशानुसार जीव हिंसा बन्द करना । मेघवाहन अपने उत्तम आचरण तथा कर्मों से बोधिसत्वों के कार्यों से भी आगे बढ़ गया था । उसने भिक्षुओं तथा उपासकों के लिये मद वन विहार स्थापित किया । भगवान् बुद्ध जेतवन, आम्रवन, तथा वेणु वन आदि विहारों में निवास करते थे । प्रतीत होता है उसी का अनुकरण कर मेघवाहन ने नदवन विहार स्थापित किया था । ( रा० ३ : १२ ) उसके समय में अहिंसा मर्यादा का पटह घोष किया गया था । उसकी रानी अमृत प्रभा के पिता का गुरु स्तुन्या था । वह लोट अर्थात् लद्दाख दिशा से आया था । उसने लो स्तुन्या स्तूप स्थापित किया । ( रा० ३ . १० ) राजा ने विश्व के इतिहास का एक अभिनव अभियान आरम्भ किया । उसने दिग्विजय कर विश्व