राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २१ ] क्रान्तियों का इतिहास प्रस्तुत करती है। यदि महाभारत काल से बारहवीं शताब्दी तक के काश्मीर राजाओं की राजकथा कल्हण ने लिपिबद्ध की थी तो उसने इसी काल के धार्मिक उथलपुथल तथा उनके जनता, समाज और राज्य पर पड़ते हुए प्रभावों का भी वर्णन किया है। इस दृष्टि से विश्व के किसी भी इतिहास- कार ने इतिहास नही लिखा है। कल्हण ने इतिहास को राजाओं किंवा राज्य के तिथिवार घटना-क्रम का संकलन नही माना है। उसने इतिहास में जनता के मानसिक विचारों, उनके विकास, वृद्धि एव ह्रास की क्रमबद्ध घटनाओ को लिखा है। उनका देश की राजनीति एवं समाज पर क्या प्रभाव पड़ा है और पड़ सकता है, इसका विशद वर्णन किया है। अस्तु राजतरंगिणी का महत्व राजनैतिक इतिहास के साथ-ही- साथ धर्म एवं विचारों के विकास के इतिहास के लिये भी है। विश्व के पुरा कालीन इतिहासकारों ने राजनीति के साथ देश की मनःस्थिति पर कम प्रकाश डाला है। इस दृष्टि से पुरानी शैली के इतिहास- कारों के सम्मुख कल्हण ने नवीन शैली उपस्थित की है जिसमें प्रेरणा है, तथ्य है, स्फूति है। प्रथम धार्मिक क्रान्ति : काश्मीर म चार धार्मिक क्रान्तियाँ हुई है। ये शान्तिपूर्ण थी, अहिंसक थीं, पश्चिम के रक्तमय उन्माद की कहानी उनमे नही मिलेगी। उनका साधन शक्ति नही था। वह वर्ष की ऋतुओं के सदृश आयी और चली गयी। उन्होंने विघटनात्मक, द्वेषात्मक एवं उन्मादात्मक प्रचारात्मक प्रवृ- त्तियों एवं इतिहासों का सृजन नही किया। कल्हण ने इन क्रान्तियो का प्रारम्भ यक्ष विप्लव, भिक्षु विप्लव आदि नामों से अभिहित किया है। उसने क्रान्ति के स्थान पर विप्लव शब्द का प्रयोग किया है। काश्मीर में सर्व प्रथम नील मुनि द्वारा प्रचारित नाग पूजा प्रचलित थी। नील मत पुराण द्वारा प्रतिपादित धर्म काश्मीर का धर्म था, पूजा पद्धति थी। सम्राट अशोक के समय में सर्वप्रथम बौद्ध धर्म का जोर काश्मीर में हुआ। राजाश्रय प्राप्त कर वह वृद्धि कर गया। अशोक ने विहारो, चैत्यो, स्तूपों से काश्मीर- मण्डल को भर दिया था। बौद्ध शासन का प्राबल्य हो गया। काश्मीर का पुरातन सनातन धर्म पीछे पड़ गया। प्रथम क्रान्ति का प्रणेता अशोक का पुत्र जलोक था। उसने भिक्षु विप्लव को रोका। इसका पहला साधन शास्त्रार्थ था। राजा जलोक का गुरु एक अवधूत था। गुरु अवधूत ने बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। (रा० १ : ११२) राजा जलोक अपने पुण्य-कार्यों एवं पुरातन धर्म की पुनर्स्थापना एवं बौद्धो के दलन के कारण नन्दीश्वर का अवतार काश्मीर में मान लिया गया। (रा० १ : १३०) उस समय काश्मीर मण्डल में बौद्धो का प्राबल्य था। बौद्ध धर्म की मान्यता थी। (रा० १ : १४) कल्हण ने भगवान बुद्ध को उनके मूल वंशीय नाम महाशाक्य से सम्बोधित किया है। (रा० १ : १४१) राजा जलोक के समय मे भी बौद्ध धर्म के दलन की झलक मिलती है। विहारों का निसन्देह दलन किया गया था। (रा० १ : १४०-१४४) राजा जलोक स्वतः अहिंसक था। कृत्या के मांस माँगने पर उसने अपना मास काट कर देना उचित समझा था। उसने बोधिसत्व के शासन एवं कर्मों को स्वयं जिज्ञासा कर शान्ति पूर्वक सुना था। तथापि उसने सहिष्णुता का परिचय दिया था। उसे बोधिसत्व स्वरूप ही मान लिया गया था। ज्येष्ठेश की पूजा के समय नृत्य-गीत कुशल एकसौ अन्त:पुर की महिलाओं को मन्दिर में नृत्य, गान एवं सेवा के लिये नियुक्त किया था। काश्मीर के इतिहास में यह प्रथम अवसर था जब मन्दिरों में नृत्य गान- शील महिलाओं का देव सेविका के रूप में प्रवेश हुआ था। वह प्रथा कालान्तर में देवदासी की कुप्रथा में परिणत हो गयी।