राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २० ] धारणा बनी हो । बौद्धधर्म एवं तंत्र दोनो पोदहवीं शताब्दी तक कश्मीर में थे । निःसन्देह तन्त्र का प्रचार बौद्धधर्म की अपेक्षा अधिक हो गया था और हिन्दू राज्य की समाप्ति के साथ दोनों का लोप भी कश्मीर में हो गया । कल्हण ने मातृचक्र का पुनः उल्लेख प्रवरसेन के प्रसंग में पुराधिष्ठान के सन्दर्भ में किया है । ( रा० २ : ९९ ) कृत्या उपासना का भी वह उल्लेख ( रा० १ : १३७, १४७; ३ : ३३ ) करता है । यहाँ यह निर्देश कर देना आवश्यक है कि तन्त्र तथा तन्त्री दो विभिन्न वर्ग थे । तन्त्री काश्मीर का एक सामाजिक वर्ग डामरों के समान था । तान्त्रिक लोग तन्त्र-क्रिया करते थे । तन्त्र की अत्यधिक दुरूह पद्धति मत्स्यायूप याग कल्हण के समय तक प्रचलित था । उसका वर्णन कर तन्त्र ज्ञान का कल्हण परिचय देता है । ( रा० ६ : ११ ) इसी प्रकार वह गुरुदीक्षा प्रथा का उल्लेख करता है : ( रा० ६ : १३ ) राघवानन्द ने पद्धति रत्नमाला में काश्मीरी तान्त्रिकों के इस संस्कार क्रिया पद्धति का उल्लेख किया है । काश्मीर में महिलायें भी तान्त्रिक गुरु होती थी कल्हण ने मत्स्य यज्ञ, अपूप याग विधि के प्रचारकों तथा पोषकों के लिए 'मूर्ख गुरु' शब्द का निन्दनीय प्रयोग किया है । वे आगम ग्रन्थों का कपोल कल्पित अर्थ, भाष्य एवं टिप्पणी करते थे । राजा कलश के गुरु प्रमदकण्ठ ने धार्मिकता की आड लेकर रति सुख की ओर प्रेरित कर उसे कामी बना दिया था । कल्हण ने उसकी खुलकर निन्दा की है । ( रा० ७ : २७८ ) अपने गुरु के साथ तान्त्रिक क्रियाओं में, अर्ध रात्रि में सम्पन्न की जाने वाली 'महासमय रात्रि' में राजा मदपान करता था । ( रा० ७ : ५२३ ) राजा कलश से उसके तान्त्रिक गुरु ने अनुचित कार्य कराया था । ( रा० ७ : ७१- ) कल्हण ने इन तान्त्रिको का उपहास करते हुए उन पर व्यंग किया है । कल्हण अभिचार क्रिया में विश्वास करता था । अभिचार के कारण राजा का देव मोहित होना लिखा है । वह लोगो के अन्ध-विश्वास तथा भूत-प्रेत विश्वास का समर्थक नही था । मन्त्र शक्ति देवी पूजा : तन्त्र के अतिरिक्त देवी एवं शक्ति पूजा का भी प्रचार कल्हण के समय में था । सिंह वाहिनी देवी ( रा० ३ : ४ १२ ) भ्रमर वासिनी देवी ( रा० १ : ४१६ दुर्गा, रा० : ८६- ९३ ) योगिनी ( रा० २ : १०० ) और महायोगिनी ( रा० १ : १३१ ) का उल्लेख कल्हण ने किया है । अशोक ने म्लेच्छों के नाश हेतु तपस्या किया था । तपस्या किया था। तपस्या की शक्ति से उसे जलोक पुत्र प्राप्त हुआ था । ( रा० १ : १०७ ) मन्त्र सिद्धि में कल्हण विश्वास करता था । तारकेश्वर मन्त्र तथा वशी मन्त्र का प्रभाव वर्णन किया गया है । ( रा० ३ : ४६५, ४६६ ) बलि प्रथा : बलि प्रथा काश्मीर में प्रचलित थी । देवी के सम्मुख बलि दी जाती थी । नर बलि भी होती थी । मैं काश्मीर के ग्रामों में घूम रहा था । एक स्थान की ओर संकेत किया गया । बताया गया कि वहाँ नर बलि दी जाती थी । उस गाँव के निवासी सभी मुसलमान थे । पुरातन जनश्रुति लोगों को स्मरण थी । राजा मेघवाहन के सन्दर्भ में नरबलि की बात कही गयी है । ( रा० ३ : : ) चण्डिकापतन में देवी के सम्मुख बलि दी जाती थी । ( रा० ३ : ३३ ) योगेश्वरी भट्टा द्वारा राजा वक तथा उसका समस्त कुटुम्ब देवी चक्र पर उपहार स्वरूप चढ़ा दिया गया था । ( रा० १ . ३३१ ) कल्हण ने उपहार एवं बलि दोनों शब्दो का प्रयोग किया है । दोनों के अर्थों में भेद है । धार्मिक क्रान्तियाँ : राजतरंगिणी काश्मीर में समय-समय पर हुए धार्मिक विकास, परिवर्तन एव