भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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था। कल्याण चाहे कल्हण हो या नहीं कल्हण की ऐतिहासिकता जोनराज, श्रीवर, शुक आदि राजतरंगिणी- कारों के कारण प्रमाणित है। यह ऐतिहासिक व्यक्ति है। कल्हण वंशज : कल्हण की ख्याति राजतरंगिणी लेखक के रूप में दिन पर दिन बढ़ती गयी। काश्मीर में दूसरे इतिहास के अभाव में कल्हण का एकमात्र इतिहास शेष रह गया था। अतएव हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ने कल्हण के इतिहास का अध्ययन किया। इस अध्ययन के कारण उसकी ख्याति बढ़ती गयी। उसके वंशजों का नाम 'काल्हण' तथा 'कल्हणेय' पड़ गया। जोनराज ने उसके वंशजों को 'कल्हण नन्दन' लिखा है। (जो० रा० ९४)। जोनराज ने उसके वंशजों को पुनः 'काल्हणीन' लिखा है। (जो० रा० ६६)। इसका पाठभेद 'काल्हणान' तथा 'कल्हणीन' भो मिलता है। (जो० रा० १०१)। जोनराज ने 'काल्हण' तथा 'कल्हणात्मजे' शब्द का प्रयोग उसके वंशजों के लिए किया है। (जो० रा० १०२) श्रीवर ने 'कल्हण' शब्द का प्रयोग किया है। (जैन० राज : २ : १४९) अन्य स्थानों पर कल्हण के सम्बन्ध में और उल्लेख नहीं मिल सका है। अध्ययन : कल्हण पुरातन शैली का विद्वान् था। उसका पठन-पाठन अभिजात कुलीन ब्राह्मण बालक के समान हुआ था। उसने महाभारत और रामायण की घटनाओं का अत्यधिक उल्लेख किया है। दोनों ग्रन्थों के कथानकों का प्रचुर वर्णन राजतरंगिणी में मिलता है। उनकी घटनाओं की तुलना राज- तरंगिणी की घटनाओं से किया है। कल्हण ने पुराण विशेषकर नन्दी और नीलमत पुराण का अध्ययन किया था। उसने कालिदास के रघुवंश, मेघदूत, बाण के हर्ष चरित, तथा वराह मिहिर के बृहद् संहिता का अध्ययन किया था। वेद, योग वाशिष्ठ रामायण और विष्णु धर्मोत्तर पुराण भी पढ़ा था। पुरानी शैली के पण्डित किंवा ब्राह्मण ज्योतिष, वेद, पुराण, इतिहास, व्याकरण, साहित्य, अर्थशास्त्र, स्मृति, आयुर्वेद का एक साथ अध्ययन करते थे। कल्हण ने स्मर शास्त्र, कामशास्त्र, कुट्टनीमतम् तथा भरत के नाट्य शास्त्र का अध्ययन किया था। उसने विज्ञान का भी अध्ययन किया था। उसने सूर्य ज्योति (रा० ३ : ४९२) तथा जल (रा० ३ : २०२) का वर्णन एक वैज्ञानिक की तरह किया है। कल्हण सर्वतन्त्र स्वतन्त्र विद्वान् था। इस प्रकार के विद्वानों को यह उपाधि दी जाने लगी थी। ज्योतिष का उसने ज्ञान प्रकट किया है। उसने हर्ष की कुण्डली भी राजतरंगिणी में दे दिया है। उसके ग्रहों की तुलना धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन से करता है। उसके लेख से प्रकट होता है उसने पतंजलि के महाभाष्य का विशद अध्ययन किया था। चान्द्र व्याकरण भी उसने पढ़ा था। रस, छंद, अलंकार आदि के समस्त अंगो में पारंगत था। (रा० २ : ८९, ३ : ४४०) बाण के हर्ष चरित का उसने अध्ययन ही नही किया था बल्कि उसके २६ श्लोकों का उद्धरण राजतरंगिणी में दिया है। राजतरंगिणी लेखन में वह बाण के हर्षचरित तथा विल्हण के दशकुमार चरित से अत्यधिक प्रभावित था। कल्हण ने लौकिक रीति-रिवाज, संस्कार, कुसंस्कार, अन्धविश्वास, जनश्रुतियों, परम्परा, शुभ- अशुभ, शकुन-अपशकुन, आदि का उल्लेख प्रसंग आते ही किया है। उसकी प्रतिभा सर्वतोमुखी थी। उसने शुभाशुभ लक्षणों से, शकुन-अपशकुन से भविष्य की घटनाओं की ओर संकेत किया है। इस प्रकार प्रकट होता है, उसे फलित ज्योतिष का गहन अध्ययन था। दैव विद् तुल्य उसकी लेखनी चली है। (रा० २ : १४९; १ : ५५; ७ : १७२०; ८ : ७१५; ३ : ४३३ तथा ३ : ४४०)। कल्हण ने भवभूति एवं वाक्पति राज का उल्लेख आदर के साथ किया है। (रा० ४ : १४४) उसने इसी सन्दर्भ में यशो वर्मा का उल्लेख किया है जहाँ कवियों का आदर एवं सत्कार होता था।