राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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कल्हण और कल्याण : द्वितीय राज तरंगिणी के रचनाकार जोन राज ने मंख के श्रीकण्ठ चरित पर वार्तिक लिखा है । उसने लिखा है अलक दत्त कल्याण का संरक्षक था । वह सन्धि विग्राहक के पद पर था । किन्तु कल्याण के विषय में जोन राज कुछ प्रकाश नहीं डालता । उसने भाष्य किंवा वार्तिक लिखते समय यह नहीं लिखा है कि मंख वर्णित कल्याण ही कल्हण है । जोन राज अपनी रचना में कल्हण का उल्लेख करता है । कल्हण के छोड़े कार्य को वह अपने समय तक के राजाओं एवं बादशाहों का वर्णन कर पूरा करता है । आश्चर्य है उसने मंख एवं स्वतः वर्णित कल्याण को कहीं कल्हण नहीं माना है । कल्हण ही मंख वर्णित कल्याण है ? अथवा और कोई व्यक्ति है ? इस पर विचार करना आवश्यक है । श्री स्टीन का मत है कि कल्हण शब्द प्राकृत 'कल्लाण' तथा 'संस्कृत' 'कल्याण' का अपभ्रंश है । स्टीन अपने मत की पुष्टि में जयापीड की रानी का उदाहरण उपस्थित करते हैं । जयापीड की रानी का नाम 'कल्याण' देवी था । 'कल्याण', 'कल्लणा' तथा 'कल्हणिका' एक ही शब्द किंवा नाम के भिन्न रूप हैं । 'कल्हणिका' शब्द संस्कृत 'कल्याणिका' है । राजवंश एवं अभिजात कुल की महिलाओं के लिये नाटकों तथा उपाख्यानों में इस शब्द का प्रयोग किया गया है । राजवंश की स्त्रियाँ राजा कलश तथा जयसिंह के समय तक इसी सम्बोधन से सम्बोधित की जाती थीं । संस्कृत नाटकों तथा काव्यों में सम्भ्रान्त महिलाओं तथा रानियों के लिये 'कल्याणी' शब्द का प्रयोग सम्बोधन के लिये किया जाता रहा है । (रा० ४:४६१, ४६७, ७:२६३, ८:१६४८, ३०६९) कल्हण ने स्वयं राज तरंगिणी में सहदेव के राजपुत्र कल्हण का उल्लेख किया है । (रा० ८ : ६२६) इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कल्हण नाम उस समय प्रचलित था । लोगों का नाम कल्हण रखा जाता था । सल्हण, रल्हण, विल्हण, मल्हण आदि नाम तुल्य ध्वनि करते हैं । प्रश्न है । मंख ने प्रचलित नाम कल्हण न देकर उसका शुद्ध संस्कृत अप्रचलित नाम 'कल्याण' क्यों दिया ? कल्हण ने स्वतः कहीं भी अपने कल्याण नाम की ओर गौण रूप से भी संकेत नहीं किया है । मंख ने राजतरंगिणी में वर्णित अनेक नामों को अक्षरशः रूप अपने काव्य में दिया है । क्या कारण है कि कल्हण का नाम ही बदलकर उसने कल्याण क्यों लिख दिया ? आदर के लिये कल्हण का शुद्ध संस्कृत नाम कल्याण मंख ने दिया है। यह एक तर्क उपस्थित किया जाता है । कल्हण ने राजतरंगिणी में सर्वदा प्रचलित नाम दिया है । शुद्ध संस्कृत रूप में नाम देने का प्रयास नहीं किया है । कल्हण ने प्रचलित नाम 'गग' 'गर्ग' के स्थान पर 'गगन चन्द्र' देने का प्रयास नहीं किया है । उसने व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप को परिवर्तित करने का प्रयास नहीं किया है । (रा० ८ : ३३, ३८, ४३, १८२, १९६, ३४८, ३७६, ३८०, ३९०, ४१५, ४३०, ५०२, ५१५, ५८१, ५६४, ६०५, ६१५, १४४४) दूसरा उदाहरण 'लोठन' नाम है । कल्हण ने 'लोठन', 'लोठक' आदि प्रचलित अपभ्रंश शब्दों का प्रयोग किया है । उसने शुद्ध 'लोष्टक' शब्द नहीं दिया है । 'लोष्टक' शब्द का प्रयोग एक स्थान पर किया है । (रा० ८ : २०२) मंख का वर्णित कल्याण ही कल्हण है इस पर और अनुसन्धान की आवश्यकता है । श्री जोनराज का कल्याण शब्द के साथ कल्हण न लिखना, शान्त रह जाना, जबकि वह स्वयं कल्हण के छोड़े कार्य को पूर्ण कर रहा था विषय को सन्देहास्पद बना देता है । सम्भव है । मंख के समय कल्याण नाम का ही कोई कवि रहा हो जिसका ग्रन्थ लुप्त हो गया है । क्योंकि जिस समय मंख ने अपना काव्य लिखकर समाप्त किया उसके ४ वर्ष पश्चात् कल्हण ने लिखना और ६ वर्ष पश्चात् रचना समाप्त किया २